बंदूक छोड़ थामे कॉफी के मग, सुकमा के तुंगल नेचर कैफे से बस्तर की बदलती दास्तान- बीट रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले से पुनर्वास की एक बेहद भावुक और उम्मीदों से भरी अनूठी कहानी सामने आई है. कभी बस्तर के घने जंगलों में सुरक्षाबलों के खिलाफ बंदूकें तानने वाली पांच पूर्व महिला नक्सली अब साबरी नदी के किनारे 'तुंगल नेचर कैफे' में पर्यटकों को मुस्कुराकर गर्म कॉफी परोस रही हैं.

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बस्तर से बीट रिपोर्ट. (photo: ITG) बस्तर से बीट रिपोर्ट. (photo: ITG)

जितेंद्र बहादुर सिंह

  • रायपुर,
  • 21 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:41 PM IST

कभी गोलियों की गूंज के लिए जाने-जाना वाला छत्तीसगढ़ का सुकमा आज इबारत की नई कहानी लिख रहा है, जो सुकमा में बदला, पुनर्वास और उस उम्मीद की कहानी है, जिसने हिंसा के रास्ते पर चल चुके लोगों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाकर खड़ा किया है.
 
सुकमा के तुंगल डैम के पास साबरी नदी के किनारे स्थित “तुंगल नेचर कैफे” केवल एक कैफे नहीं है, बल्कि ये उस बदलते बस्तर की तस्वीर है, जहां कभी AK-47 थामने वाले हाथ आज मुस्कुराकर कॉफी परोस रहे हैं. ये कैफे दिसंबर 2025 से संचालित हो रहा है और यहां काम करने वाली पांच महिलाएं पूर्व नक्सली कैडर रह चुकी हैं. कभी जंगलों में सक्रिय रहीं, ये महिलाएं अब अपने जीवन का नया अध्याय लिख रही हैं. प्रशासन और स्थानीय लोगों के सहयोग से शुरू हुई ये पहल पुनर्वास मॉडल की एक अनोखी मिसाल बनकर उभर रही है.

जंगल से जनजीवन तक का सफर

बस्तर और सुकमा का नाम सालों तक नक्सली हिंसा, मुठभेड़ों और सुरक्षा अभियानों के कारण सुर्खियों में रहा. यहां के कई युवा और महिलाएं परिस्थितियों, डर, गरीबी या वैचारिक प्रभाव के चलते नक्सली संगठनों से जुड़ गए, लेकिन वक्त के साथ सरकार की पुनर्वास नीति, सुरक्षा बलों के लगातार प्रयास और विकास कार्यों ने तस्वीर बदलनी शुरू की. तुंगल नेचर कैफे इसी बदलाव का प्रतीक है. यहां काम कर रहीं महिलाएं कभी अलग-अलग नक्सली संगठनों और बटालियनों का हिस्सा थीं. किसी पर लाखों रुपये का इनाम था तो कोई डिविजनल कमेटी में सक्रिय थी. लेकिन अब उनकी पहचान बदल चुकी है. अब वो हथियार नहीं, ट्रे और कॉफी मग संभालती हैं.

कौन हैं ये महिलाएं

कैफे में काम कर रहीं महिलाओं की कहानी अपने आप में संघर्ष और परिवर्तन की दास्तान है. इस लिस्ट में सबसे पहले नंबर पर आती हैं. रमे कुहराम, रमे एसीएम (Area Committee Member) स्तर की नक्सलियों का कैडर रही हैं. उन पर सरकार ने 5 लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा था. उन्होंने 22 अप्रैल 2024 को आत्मसमर्पण किया. आज वही कुहराम पर्यटकों को कॉफी और स्थानीय व्यंजन परोसती नजर आती हैं.

मड़वी बुधरी बटालियन-1 की सदस्य थीं. उन पर 8 लाख रुपये का इनाम था. उन्होंने 30 जनवरी 2025 को उन्होंने आत्मसमर्पण किया. जंगलों में वर्षों बिताने वाली बुधरी अब कैफे संचालन और रसोई व्यवस्था संभाल रही हैं.

मुचाकी सोमे उत्तर बस्तर डिविजन प्रेस कमेटी की सदस्य रहीं हैं. मुचाकी सोमे पर 1 लाख रुपये का इनाम था. उन्होंने 22 अप्रैल 2022 को आत्मसमर्पण किया. अब वो कैफे में ग्राहकों का मुस्कुराकर स्वागत  करती हैं.

मड़काम पोजे केरलापाल एलओएस डिप्टी कमांडर रह चुकी हैं, मड़काम पर 3 लाख रुपये का इनाम था. अब वो कैफे के संचालन और स्थानीय समन्वय में सहयोग कर रही हैं.

कलमु पायके एसीएम स्तर की कैडर रहीं, कलमु पायके पर 5 लाख रुपये का इनाम था. उन्होंने 2024 में आत्मसमर्पण किया था. अब वे पर्यटकों के लिए स्थानीय स्वाद तैयार करती हैं. अनीता पोडियाम, अनीता एक आत्मसमर्पित कैडर की पत्नी हैं. उन्होंने भी इस पहल से जुड़कर नई जिंदगी शुरू की है.

'हमने अंधेरा देखा था'

कैफे में काम कर रही एक महिला की आंखें उस वक्त नम हो गईं, जब उसने अपने अतीत और वर्तमान के बीच का फर्क बताया. उन्होंने कहा, 'हमने अपने अतीत में अंधेरा देखा था. आज हमें समाज की सेवा करने का ये अवसर मिला है, ये हमारे लिए नया जन्म है. बारूद की जगह कॉफी परोसना और अपनी मेहनत की कमाई से जीना हमें शांति और सम्मान दे रहा है.'

उनकी आवाज में दर्द और सुकून भी था. एक अन्य सहयोगी ने कहा,“पहले हम अपने परिवार को अच्छा जीवन देने का सपना भी नहीं देख सकते थे. अब हम अपनी मेहनत से कमाए पैसों से घर के सदस्यों का भविष्य संवार सकते हैं. ये सब प्रशासन और इस कैफे की वजह से संभव हुआ है.” ये शब्द केवल बयान नहीं, बल्कि उस मानसिक परिवर्तन की कहानी हैं, जो बस्तर में धीरे-धीरे आकार ले रहा है.

प्राकृतिक सौंदर्य के बीच नई शुरुआत

तुंगल नेचर कैफे की सबसे खास बात इसका स्थान भी है. ये कैफे साबरी नदी के किनारे स्थित तुंगल डैम के पास विकसित किया गया है. साबरी नदी, इंद्रावती नदी की प्रमुख सहायक नदी मानी जाती है. हरी-भरी वादियां, शांत पानी, जंगलों की प्राकृतिक खूबसूरती और पक्षियों की आवाजें इस जगह को बेहद खास बनाती हैं. प्रशासन की कोशिश है कि ये क्षेत्र केवल सुरक्षा अभियानों के लिए नहीं, बल्कि पर्यटन और सकारात्मक बदलाव के लिए पहचाना जाए. कैफे में आने वाले पर्यटक यहां स्थानीय व्यंजनों और कॉफी का आनंद लेने के साथ-साथ बस्तर के बदलते स्वरूप को भी करीब से महसूस करते हैं.

पुनर्वास का नया मॉडल

छत्तीसगढ़ सरकार और सुरक्षा एजेंसियां लंबे वक्त से आत्मसमर्पित नक्सलियों के पुनर्वास पर काम कर रही हैं. आमतौर पर पुनर्वास योजनाओं में आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर दिए जाते हैं, लेकिन तुंगल नेचर कैफे इस पहल को एक नई दिशा देता है. यहां केवल नौकरी नहीं दी गई, बल्कि सम्मान और समाज से जुड़ने का अवसर भी दिया गया.

प्रशासन के अधिकारियों के अनुसार, इन महिलाओं ने खाना बनाने और कैफे संचालन में रुचि दिखाई थी. इसी के बाद उन्हें स्थानीय लोगों के साथ जोड़कर यह पहल शुरू की गई. इस मॉडल का मकसद केवल रोजगार देना नहीं, बल्कि ये संदेश देना भी है कि यदि कोई हिंसा छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटना चाहता है तो उसके लिए रास्ते खुले हैं.

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स्थानीय लोगों का सहयोग

इस कैफे की शुरुआत में आम लोगों और स्थानीय ग्रामीणों के मन में थोड़ी झिझक और कई तरह के सुरक्षा संबंधी सवाल जरूर थे. जिन लोगों का नाम कभी पुलिस के वांटेड रिकॉर्ड और बड़े सुरक्षा अभियानों में आता था, उन्हें आम समाज कितनी आसानी से स्वीकार कर पाएगा, ये प्रशासन के सामने भी एक बड़ी चुनौती थी. पर धीरे-धीरे स्थानीय लोगों ने इस बड़े बदलाव को खुले दिल से अपनाया और अब आसपास के ग्रामीण भी यहां आते हैं, महिलाओं से बातचीत करते हैं. साथ ही इन महिलाओं का हौसला बढ़ाते हैं.

स्थानीय युवाओं का कहना है कि ये पहल दूसरे लोगों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है, अगर हिंसा का रास्ता छोड़ने वालों को सम्मानजनक जीवन मिलेगा तो और लोग भी मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित होंगे.

बदलता हुआ बस्तर

एक समय था, जब बस्तर का नाम सुनते ही लोगों के मन में डर और असुरक्षा की तस्वीर उभरती थी. पर अब तस्वीर बदल रही है. सड़कें बन रही हैं, स्कूल खुल रहे हैं, मोबाइल नेटवर्क पहुंच रहा है और पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है.

तुंगल नेचर कैफे इसी बदलते बस्तर की जीवंत मिसाल है. ये केवल कॉफी बेचने की जगह नहीं है, बल्कि ये उन लोगों की कहानी है, जिन्होंने बंदूक छोड़कर जिंदगी चुनी. ये उन महिलाओं की कहानी है, जिन्होंने भय और हिंसा से निकलकर आत्मसम्मान का रास्ता अपनाया. जब कोई पर्यटक यहां बैठकर कॉफी पीता है, तो वह सिर्फ एक पेय का स्वाद नहीं लेता, बल्कि वह बदलाव, उम्मीद और शांति की उस यात्रा का हिस्सा बनता है, जिसे बस्तर आज लिख रहा है.

एक कप कॉफी और शांति का संदेश

तुंगल नेचर कैफे की सबसे बड़ी ताकत उसकी कहानी है. यहां परोसी जाने वाली हर कॉफी ये संदेश देती है कि कोई भी इंसान हमेशा के लिए हिंसा में नहीं बंधा रह सकता. अवसर, विश्वास और सम्मान मिले तो जिंदगी बदल सकती है. कभी जंगलों में बंदूक उठाने वाले हाथ आज पर्यटकों का स्वागत कर रहे हैं. कभी बारूद से जुड़ी जिंदगी अब कॉफी की खुशबू में बदल रही है. सुकमा का ये छोटा-सा कैफे शायद आने वाले समय में देशभर के लिए पुनर्वास और सामाजिक बदलाव का मॉडल बन जाए, क्योंकि यहां सिर्फ कॉफी नहीं परोसी जाती- यहां नई जिंदगी परोसी जाती है.

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