ये वो दौर था जब देश में इमरजेंसी घोषित की जा चुकी थी, अलग अलग क्षेत्रों के दिग्गजों को जेल में बंद कर दिया गया था. यहां तक अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी के साथ साथ संघ प्रमुख बालासाहब देवरस भी जेल में थे. देश के ही प्रमुख लोग नहीं बल्कि हर शहर के वो प्रमुख लोग जो सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठा रहे, ज्यादातर जेल में ही थे. ऐसे में प्रयागराज के एक वकील वीरेन्द्र प्रताप सिंह भी नैनी जेल में बंद थे. उस दिन उनकी हाईकोर्ट में सुनवाई थी, उनके केस का नंबर आने तक उन्हें पुलिस सुरक्षा में बार काउंसिल के रूम में बैठाया हुआ था. अचानक वकीलों के काले कपड़े में एक व्यक्ति उनके पास आया और बोला, “मैं कानपुर आया था, तब आपको देखा. कई साल पहले मैंने आपको एक केस भेजा था और आपने उसमें स्टे करवा दिया था.. मेरा नाम गौरव है.. गौरव सिंह’.
वीरेन्द्र प्रताप सिंह उस व्यक्ति से मिलकर पहले तो भौचक ही रह गए थे कि ये कौन है, जिसे मैं जानता तक नहीं और ये इतने विश्वास के साथ मुझसे पुलिस सुरक्षा में भी मिलने आ गया है. जाहिर है एक वकील को आसानी से पुलिस भी नहीं रोक सकती थी. जब वीरेन्द्र प्रताप सिंह ने उस व्यक्ति को पहचाना तो उनकी हैरानी दोगुनी बढ़ गई थी. उनको इतनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था, तो एक बड़ी वजह थी संघ का स्वयंसेवक होना औऱ उनकी मुसीबत में जब उनके वकील दोस्त भी कन्नी काटने लगे थे. संघ के इतने बड़े दिग्गज का यूं नाम और वेश बदलकर मिलने आना, उनके लिए सुखद भी था. ये थे प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह यानी रज्जू भैया, जो आगे चलकर बालासाहब के बाद संघ के चौथे सरसंघचालक बने थे.
उस वक्त संघ पर प्रतिबंध लगा हुआ था और पुलिस रज्जू भैया समेत सभी संघ अधिकारियों को ढूंढ रही थी लेकिन रज्जू भैया पूरे देश में घूम रहे थे बस गिरफ्तारी से बचने के लिए अपना नाम ‘गौरव सिंह’ रख लिया था. इतना ही नहीं उन्होंने इस नाम से विजिटिंग कार्ड भी छपवा रखे थे और बैंक चैक भी इसी नाम से उनके पास थे. इमरजेंसी की खबर सुनते ही रज्जू भैया जो बंगाल से गोवाहाटी के रास्ते थे, वापस लखनऊ लौटने का तय किया और वहां लगने वाले संघ शिक्षा वर्ग को टाल दिया. संघ पर प्रतिबंध लगते ही रज्जू भैया ने तय किया कि उन्हें अपना केन्द्र बदल देना चाहिए जो उन दिनों लखनऊ में था. उन्होंने कानपुर जाने का सोचा और कुछ जरूरी सामान, कपड़ें, किताबें आदि लेकर वे कानपुर निकल गए. उन दिनों भाऊराव देवरस और अशोक सिंघल भी वहीं थे.
19 महीनों की इस पुलिस के साथ लुकाछुपी के दौरान रज्जू भैया यूं तो पूरा देश घूमते रहे लेकिन केन्द्र कानपुर को बनाए रखा. कानपुर में वो कार्यालय में नहीं बल्कि स्वयंसेवकों के घर रुकते थे और सावधानी वश कुछ दिन किसी दूसरे स्वयंसेवक के घर चले जाते थे. हर कोई उन्हें अपने मौसाजी, फूफाजी जैसे रिश्तेदार बताकर परिचय देते थे. संघ की ये ऐसी व्यवस्था जी, जिसके चलते पुलिस या प्रशासनिक अधिकारियों को खबर ही नहीं मिल पाती थी कि संघ के अधिकारी कहां छुपे हुए हैं.
RSS के इस फॉर्मूले ने इंदिरा गांधी को कर दिया था हैरान
इस व्यवस्था के चलते सरकार कितनी परेशान थी, जिसके बारे में रज्जू भैया को एक परिचित अधिकारी ने ही बताया था, जिसे रतन शारदा ने प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित अपनी किताब ‘Changing National Scenario & Emergency’ में बताया है कि कैसे उस वक्त एक परिचित आईपीएस अधिकारी से उन्होंने दिल्ली यात्रा के दौरान पूछा था कि, “क्या इन दिनों कोई आईपीएस या आईएएस अधिकारियों की मीटिंग नहीं हुई? उसने रज्जू भैया को बताया कि हां हुई थी, जिसे खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ही लिया था. 15-16 राज्यों के पुलिस महानिदेशक तक इस मीटिंग में थे. इंदिरा गांधी काफी नाराज थीं. आरोप लगा रही थीं कि उनको अपना काम ही ढंग से करना नहीं आता. इंदिरा गांधी ने उनसे कहा था कि, ‘मैंने आप लोगों को 2 से 3 हजार वरिष्ठ संघ अधिकारियों के नामों की सूची दी थी. आप सबने मिलकर उनमें से 10 से 20 लोगों से ज्यादा भी गिरफ्तार नहीं किए. जबकि आप अपनी निजी दुश्मनियों लेकर 20-25 हजार लोगों को गिरफ्तार कर चुके हो. इस सबसे मेरा नाम बदनाम हो रहा है. मुझे बताएं आप लोग इन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं कर पा रहे हैं?’
अधिकारी ने आगे बताया कि हम सब दुविधा में थे कि क्या जवाब दें कि एक आईएएस अधिकारी ने उठकर कहा कि, ‘’हमने वो सब लोग भी गिरफ्तार किए, जो नाम आपने दूसरी पार्टियों के दिए थे, लेकिन RSS के लोग उनसे अलग हैं. वो होटलों में नहीं रुकते. वो आम परिवारों में रिश्तेदार बनकर रुकते हैं. वे चाचा, मौसा, मामा आदि बनकर रुकते हैं. हमारे पास उनके फोटोग्राफ नहीं हैं, क्योंकि वो मीडिया की चकाचोंध से दूर रहते हैं, ज्यादा फोटो नहीं खिंचवाते. इसलिए उन्हें गिरफ्तार करना मुश्किल है. अगर हम किसी घर में सूचना मिलने पर जाएं तो उनका जवाब होता है कि मामाजी आए थे, दो दिन रुके और चले गए, कहां गए ये बताया नहीं. ये हमारी असफलता नहीं है, उनके काम करने का तरीका ही आम तरीकों से अलग है”. इस पर रज्जू भैया ने अपने वरिष्ठों का आभार जताया था कि उन्होंने ऐसी पद्धति विकसित की थी कि वरिष्ठ प्रचारक आम माहौल से दूर रहें और लोगों के घरों में ठहरें, आज वो सब काम आ रहा है.
संघ के सभी वरिष्ठ प्रचारकों की जिम्मेदारी उस वक्त अलग तरीके से बांट दी गई थी, आंदोलन में उनकी जिम्मेदारियां तय थीं. जैसे दत्तोपंत ठेंगड़ी का काम था कि मजदूर संगठनों, ट्रेड यूनियंस से सम्पर्क बनाए रखना, जबकि रज्जू भैया के सर पर काम था कि वो राजनेताओं, सिविल सेवा अधिकारियों और जो भी लोग समाज में वजन रखते हैं, उनसे भी सम्पर्क बनाए रखें. शिक्षा के क्षेत्र में उनके पहले से ही रिश्ते थे. सो वो लगातार मिल रहे थे. दिल्ली में भी उनके दो करीबी आईजी थे लीला सिंह बिष्ट और श्रवण टंडन. अगर आप काशी विश्व संवाद केन्द्र का रज्जू भैया पर आधारित विशेषांक विचार प्रवाह पढ़ लेंगे तो पाएंगे कि जो अभी ये व्यंग्य में कहा जाता है कि ‘सरकार तुम्हारी सिस्टम हमारा’, उन दिनों रज्जू भैया पर ये बिलकुल सटीक बैठता था.
इंदिरा गांधी के इतने करीबियों में लगा रखी थी रज्जू भैया ने सेंध
रज्जू भैया इंदिरा गांधी के शासन में इतने करीबी लोगों से सम्पर्क में थे कि बाद में कांग्रेस के लोग भी हैरान रह गए थे. कहा तो जाता है कि अपने पुराने शिष्य वीपी सिंह से भी उन्हें उस वक्त काफी सूचनाएं मिल रही थीं, लेकिन आधिकारिक रूप से उन्होंने बस इतना ही बताया कि वीपी सिंह ने मुझे संदेश भिजवाया कि, ‘मैं अभी निगरानी में हूं, और मुझसे आपका मिलना खतरनाक हो सकता है’. यानी वीपी सिंह को पता था कि रज्जू भैया कहां है, उन्होंने फिर भी इंदिरा गांधी को जानकारी नहीं दी थी. एक और राजा व इंदिरा गांधी सरकार के विदेश राज्य मंत्री दिनेश सिंह को भी रज्जू भैया के बारे में पता था लेकिन उन्होंने भी नहीं बताया.
रज्जू भैया ने अपने संस्मरणों में बताया है कि राजा दिनेश सिंह साहसी थे, उनको उनसे मिलने में कोई भय नहीं था. उन्होंने ये भी बताया कि राजा दिनेश सिंह का सहायक प्रयाग का रहने वाला था और पुराना स्वयंसेवक था. उससे भी रज्जू भैया की काफी चर्चा हुई थी औऱ अंदर की सूचनाएं मिली होंगी, ये स्वाभाविक ही था. उसने रज्जू भैया को को सलाह दी थी कि संघ को राजनैतिक ताकत भी बनना होगा. आप शिशु मंदिर खोलते रहो, शाखा आयोजित करते रहो, सेवा प्रोजेक्ट्स चलाते रहो तो आपके साथ ये सब होता रहेगा, आप राजनैतिक ताकत भी बनेंगे तो कोई आसानी से हाथ नहीं डाल पाएगा. हालांकि जनसंघ में संघ के स्वयंसेवक थे, लेकिन तब तक वो कोई शक्ति नहीं बना था.
उस वक्त लोक संघर्ष समिति के महासचिव नानाजी देशमुख थे. मुंबई में हुई बैठक में उन्होंने ही कहा था कि कुछ लोगों को गिरफ्तार ना होकर अंडरग्राउंड रहना चाहिए, लोगों से मिलते रहना होगा, आगे की योजनाएं बनानी होंगी, लोग गिरफ्तार होंगे, तो उनकी जगह दूसरे लोगों को लेनी होगी. नानाजी के गिरफ्तार होने पर लोक संघर्ष समिति के महासचिव रविन्द्र बर्मा बनाए गए. उनके साथ कानपुर में बैठक हुई तो उन्होंने कहा कि हमें फौरन सत्याग्रह शुरू करना होगा, जेलें भरनी होंगी. क्योंकि सभी लोग गिरफ्तार हो जाएंगे तो सत्याग्रह में जेल कौन भरेगा. वर्माजी चाहते थे कि अगले तीन चार महीनों में कम से कम साठ हजार लोगों को जेलें भर देनी चाहिए.
RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी
रज्जू भैया ने उनसे 7 दिन का समय मांगा ताकि यूपी और बिहार के कई शहरों का दौरा करके स्वयंसेवकों का मन जाना जाए. उसके बाद दो महीने सत्याग्रह चला और 55000 स्वयंसेवकों ने गिरफ्तारियां दीं. जबकि समिति के बाकी घटक दलों की संख्या काफी कम रही, केवल अकाली दल से 12 या 13 हजार कार्यकर्ताओं ने अपनी गिरफ्तारियां दीं. इससे इंदिरा सरकार काफी दवाब में आ गई थी.
आलम ये था कि अब सरकार के अच्छे अधिकारी भी मनमानी पर उतर आए थे, उनके मन में भी डर नहीं बचा था, जब केन्द्र सरकार ही नियम से नहीं चल रही है और इमरजेंसी के नाम पर मनमानी कर रही है तो वो क्यों परेशानी मोल लें. ऐसे ही एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी जयपुर में तैनात थे, रज्जू भैया फरारी के दौरान ही एक दिन उनके घर में जाकर रुके. रज्जू भैया पर रहा नहीं गया और पूछ ही डाला कि आप मेरे यहां रुकने से कतई परेशान नहीं हो, सरकार का डर नहीं क्या? उस अधिकारी ने शांति से जवाब दिया कि एक तो विशेष तौर पर आपका नाम भेजा नहीं गया है, दूसरे अगर कोई पूछेगा तो मैं कह दूंगा कि हां आए थे. अगर मुझसे पूछा जाएगा कि पुलिस को क्यों सूचना नहीं दी गई? तो मैं कह दूंगा कि ऊपर से आई सूची में उनका नाम नहीं था. अगर मुझसे पूछेंगे कि यहां से वो कहां गए हैं, तो मैं कह दूंगा कि वो कभी बताकर नहीं जाते कि कहां जा रहे हैं. वो आते हैं, मिलके चले जाते हैं, सो मुझे उनके अगले ठिकाने के बारे में पता नहीं होता.”
इतना कहकर उस अधिकारी ने रज्जू भैया से कहा, इसलिए मैं चिंतित नहीं हूं आप जब तक चाहें यहां रुक सकते हैं”, कुलपतियों या देश भर की यूनीवर्सिटीज के अधिकारियों के यहां रुकने के उनके सुरक्षित ठिकाने होते थे, कभी भी रात के 12 बजे भी वो उनका दरवाजा खटखटा देते थे. एक कुलपति के कहने पर रज्जू भैया ने धोती कुर्ता की जगह पैंट, ट्राउजर आदि भी पहनना शुरू कर दिया था, एक आईआईटी कैम्पस में तो वो 6 महीने तक पश्चिमी परिधानों में ही रुके थे.
संघ के वरिष्ठ प्रचारक और लेखक रहे रंगा हरि ने भी रज्जू भैया की केरल यात्रा के अनुभव साझा किए थे, कि कैसे वो गौरव सिंह के नाम से ट्रेन्स में सफर करते थे, अपने सह यात्रियों को वो पुराने सिक्कों, विदेशी नोटों का अपना संग्रह दिखाते हुए खूब बातें करते हुए जाते थे. पेंट शर्ट पहनते थे, क्लीन शेव रहते थे और ज्यादातर समय बाजारों में शॉपिंग करते, लोगों से बात करते, इमरजेंसी को लेकर उनकी राय जानते हुए बिताते थे. आदि शंकरचार्य के गांव भी गए, संघ कार्यकर्ताओं से मिले.
कभी हजारी प्रसाद द्विवेदी जी इंदिरा गांधी के शिक्षक हुआ करते थे. रज्जू भैया ने उनसे भी मुलाकात की तो पता चला कि हाल में ही वह इंदिरा गांधी से मिलकर आए हैं. रज्जू भैया को उन्होंने बताया कि इंदिरा गांधी काफी अकेलापन महसूस करती हैं, इंदिरा का मानना है कि कोई उन्हें सही सूचना नहीं देता है. बेहद कम लोग उनसे मिलने आते हें और वो भी दिल खोलकर बातें नहीं करते हैं. रज्जू भैया इसी तरह लोगों से मिल मिलकर सर्वोच्च पदों से लेकर जनता के मन की बातें जाना करते थे ताकि भविष्य की रणनीति बनाई जा सके. उनका का संघ के उन कर्मठ अधिकारियों, पदाधिकारियों और स्वयंसेवकों का भी मनोबल बढ़ाना था, जो इतने लम्बे आपातकाल में टूटते से जा रहे थे.
मेवाड़ के महाराणा भी तब हिम्मत हार ही जाते अगर...
उन्हीं में से एक थे मेवाड़ खानदान के महाराणा भगवत सिंह, जो उन दिनों विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष थे. उनके ज्यादातर सभी करीबी साथियों को जेल में डाल दिया गया था, सो वो काफी अकेला महसूस कर रहे थे. संयोग से एक वरिष्ठ अधिकारी राजाभाऊ देगवेकर से उनकी मुलाकात हुई, तो उन्होंने राजा की इस मनोस्थिति को भांप लिया. राजाभाऊ ने उन्हें कहा कि महाराज, हम अभी मुश्किल दौर में हैं, आप तो उन महाराणा प्रताप के वंशज हैं, जो किसी के आगे नहीं झुके, ऐसे में आपका दवाब में उठाया गया कोई भी कदम या बयान पूरे राष्ट्र के लिए दर्दभरा होगा, आपका सम्मान कम होगा सो अलग. महाराज उनकी भावनाओं को समझ गए थे.
महाराणा ने तब एक अच्छा रास्ता निकाला, बोले- मैं तुंरत इंग्लैंड के लिए निकल जाता हूं, मेरा एक घर वहां भी हैं. यहां के दवाब से मुक्त रहूंगा और मुझे विश्वास है कि मैं ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाऊंगा जो संघ या विश्व हिंदू परिषद के सम्मान को कम करे. इमरजेंसी हटने के बाद रज्जू भैया ने उनसे कई मुलाकातें की. उनका मानना था कि मुश्किल दौर में लोगों को उनकी परम्पराओं की याद दिलाने से वो गलत कदम उठाने से बचते हैं.
पिछली कहानी: RSS के पहले सिख प्रचारक की कहानी, जन्मदिन पर संघ प्रमुख ने दिए थे 85 लाख
विष्णु शर्मा