संघ के 100 साल: 'आदरणीय शास्त्री जी...', 1948 की वो चिट्ठी जो रज्जू भैया ने बापू की हत्या के बाद जेल से लिखी

रज्जू भैया जो खुद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर का पद छोड़कर संघ के प्रचारक बने थे, ने एक ऐसा लेख लिखा जो इतने तथ्यों व तर्कों के साथ लिखा गया है कि ये एक दस्तावेज बन गया है. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है उसी पत्र की कहानी.

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रज्जू भैया 1948 में नैली जेल में बंद थे.  (Photo: AI generated) रज्जू भैया 1948 में नैली जेल में बंद थे. (Photo: AI generated)

विष्णु शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 15 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:36 AM IST

जब भी आप RSS से जुड़ेंगे या उसके बारे में लिखेंगे, पढ़ेंगे, चर्चा करेंगे तो दो बातों से आपको वास्ता जरूर ही पड़ेगा, एक बात संघ के इतिहास का बड़ा अध्याय है और दूसरा संघ की कोर विचारधारा से जुड़ा है. इतिहास से जुड़ा ये पन्ना है गांधीजी की हत्या का, संघ पर हत्या का आरोप लगाकर प्रतिबंध लगा दिया, तब के सरसंघचालक गुरु गोलवलकर को समेत तमाम दिग्गज संघ स्वयंसेवकों को गिरफ्तार कर लिया. संघ पर प्रतिबंध का ये पहला मामला था, जो आजाद भारत सरकार ने लगाया था और उस वक्त चूंकि केन्द्र में गृहमंत्री सरदार पटेल थे, सो प्रतिंबध हटने के बावजूद, संघ पर से हत्या के आरोप झूठे साबित होने के बावजूद संघ पर से ये ठप्पा नहीं हटा है कि ये प्रतिबंध सरदार पटेल ने लगाया था. उस वक्त उत्तर प्रदेश में गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे और बाद में संघ के चौथे सरसंघचालक बने प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया उन दिनों नैनी जेल में बंद थे. वहीं से उन्होंने 7 जुलाई 1948 को जो पत्र शास्त्रीजी को लिखा था, वो बाद में काफी अहम बन गया. गांधी हत्या से जुड़े कई सारे तथ्यों पर ये पत्र प्रकाश डालता है.

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ये पत्र जितने तथ्य देता है, उन तथ्यों के आधार पर उतने ही तर्क भी देता है कि 'आखिर जब गांधीजी और डॉ आम्बेडकर को शाखाओं में, कार्यक्रमों में आने में दिक्कत नहीं थी, आप सबको क्यों हो गई है? साथ ही इसमें ये भी बताया कि देश पर संकट के समय कोई खड़ा हो ना हो संघ का स्वयंसेवक जरूर खड़ा होगा और आज उन्हीं स्वयंसेवकों के घर जलाए जा रहे हैं, कोई रोकने वाला भी नहीं. ज्यादातर को जेलों में डाल दिया गया है.'

दूसरा मामला संघ और उसके सहयोगी संगठनों की भारत की प्रशंसा, उसको फिर से विश्वगुरू होने के दावों आदि को लेकर बड़ा अहम है. चूंकि विदेशी आक्रांताओं ने हमारे सारे ग्रंथों को जला दिया, जो थोड़े बहुत मिले भी, उन पर संदेह है कि वो एजेंडे की मिलावट के साथ हेराफेरी करने के बाद सहेजे गए हैं औऱ उन ग्रंथों के आधार पर जो इतिहास लिखा गया, वो भारत के आत्मविश्वास को डिगाने वाला है. जिस भारत भूमि के सबसे प्रांचीन ग्रंथ ऋग्वेद की ऋचाओं को महिला ऋषियों ने रचा हो, वो ये मान ही नहीं सकते थे कि वेदों को सुनने पर महिलाओं के शीशे में कानों में पिघला शीशा डालने का दंड था. जिस देश ने लोकतंत्र और स्वयंवर व स्त्री धन जैसे महिला अधिकारों को जन्म दिया हो, वो महिला विरोधी कैसे हो सकता है? जहां रामायण, महाभारत, गीता जैसे पवित्र गंथ दलितों ने रचे हों, वहां उनको शिक्षा से कैसे रोका जा सकता है?

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उसमें भी हर भारतीय को ये आश्चर्य होता है कि सारे आविष्कार पश्चिम में ही हुए तो भारत कैसे विश्व गुरु हुआ? आजादी के बाद की कई पीढ़ियों ने तो मान लिया था कि भारत में कभी कोई वैज्ञानिक प्रेरणा थी ही नहीं बल्कि ये तो सपेरों औऱ गोली-चूरन वाले वैद्यों का देश था. तब रज्जू भैया जो खुद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर का पद छोड़कर संघ के प्रचारक बने थे, ने एक ऐसा लेख लिखा, जो इतने तथ्यों व तर्कों के साथ लिखा गया है कि युवा पीढ़ी को निश्चित ही अपने देश पर गर्व होगा. 
 
इस लेख में आप शास्त्रीजी को लिखा गया रज्जू भैया का पत्र पढ़िए, हालांकि हमने पत्र को उसी भाषा में यहां प्रस्तुत नहीं किया, जैसा उन्होंने लिखा था, बल्कि भाषा को सरल करते हुए उस खंडों में बांटकर सरल शब्दों में लिखा है ताकि आपको उस पत्र का एक एक मुद्दा आसानी से समझ आ सके
 
नैनी जेल से 1948 में रज्जू भैया द्वारा शास्त्रीजी को लिखा गया पत्र

आदरणीय शास्त्री जी, मैं कई दिनों से अनेक मुद्दों पर स्पष्टीकरण चाहता था, पर अब तक ऐसा नहीं कर सका. कुछ दिन पहले मैं अपनी बीमारी के कारण पैरोल पर लखनऊ गया था. मुझे आपसे मिलने की तीव्र इच्छा हुई और मैंने प्रयास भी किया. लेकिन आप वहां नहीं थे, और संभव है कि आप मुझसे मिलने के लिए राज़ी न हुए हों, हालांकि मुझे आपसे इसकी अपेक्षा भी नहीं थी. अब माहौल कुछ शांत हो गया है और स्पष्टता आ गई है, इसलिए कई बातों पर शांति से विचार करना संभव है. यही कारण है कि मैं आपको यह पत्र लिख रहा हूँ. कारण केवल यह नहीं है कि आप गृह मंत्री हैं, बल्कि इसलिए भी है कि मेरे मन में आपके प्रति स्वाभाविक आदर है; दूसरा, आप अपनी संतुलित बुद्धि के लिए प्रसिद्ध हैं. ऐसा ही हो. न केवल आप, बल्कि पूरा समाज अब स्पष्ट रूप से जानता है कि संघ संगठन का राष्ट्रपिता की अमानवीय हत्या से कोई संबंध नहीं था.
 
‘गांधीजी की आलोचना तो कांग्रेसी भी करते थे’

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पहली बात, कोई स्वयंसेवक ऐसे जघन्य, घृणित अपराध को करने की कल्पना भी नहीं कर सकता. दूसरी बात, हिंदू समाज के मुकुट, उस महान आत्मा के बारे में ऐसा विचार सोचना भी असंभव था, जिनकी वजह से दुनिया के सामने हमारी छवि बुलंद हुई. यह बिल्कुल सच है कि लोग बापू की आलोचना करते थे और उनकी नीतियों पर कई बार असंतोष भी जताते थे. लेकिन क्या हम अपने माता-पिता के विचारों से असहमत नहीं होते? क्या हम उनकी आलोचना नहीं करते? लेकिन कोई यह नहीं सोचता कि माता-पिता के खिलाफ ऐसा कदम उठाया जा सकता है. क्या यह सच नहीं है कि आदरणीय टंडन जी उनकी हिंदुस्तानी नीति से खुश नहीं थे? क्या श्री चंद्रभान गुप्त ने राशन नीति पर उनकी आलोचना नहीं की थी? क्या पंडित जवाहरलाल जी और पटेल जी ने कई बार अपनी असहमति नहीं जताई थी? लेकिन नहीं; सिर्फ हमें ही इस तरह से आंका गया कि यह झूठा प्रचार किया गया कि हम बापू की तस्वीर का भी अपमान करते हैं. इतना ही नहीं, बल्कि हम उस पर जूते रखते हैं. हमने इस तरह के घटिया झूठ की उम्मीद नहीं की थी. मैंने खुद गोविंद सहाय जी से इस झूठे आरोप को साबित करने का अनुरोध किया था - लेकिन कौन सुनता है?

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RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी 

जब आदरणीय बापू जीवित थे, तब हम इन हास्यास्पद आरोपों को नज़रअंदाज़ कर देते थे और लोग भी इन पर ध्यान नहीं देते थे. लेकिन अब हमें दिल दहला देने वाला अनुभव हो रहा है कि ये झूठ इतने प्रभावी और भयावह साबित हुए हैं कि इन्होंने लोगों में गुस्सा, संदेह और झूठी भड़काऊ बातें पैदा कर दीं. ऐसा लगता है मानो वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ इन झूठी बातों के चलते अखबारों ने सच न छापने की कसम खा ली हो. उन्होंने न सिर्फ हमारे बारे में कुछ नहीं छापा, बल्कि उकसावे में आकर हमें बदनाम किया और फर्जी खबरें प्रकाशित कीं.
 
‘स्वयंसेवकों को घरों को लूटा गया, जलाया गया’

"गोडसे बिहार के राज्य प्रचारक थे, उन्हें 5000 रुपये का उपहार मिला था" - इस तरह का दुष्प्रचार बेरोकटोक किया गया. इसके जवाब में स्वयंसेवकों के घरों को लूटा और जलाया गया, जबकि हम निर्दोष थे. हजारों स्वयंसेवकों ने यह सब सहन किया, उन्हें जेल में डाल दिया गया ताकि कोई आवाज़ भी न उठा सके और बेबुनियाद नफरत फैलाने वाला दुष्प्रचार फैलाया गया. हमने यह सब शांतिपूर्वक सहन किया क्योंकि हमारे ही लोगों ने ऐसा किया.

अगर अब शांति से स्थिति का विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि राज्य सरकार ने दिसंबर में सहारनपुर में हुई कुछ घटनाओं के आधार पर ही संघ को अवैध घोषित करने का फैसला कर लिया था. हम भी इसके पीछे का कारण जानने के लिए उत्सुकता से इंतजार कर रहे थे. इससे कुछ समय पहले ही, पूरे भारत में - विशेष रूप से जबलपुर, मथुरा, प्रयाग आदि में - मुस्लिम लीग समर्थकों के घरों से तलाशी के दौरान हथियार और गोला-बारूद बरामद हुए थे. व्यक्तियों के खिलाफ पुलिस मामले दर्ज किए गए थे. लेकिन, सैकड़ों लोगों (जिनमें एक विधायक भी शामिल था) को गुप्त रूप से हथियार जमा करने के आरोप में गिरफ्तार किए जाने के बावजूद, मुस्लिम लीग संगठन के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया गया.
अगर पंजाब से सब कुछ खोकर भागे कुछ लोगों के घरों से कुछ मिला था, तो यह कैसे मान लिया गया कि इसमें संघ की कोई निश्चित योजना थी? खिज्र हयात खान की सरकार भंग होने से ठीक पहले संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. उस समय भी सभी स्थानों की तलाशी ली गई थी, लेकिन, कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला. ऐसा भी नहीं है कि पंजाब पुलिस, जिसमें मुसलमानों की संख्या बहुत अधिक थी, ने हमारे हक में कोई पक्षपात किया हो.
 
‘गांधीजी शाखा में आए, लेकिन कांग्रेसी निमंत्रण पर भी नहीं आते’

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हमारी हमेशा से यही इच्छा रही है कि कांग्रेस के सभी नेता हमारे काम को प्रत्यक्ष रूप से देखें और हमें बताएं कि हम कहां गलतियां कर रहे हैं, उनकी क्या आपत्तियां हैं. लेकिन, कई निमंत्रणों के बावजूद वे हमारे कार्यक्रमों में आने से इनकार कर दिया. हमें नहीं पता कि उन्होंने हमें बहुत छोटा समझा या उन्हें डर था कि वे हमसे बीमारी की तरह संक्रमित हो जाएंगे! स्वयं बापू ने दिल्ली में हमारे 400 वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की बैठक बुलाई थी और हमें कई बातों पर सलाह दी थी. लेकिन, उनके पदचिन्हों पर चलने वाले नेताओं ने हमें कभी भी यह दिखाने का मौका नहीं दिया कि संघ वास्तव में क्या है. अपने प्रयासों में असफल होने के बाद, हमने जनता के सामने अपना पक्ष रखने का फैसला किया. लेकिन, हमारे बढ़ते काम पर ध्यान देने के बजाय, उन्हें हमसे व्यर्थ का डर था; अगर कोई गलती हो तो हमें सलाह देने के बजाय, उन्होंने अपनी पूरी ताकत दिखावटी बातों में लगा दी.

प्रोपगेंडा और वह भी बिना किसी व्यावहारिक अनुभव के और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित. आदरणीय डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी दिसंबर में प्रयाग आए थे. उनकी आपत्तियों को सुनते और उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए हमने पाया कि संघ के बारे में उनका ज्ञान श्री सादिक अली से आया था! उनसे सच्चाई की उम्मीद नहीं की जा सकती थी, क्योंकि उन्होंने स्वयं कुछ देखा ही नहीं होगा. इस प्रकार, संघ जमींदारों और पूंजीपतियों का संगठन बन गया. फिर, संघ के बारे में कई बातें खुलेआम कही जाने लगीं, जैसे - यह सांप्रदायिकता फैलाता है, यह रूढ़िवादी है, फासीवादी है। आजकल यही हाल है. क्या समाजवादी, कांग्रेस पर झूठे आरोप नहीं लगा रहे हैं? क्या वे कांग्रेस को उसकी हिंदी नीति के कारण सांप्रदायिक, उसके कड़े नियंत्रण को फासीवादी और बिड़ला और टाटा के इसमें शामिल होने के कारण पूंजीपतियों का संगठन कहने के बहाने नहीं बनाते? हमें जौनपुर के राजा श्री यादवेंद्र दत्त के अलावा और कोई बड़ा धनवान, पूंजीपति या राजा संघ का सदस्य नहीं मिला. जी हां, संघ किसी विशेष समूह के लोगों के लिए खुला नहीं था, लेकिन उन्हें प्रवेश से बिल्कुल भी वंचित नहीं किया गया था.
 
‘मुस्लिमों को लेकर भी भ्रम फैलाया गया’

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नेताओं के मन में संघ को लेकर एक अजीब, पूरी तरह निराधार धारणा थी कि हमने भारत में मुसलमानों को नष्ट करने की शपथ ली थी. कितना भ्रम और अज्ञानता! संघ की ऐसी कोई नीति कभी नहीं थी कि वह दूसरे लोगों के साथ दुर्व्यवहार करे. यह सच था कि इस सदी में हुए कई असफल प्रयोगों को देखते हुए, हमने पहले विभाजित हिंदुओं के भीतर के मतभेदों को दूर करने का निर्णय लिया था. यह किसी से छिपा नहीं है कि हिंदू समाज संकीर्ण सोच, स्वार्थ, जातिवाद और संकीर्णता से भरा हुआ है. संघ का प्रयास एकता, देशभक्ति, निस्वार्थता, त्याग और अनुशासन का निर्माण करना और उन्हें मजबूत करना था ताकि हिंदू सभ्यता और हिंदू संस्कृति की रक्षा की जा सके. स्वराज्य प्राप्त करने के बावजूद, आज हमारे लोगों की स्वार्थी लक्ष्यों की भूख को देखकर, क्या किसी सच्चे देशभक्त का हृदय रक्तपात नहीं होगा?

गिरावट और भ्रष्टाचार को देखते हुए, हमने महसूस किया कि जब तक उन्हें निस्वार्थता, देशभक्ति, निर्भीकता और आत्मनिर्भरता के बारे में गहराई से शिक्षा नहीं दी जाती, तब तक संभवतः अंतिम परिणाम में कोई बदलाव नहीं आएगा. क्योंकि, यदि चेतना में कोई परिवर्तन नहीं होता है, और वह केवल बाहरी रंग से रंगी रहती है, तो हिसाब-किताब का समय आने पर स्वार्थ उसे आसानी से मिटा देता है. हमारे स्वतंत्र राष्ट्र को ऐसे स्थिर नागरिकों की आवश्यकता है. यही दैनिक कार्यक्रमों के माध्यम से मूल्यों को प्रदान करने का हमारा प्रयास था; और हम इसमें सफल भी हुए. आज, जहाँ एक ओर समर्पण और कर्तव्यबोध की कमी है, वहीं दूसरी ओर हजारों युवा हमारे शिविरों में असीम स्नेह, विश्वास और कर्तव्यबोध के साथ एकजुट हो रहे हैं.

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आदरणीय बापू और डॉ. अंबेडकर ने वर्धा के शिविरों का दौरा करने और वहां हरिजन और अन्य जातियों के बीच शुद्ध प्रेम को देखने के बाद कहा था कि यही असल में व्यावहारिक कार्य है. संघ अतीत में जीने वाला रूढ़िवादी संगठन नहीं है. पुरानी परंपराओं में जो अच्छा है, वही संघ के लिए अच्छा है. हम केवल अपनी संस्कृति, समाज और राष्ट्र से प्रेम करते हैं. हम इसे विकास के शिखर तक ले जाना चाहते हैं, और इसके लिए जो भी उपयोगी है, वह हमें स्वीकार्य है. हमारा किसी से कोई द्वेष नहीं है, लेकिन हम दूसरों को खुश करने के लिए अपना विकास रोकना नहीं चाहते. हमारा दृढ़ विश्वास है कि संस्कृति (मूल्य प्रणाली) का बलिदान करके राष्ट्र और समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता.
 
‘संघ के स्वयंसेवक कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेंगे’

पिछले कुछ वर्षों के अपने कड़वे अनुभव के आधार पर, हम विश्वास नहीं करते, बल्कि संदेह करते हैं. हमारा संदेह बना रहेगा, कोई भी समझदार व्यक्ति संदेह करेगा. जिस दिन हैदराबाद कांड उठा, उनके एजेंटों, जासूसों और उनके समर्थकों की बढ़ती संख्या को जेल में देखकर, क्या सरकार के अपने संदेह सही साबित नहीं हुए? इस समय, उन पर केवल इसलिए भरोसा करना तर्कसंगत नहीं कि वे बहुत शोर मचा रहे हैं. राष्ट्र के प्रति हमारा प्रेम किसी से कम नहीं है और राष्ट्र पर हमले के समय चुपचाप कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहने वाला और कोई नहीं मिलेगा. ऐसे कठिन समय में, आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर, बल्कि एक कदम आगे, मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ, कोई खड़ा होगा तो वो संघ द्वारा तैयार स्वयंसेवक होंगे. जब सरदार पटेल ने संघ के स्वयंसेवकों को निस्वार्थ देशभक्त कहा था, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं थी. आप हमारे अपने हैं, समय आने पर हम अपने विरोधियों को भी अपना बना लेंगे.
 
युधिष्ठिर का प्रसंग भी दिलाया याद

पूज्य गुरुजी ने अपने मुंबई के जनवरी में दिए हुए भाषण में महाराज युधिष्ठिर के उन सदैव स्मरणीय शब्दों में स्पष्ट कहा है, 'वयं पंचाधिकं शतम्,' हम  लोगों के कोई जयचंद और मानसिंह आदर्श नहीं हैं कि व्यक्तिगत हानि या लाभ के लिए या मान-अपमान के लिए देश को हानि होने दें. हमारे तो राणा प्रताप और शिवाजी आदर्श हैं. तो फिर हमसे, अपनों से भय कैसा, यही पहेली है.

जिस प्रकार अज्ञानतावश नवचेतना निर्माण का यह महान प्रवाह अवरुद्ध कर दिया गया, उससे किसके अंत:करण में वेदना ना होगी? संघ का कार्य बंद हो गया, परंतु निस्वार्थ देश प्रेमी, असीम साहसी और अनुशासन बद्ध सहश्रों उत्साही नवयुवक देश में निर्माण हो चुके हैं. वो अपने गुणों से अपने आसपास राष्ट्र के अंदर इन गुणों के उत्कर्ष का कार्य सदैव अक्षुण्ण रीति से करते रहेंगे. आपके प्रति इस कार्य के लिए क्रोध नहीं, घृणा नहीं, विरोध नहीं, हां ये अनभिज्ञता के कारण हुआ, बस यही महान दुख है. राष्ट्र और समाज, संस्था और व्यक्ति से बहुत ऊपर हैं और उन्हें इनकी वजह से कभी हानि नहीं पहुंचनी चाहिए. उसे हम उद्धत कर सकें, इस उद्योग में हम किसी से भी पिछड़ेंगे नहीं, यह निश्चित है. भविष्य में आपसे मिलने का और प्रत्यक्ष वार्तालाप करने का सौभाग्य मिले, यही अभिलाषा है.

पिछली कहानी: जब पांचजन्य के सम्पादक निकल पड़े ज्ञान की खोज में, 56 देशों का किया दौरा 

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