'क्या छूने से देवता अपवित्र हो जाते हैं...', सबरीमाला की सुनवाई के दौरान उठा सवाल, छठवें दिन परंपरा-प्रथा पर हुए तर्क

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच सबरीमाला मामले सहित धर्म बनाम कानून के विवाद पर बहस कर रही है. बहस में धार्मिक स्वतंत्रता, पूजा के अधिकार, परंपराएं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन पर सवाल उठाए गए.

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सबरीमाला मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है सबरीमाला मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है

अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली,
  • 21 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 6:39 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मुद्दे समेत धर्म बनाम कानून के मामले पर बहस जारी है. इस मामले में 9 जजों की बड़ी बेंच सुनवाई कर रही है, जिसमें छठें दिन भी बहस जारी रही. इस दौरान धार्मिक स्वतंत्रता, परंपराएं, आस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच बैलेंस पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठे.

सीनियर एडवोकेट गिरी ने दलील दी कि आर्टिकल-25 के तहत पूजा का अधिकार व्यक्ति की आस्था से जुड़ा है. उन्होंने कहा कि किसी मंदिर, मस्जिद या चर्च में जाने का अधिकार व्यक्ति के विश्वास का हिस्सा है. वकील गिरी ने कहा कि पूजा करना हर व्यक्ति का अधिकार है.जो व्यक्ति किसी भगवान में विश्वास करता है, उसे हर बार मंदिर जाकर यह समझने की जरूरत नहीं कि वहां पूजा कैसे होती है. उसकी आस्था उसके साथ रहती है—चाहे वह मंदिर जाए, मस्जिद जाए या चर्च.

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लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति मंदिर ही नहीं जाता, तो उसके ‘एंट्री के अधिकार’ को हर स्थिति में अनुच्छेद 25 के तहत नहीं माना जा सकता.

'क्या भगवान अपवित्र हो सकते हैं?'
उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर में ‘अर्चक’ (पुजारी) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है. यदि किसी अन्य संप्रदाय का अर्चक मूर्ति को स्पर्श करता है, जिसे आगम परंपरा मान्यता नहीं देती, तो यह श्रद्धालुओं की आस्था को ठेस पहुंचा सकता है. ऐसे में राज्य का कोई भी हस्तक्षेप धार्मिक मान्यताओं में दखल माना जाएगा.

हालांकि उन्होंने यह भी माना कि केवल जन्म के आधार पर किसी को पुजारी बनने से रोकना पूरी तरह अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित नहीं है.

बहस में यह मुद्दा भी उठा कि मंदिर में पुजारी कौन बन सकता है? कुछ परंपराओं में माना जाता है कि अगर गलत तरीके से या किसी अलग पंथ का पुजारी मूर्ति को छू ले, तो वह ‘अपवित्र’ हो सकती है.

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इसलिए, अगर सरकार ऐसे व्यक्ति को पुजारी बनने दे, जो परंपराओं (आगम) के अनुसार सही नहीं है, तो यह श्रद्धालुओं की आस्था के खिलाफ होगा

क्या जन्म के आधार पर पुजारी बनने से किसी को रोका जा सकता है?
इस दौरान यह भी सवाल उठा कि क्या किसी को सिर्फ जन्म के आधार पर पुजारी बनने से रोका जा सकता है? इस पर अभी साफ जवाब नहीं है. जस्टिस पी.बी. वराले ने पूछा कि आज के समय में, जब लोग पढ़े-लिखे हैं और नई सोच रखते हैं, क्या यह जरूरी है कि आस्था रखने वाला व्यक्ति तर्कहीन ही हो? जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा—अगर किसी धर्म के अंदर ही कोई व्यक्ति उसकी किसी परंपरा को गलत बताकर कोर्ट में चुनौती दे, तो क्या कोर्ट उस पर फैसला दे सकती है?

'कहीं शिवलिंग को छू सकते हैं कहीं नहीं'
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने समझाया कि हर मंदिर की अपनी परंपरा होती है. कहीं आप शिवलिंग को छू सकते हैं, कहीं नहीं. यह ‘छुआछूत’ नहीं है, बल्कि अलग-अलग पूजा पद्धति का हिस्सा है.इस पर सीनियर वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि यह मामला सिर्फ एक धर्म का नहीं है, इसलिए इसे सभी धर्मों के संदर्भ में देखना चाहिए.

वहीं गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि अब तक बहस ज्यादातर हिंदू धर्म के नजरिए से हुई है, जबकि हमें मुस्लिम, ईसाई और पारसी धर्मों के मामलों को भी देखना चाहिए—जैसे हिजाब विवाद या पारसी महिलाओं से जुड़े नियम.

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क्या कोई पंथ अपने नियम बना सकता है?

क्या कोई धार्मिक पंथ अपने नियम बनाकर यह तय कर सकता है कि कौन उसके धार्मिक स्थल में आएगा और कौन नहीं? शंकरनारायणन ने कहा कि अगर कोई पंथ कहता है कि जो उसकी खास परंपराएं नहीं मानता, उसे अंदर नहीं आने देंगे तो क्या यह सही है?

मंदिर में प्रवेश पर रोक का अधिकार होना चाहिए?

जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25(2) के अनुसार, सार्वजनिक मंदिर सभी वर्गों के लोगों के लिए खुले होने चाहिए. इस पर बहस है कि क्या यह नियम पंथों पर भी लागू होगा या नहीं.

क्या पंथ के बीच तनाव बढ़ेगा?

जस्टिस बागची ने पूछा, अगर एक वैष्णव को शैव मंदिर में जाने से रोका जाए, तो क्या इससे विवाद नहीं होगा? वहीं यह भी सवाल उठा कि अगर शिया मस्जिद या किसी चर्च में दूसरे संप्रदाय के लोगों को रोका जाए, तो उसका क्या नियम होगा? जस्टिस बागची ने पूछा कि अगर ऐसा हुआ तो क्या इससे सामाजिक तनाव नहीं बढ़ेगा? इस अहम मामले में संविधान पीठ धार्मिक अधिकारों और समानता के बीच संतुलन तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहलू पर विचार कर रही है.

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