'कई मंदिरों में औरत बनकर जाते हैं आदमी...', सबरीमाला मामले पर तीसरे दिन परंपराओं पर बहस

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की तीसरी सुनवाई में नौ जजों की संवैधानिक पीठ ने सात संवैधानिक सवाल तय किए हैं. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे में अपनी दलीलें दीं, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता वैद्यनाथन ने मंदिर की परंपराओं पर प्रकाश डाला.

Advertisement
सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच सुनवाई कर रही है सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच सुनवाई कर रही है

अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली,
  • 09 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 5:09 PM IST

सबरीमाला मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है. गुरुवार को इस सुनवाई का तीसरा दिन है. नौ जजों की संवैधानिक पीठ ने इस मामले की सुनवाई के लिए सात संवैधानिक सवाल तय किए हैं. सुप्रीम कोर्ट में हो रही बहस इन्हीं सवालों पर आधारित है और इसी दायरे में रहकर तर्क किए जा रहे हैं, लेकिन ये दायरा भी इतना फैला हुआ है कि बहस में कई मुद्दे शामिल हो जा रहे हैं.

Advertisement

कुछ मंदिरों में पुरुषों को जाने की मनाही
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि, 'मैंने ऐसे मंदिरों के उदाहरण दिए हैं, जहां पुरुषों को जाने की अनुमति नहीं है. वहां पुरुष पुजारियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे महिला श्रद्धालुओं के पैर धोएं. केरलम में एक ऐसा मंदिर है, मैंने इसके बारे में पढ़ा है, जहां पुरुष महिलाओं की वेशभूषा में जाते हैं.

वे ब्यूटी पार्लर जाते हैं और परिवार की महिला सदस्य उन्हें साड़ी पहनाने में मदद करती हैं और वहां केवल पुरुष ही जाते हैं. इसलिए यह धार्मिक प्रथा न तो पूरी तरह से पुरुष-केंद्रित है और न ही महिला-केंद्रित.यह विशेष उदाहरण संयोगवश महिला-केंद्रित है.

क्या बोले चीफ जस्टिस?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि, 'मैंने अपनी दलीलों को केवल अनुच्छेद 25 और 26 के मुद्दे तक सीमित रखा है. मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण जैसे मुद्दों पर मैंने अपनी बात नहीं रखी है. वहीं, सीजेआई ने कहा कि हम केवल अपने सामने मौजूद 7 कानूनी सवालों पर ही विचार कर रहे हैं. सॉलिसिटर जनरल ने केंद्र सरकार की ओर से अपनी दलीलें पूरी कर ली हैं. इसके बाद एएसजी केएम नटराज ने केंद्र की ओर से अपनी दलीलें रखीं.

Advertisement

'सबरीमाला की परंपराओं को लेकर भ्रम बना'
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता वैद्यनाथन ने सबरीमाला की परंपरा के बारे में बात की. उन्होंने कहा कि, 'सबरीमाला मंदिर में ऐसा कोई भेदभाव नहीं किया जाता कि वहां ईसाइयों या मुसलमानों की एंट्री पर कोई रोक है; बल्कि शर्त केवल यह है कि उन्हें अयप्पा की दिव्यता और शक्ति में पूर्ण आस्था और विश्वास होना चाहिए.'

साथ ही, उन्हें 40 दिनों का 'व्रतम' (व्रत) रखना होगा और भक्तों के लिए निर्धारित सभी धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करना होगा. किसी को भी वहां जाने से प्रतिबंधित नहीं किया जाता है, इसलिए इस अवधारणा को सही ढंग से समझा नहीं गया है. यह समझना बिल्कुल भी जरूरी नहीं है कि 'धार्मिक संप्रदाय' का अर्थ केवल यह हो कि व्यक्ति को किसी एक विशिष्ट धर्म से ही जुड़ा होना चाहिए - यह एक भ्रामक और गलत धारणा है.'

केरलम के कुछ मंदिरों में खास पहनावों की परंपराएं
इस बात को आगे बढ़ाते हुए जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि, केरलम के कुछ मंदिरों में, आप धोती के अलावा पैंट-शर्ट पहनकर नहीं जा सकते और आप यह जिद भी नहीं कर सकते कि आपको शर्ट पहनकर ही मंदिर में जाना है. तब सीजेआई सूर्यकांत ने भी इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, गुरुवायुर मंदिर में आप शर्ट पहनकर नहीं जा सकते.

Advertisement

आपको शर्ट उतारनी पड़ती है. उत्तर भारत में, जब आप किसी गुरुद्वारे, स्वर्ण मंदिर जाते हैं, तो आपको अपना सिर ढकना पड़ता है. लाखों हिंदू गुरुद्वारे जाते हैं लेकिन वे अपना सिर ढकते हैं.

तब जस्टिस बागची ने कहा कि, ये सभी उदाहरण आर्टिकल 26(b) की बात को सामने रखते हैं. यह प्रधानता धार्मिक मामलों के प्रबंधन से जुड़े अधिकारों को लेकर है, जो कि रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों के जरिए सामने आते हैं और यह प्रधानता उस कोर इंटरनल बिलीफ से ऊपर है, जिसे 'अंतरात्मा की स्वतंत्रता' और उससे जुड़े अधिकारों के रूप में परिभाषित किया गया है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement