सोना न खरीदने, विदेश यात्रा टालने, ईंधन बचाने, वर्क फ्रॉम होम, कारपूलिंग और इलेक्ट्रॉनिक वाहनों के इस्तेमाल की अपील कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नागरिकों से विदेशी मुद्रा भंडार बचाने, ईंधन आयात कम करने की अपील की है. यह अपील नई नहीं है. भारत के इतिहास में संकट के समय प्रधानमंत्रियों ने बार-बार राष्ट्रहित में व्यक्तिगत त्याग की पुकार की है. 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान देश के पहले पीएम पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देशवासियों से अपना सोना दान करने को कहा था.
इसके आगे और 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ऐसी ही ऐतिहासिक अपील की थी.
1971 के युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी ने शरणार्थियों के बोझ और रक्षा खर्च के लिए जनता से दान की अपील की थी. PM इंदिरा ने स्वयं के आभूषण दान कर मिसाल पेश की.
जब नेहरू ने कहा- दान करें सोना
सोना न खरीदने की अपील पर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी की तीखी आलोचना की है. राहुल ने कहा, "मोदी जी ने कल जनता से कुर्बानी मांगी. सोना मत खरीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम इस्तेमाल करो, फर्टिलाइजर और कुकिंग ऑयल कम करो, मेट्रो से जाओ, घर से काम करो. ये उपदेश नहीं हैं- ये नाकामी के सबूत हैं."
लेकिन 1960 की बात है. जब चीन ने भारत के साथ विश्वासघात करते हुए, पंचशील की नीति को ठेंगा दिखाते हुए भारत पर हमला कर दिया था.
इस मुश्किल घड़ी में प्रधानमंत्री नेहरू ने देश की जनता से नेशनल डिफेंस फंड में सोना और पैसे दान करने की अपील की थी.
यह फंड उसी साल रक्षा जरूरतों को पूरा करने और सेना के जवानों और उनके परिवारों की भलाई के लिए बनाया गया था.
उस समय के एक दस्तावेज में कहा गया था, "चीन अभी भी लद्दाख में 14,000 वर्ग मील भारतीय इलाके पर कब्ज़ा किए हुए है और हमारी सीमाओं पर अपने सैनिकों को जमा कर रहा है." "हमें किसी भी नए हमले का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा. आइए हम अपना वादा दोहराएं कि जब तक आखिरी हमलावर हमारी ज़मीन से बाहर नहीं निकल जाते, तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे."
कैंपेन में नेहरू की अपील पर जनता ने शानदार रिस्पॉन्स दिया. एक रिपोर्ट में लिखा गया, "रिएक्शन शानदार था, लोगों ने दिल खोलकर दिया. पूरे दिल से. क्योंकि हमें एहसास हुआ कि आजादी के लिए कोई भी कुर्बानी बहुत बड़ी नहीं होती. "
इस कैंपेन की सबसे खास लाइनों में से एक थी, "आइए हम सोना दें. आज सोने की चूड़ियों का क्या फायदा, अगर कल हम सब लोहे की बेड़ियों में जकड़े होंगे?"
गहने-जेवर लेकर पहुंचीं इंदिरा
पिता नेहरू की अपील पर दान करने वालों में इंदिरा गांधी एक अहम शख्सियत थीं. रक्षा मंत्रालय की 2009 में छपी एक कॉफ़ी टेबल बुक के मुताबिक इंदिरा गांधी ने लड़ाई के दौरान नेशनल रिलीफ फंड में 367 ग्राम सोने की ज्वैलरी दान की थी.
इंदिरा का ये दान उदाहरण बन गया था. इसके बाद मुहिम चल पड़ी. घरों से महिलाएं जेवर निकल पड़ीं और उनसे जो कुछ भी बन पड़ रहा था, वे दान कर रही थीं.
शास्त्री के सामने फिर परीक्षा की घड़ी
चूंकि देश नया-नया स्वतंत्र हुआ था. विदेशी मुद्रा की किल्लत होती रही थी. और आबादी के बड़े हिस्से के लिए भोजन जुगाड़ करना भी मुश्किल हो रहा था.
1965 में जब भारत-पाक युद्ध हुआ तो देश पर खाद्यान्न और युद्ध का दोहरा संकट आ गया. अमेरिका ने अनाज देने के बदले भारत पर शर्तें थोपने की कोशिश की. लेकिन शास्त्री जी ने स्वाभिमान का रास्ता चुना और झुकने से इनकार कर दिया.
उन्होंने पहले अपने परिवार को सप्ताह में एक दिन एक वक्त का भोजन छोड़ने के लिए प्रेरित किया. जब परिवार ने इसे स्वीकार कर लिया, तब उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो पर राष्ट्र को संबोधित किया, “एक वक्त का खाना छोड़ दो, देश की रक्षा करो.”
इस तरह शुरू हुआ शास्त्री व्रत...
पीएम शास्त्री की अपील पर पूरा देश खड़ा हो गया. लाखों लोगों ने उपवास रखा, अनाज बचाया. इसे शास्त्री व्रत का नाम दिया गया.
शास्त्री जी की अपील पर लाखों-करोड़ों लोग सप्ताह में एक दिन उपवास रखने लगे. कई होटल-रेस्तरां सोमवार शाम को बंद हो जाते थे. इसे “शास्त्री व्रत” के नाम से जाना गया,
पीएम शास्त्री का यह आह्वान “जय जवान, जय किसान” नारे के साथ जुड़ा, जिसमें शास्त्री जी ने सैनिकों और किसानों को देश की रीढ़ बताया और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया. यह नेतृत्व उदाहरण का था. शास्त्री जी के प्रयासों ने हरित क्रांति की नींव रखी और भारत को खाद्यान्न आयात पर से निर्भरता खत्म करने में मदद मिली.
PM मोदी ने आज एक बार फिर से अपील की
इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को एक फिर से अपील की है कि हमें हर छोटे-बड़े प्रयास से ऐसे उत्पादों का उपयोग कम करना है जो विदेश से आते हैं और ऐसे व्यक्तिगत कामों से भी बचना है जिसमें विदेशी मुद्रा खर्च होती हो.
हमें भारत के नागरिक के तौर पर अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देनी होगी. पीएम मोदी ने देशवासियों को याद दिलाते हुए कहा कि इससे पहले के दशकों में भी जब-जब देश युद्ध या किसी और अन्य बड़े संकट से गुजरा है, सरकार की अपील पर हर नागरिक ने ऐसे ही अपना दायित्व निभाया है.
आज भी जरूरत है कि हम सब मिलकर अपना दायित्व निभाएं. देश के संसाधनों पर पड़ने वाले बोझ को कम करें.
पन्ना लाल