'ऑपरेशन सिंदूर' की पहली सालगिरह: भुज के 'किलर' दलदल और भारतीय सेना के शौर्य की अनसुनी कहानी

भुज की वो सरहद जहां 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान जबरदस्त जंग हुई थी, आज वहां भारतीय सेना का अभेद्य कॉम्बैट ग्रिड तैयार है. धंसते दलदल, जहरीले मैंग्रोव और खारी खाड़ियों के बीच ड्रोन और पेट्रोल बोट्स की गूंज दुश्मन को कड़ा संदेश दे रही है. देश की पश्चिमी सीमा के सबसे दुर्गम मोर्चे से आजतक की साहसी ग्राउंड रिपोर्ट.

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नमक के रेगिस्तान में भारतीय सेना का 'चक्रव्यूह', भुज में 150 KM अंदर तक पहुंची आजतक की टीम. (Photo: ITG) नमक के रेगिस्तान में भारतीय सेना का 'चक्रव्यूह', भुज में 150 KM अंदर तक पहुंची आजतक की टीम. (Photo: ITG)

शिवानी शर्मा

  • भुज/नई दिल्ली,
  • 22 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 5:18 PM IST

पाकिस्तान सीमा से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित भुज आज भी भारत की पश्चिमी सुरक्षा का एक बेहद अहम और संवेदनशील है. यहां की फ्रंटलाइन पर हालात ज्यादा सतर्क नजर आते हैं. क्रीक सेक्टर से लेकर कच्छ का रण तक, भारत की पश्चिमी सीमा हाई अलर्ट पर है. यहां ड्रोन, एयर डिफेंस गन, पेट्रोल बोट और इन्फेंट्री एक मजबूत कॉम्बैट ग्रिड के तहत तैनात हैं, जो हर गतिविधि पर नजर बनाए हुए हैं.

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भारत ऑपरेशन सिंदूर की पहली सालगिरह मना रहा है. ऐसे में मैंने सबसे रणनीतिक और मुश्किल फ्रंटलाइन भुज का दौरा किया. यह सिर्फ एक सामान्य मिलिट्री लोकेशन नहीं है. यह वही जगह है जहां ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने हमला करने की कोशिश की थी. यहां पहुंचकर आज भी उस पल की गंभीरता साफ महसूस होती है. मेरी यात्रा भुज से शुरू हुई. इस इलाके का इतिहास बहुत समृद्ध रहा है. 

15वीं सदी में भुज एक प्रमुख बंदरगाह शहर हुआ करता था. लखपत किला, आईना महल और कई अन्य ऐतिहासिक स्थल इस क्षेत्र की प्राचीन वास्तुकला और समृद्धि की कहानी बताते हैं. हालांकि, 18वीं सदी में आए एक बड़े भूकंप ने इस पूरे इलाके का भूगोल बदल दिया, लेकिन भुज की पहचान और जज्बा वैसा ही बना रहा. इसके बाद भी भुज ने कई बड़े भूकंप झेले, जिनमें 2001 का भूकंप सबसे विनाशकारी था. 

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इस आपदा ने लोगों की जिंदगी और इंफ्रास्ट्रक्चर को बुरी तरह प्रभावित किया. लेकिन भुज ने फिर से खुद को खड़ा किया. आज यह देश के प्रमुख औद्योगिक और ऊर्जा सुरक्षा केंद्रों में गिना जाता है, जहां सीमेंट फैक्ट्रियां, पवन चक्कियां और नमक रिफाइनरियां सक्रिय हैं. पर्यटक इस इलाके में कच्छ के नमकीन विस्तार को देखने आते हैं, जिसे 'सॉल्ट डेजर्ट' यानी नमक का रेगिस्तान कहा जाता है. 

इसके साथ ही पर्यटक कच्छ की समृद्ध संस्कृति और इतिहास को करीब से जानने की कोशिश करते हैं. लेकिन एक डिफेंस रिपोर्टर के तौर पर, आपको उन जगहों तक जाने का मौका मिलता है, जो आम लोगों की नजरों से दूर और बेहद दुर्गम होता हैं. जैसे ही मैं करीब 150 किलोमीटर दूर पहुंची आसपास का नजारा धीरे-धीरे बदलने लगा. सड़कें सुनसान होती गईं. एक अजीब और अलग माहौल नजर आने लगा.

हवा में खामोशी थी, जिसे सिर्फ तेज हवा की आवाज ही तोड़ रही थी. मैं क्रीक की तरफ बढ़ी. उस इलाके तक पहुंची, जो भारत-पाकिस्तान सीमा के बेहद करीब है. अपनी संवेदनशीलता की वजह से हमेशा चर्चा में रहा है, लेकिन सुरक्षा कारणों से इसे बहुत कम देखा गया है. डेढ़ दशक के डिफेंस रिपोर्टिंग करियर में मैं इस इलाके को दूसरी बार देख रही था. पहले 2021 में मैं इंडियन कोस्ट गार्ड के साथ आई थी.

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वहां खड़े होकर साफ महसूस होता है कि यह लड़ाई के लिए बिल्कुल भी आसान इलाका नहीं है. यहां दलदली जमीन, मैंग्रोव, छोटी-छोटी खाड़ियां और समुद्र, सब एक साथ मौजूद हैं. हवा में नमक की महक घुली रहती है, जमीन अस्थिर महसूस होती है और हर कदम अनिश्चित लगता है. इसके बावजूद यहां इंडियन आर्मी पूरी मजबूती और नियंत्रण के साथ अपनी तैनाती बनाए रखती है. हमेशा सतर्क नजर आती है.

भारत का बेजोड़ युद्ध तंत्र और जवान

मैंने इस इलाके में युद्ध अभियानों को अपनी आंखों से देखा. यह एक ही समय पर बेहद ज़ोरदार और रोमांचक अनुभव था. पानी को चीरती हुई तेजी से आगे बढ़ती पेट्रोल बोट, कार्रवाई के लिए तैयार हवाई सुरक्षा तोपें, सिर के ऊपर लगातार उड़ते ड्रोन, सावधानी से आगे बढ़ते विशेष वाहन और रणनीतिक रूप से तैनात पैदल सेना की टुकड़ियां, सब कुछ एक समन्वित तंत्र की तरह काम करता हुआ नजर आया.

यहां करीब 96 किलोमीटर के दायरे में छह खाड़ियां फैली हुई हैं. एक तरफ खारे पानी के दलदल हैं, तो दूसरी तरफ घने मैंग्रोव के जंगल, जो सांपों और अनजान खतरों से भरे हुए हैं. इसके बावजूद, सेना पानी और जमीन, हर इंच पर अपना पूरा नियंत्रण बनाए रखती है. खास कमांडो इन इलाकों में जिस आत्मविश्वास के साथ गश्त करते हैं, वह केवल लंबे अनुभव से ही आता है.

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भुज के आसमान का सुरक्षा कवच

जब मैंने इस युद्ध अभ्यास को करीब से देखा, तो ऐसा लगा मानो कोई वास्तविक ऑपरेशन चल रहा हो. दुश्मन के ठिकानों की पहचान तेजी से की गई और उन पर बेहद सटीक हमला किया गया. AK-203 राइफल और अन्य आधुनिक हथियारों से लैस सैनिक पूरी एकाग्रता और शांति के साथ आगे बढ़ रहे थे. हर गतिविधि में तालमेल, तेजी और नियंत्रण साफ दिखाई दे रहा था.

एक बात ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वो था हवाई सुरक्षा कवच. L-70 हवाई सुरक्षा तोप, ड्रोन और रडार सिस्टम यहां हर समय सक्रिय रहते हैं. 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान, इसी सुरक्षा कवच ने भुज के आसमान की रक्षा की थी. पाकिस्तान के कई ड्रोन मार गिराए थे. वहां खड़े होकर उन तनावपूर्ण पलों की गंभीरता को महसूस किया जा सकता है. उस जंग में शामिल जवान आज भी मौजूद हैं.

शांत, सतर्क और पूरी तरह तैयार रहने वाले इन जवानों में से कई को उनकी बहादुरी के लिए सम्मानित भी किया जा चुका है. यह इलाका अपने आप में हर कदम पर चुनौती पेश करता है. ज्वार-भाटे के साथ दलदल का स्वरूप बदलता रहता है, जमीन पर भरोसा करना मुश्किल होता है. यहां चलना-फिरना कभी आसान नहीं होता. लेकिन सेना ने खुद को इस माहौल के अनुरूप ढाल लिया है.

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यही कठिन भौगोलिक परिस्थितियां अब उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई हैं. 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए हमले के बाद, सेना ने इस सेक्टर में अपनी स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत कर ली थी. हवाई सुरक्षा तोपों से लेकर खाड़ियों में गश्त करने वाली नावों तक, रडार निगरानी से लेकर पैदल सेना, टैंक और तोपखाने तक, हर स्तर पर तैयारी पूरी थी. 

एक नई युद्ध रणनीति का आकार लेना

भारतीय वायुसेना, नौसेना, सीमा सुरक्षा बल और तटरक्षक बल के साथ भी पूरा तालमेल स्थापित था. ये साफ दिख रहा था कि पाकिस्तान की ओर से किसी भी जवाबी कार्रवाई का सामना करने के लिए वे पूरी तरह तैयार हैं. आज भी खाड़ी क्षेत्र में सेना का दबदबा पूरी तरह कायम है. मैंने गश्ती नावों के युद्धाभ्यास को करीब से देखा, जिसमें उनकी जबरदस्त कुशलता और नियंत्रण दिख रहा था. 

मैंने 'अशनी' प्लाटून को भी देखा, जो ड्रोन आधारित विशेष यूनिट है. ये दिखाती है कि युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. ड्रोन ट्रेनिंग लैब में यह साफ नजर आया कि सैनिकों को ड्रोन वॉरियर बनने के लिए किस तरह तैयार किया जा रहा है. सिमुलेटर से लेकर बाधाओं के साथ वास्तविक फील्ड ट्रेनिंग तक, सेना लगातार सीख रही है. इसके साथ ही खुद को आधुनिक युद्ध के अनुरूप ढाल रही है.

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कच्छ का रण: शांत, खुला और बेरहम

इसके बाद मैं कच्छ के रण पहुंची, जो पाकिस्तान की सीमा से महज 40 किलोमीटर दूर है. जैसे-जैसे मैं सीमा के करीब पहुंची, जमीन एक विशाल सफेद खाली विस्तार में बदलती चली गई. रण अंतहीन लगता है. बेहद शांत, कठोर और लगभग अवास्तविक. यह भी वही इलाका है जिसे 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान पाकिस्तान ने निशाना बनाने की कोशिश की थी. लेकिन भारतीय सेना ने जोरदार जवाब दिया.

पाकिस्तानी ड्रोन मार गिराए और पूरे क्षेत्र पर अपना नियंत्रण बनाए रखा. रण में खड़े होकर मैंने महसूस किया कि यह इलाका वास्तव में कितना कठिन है. यहां कोई साफट निशान नहीं हैं. जमीन लगातार खिसकती रहती है. तापमान हमेशा ज्यादा रहता है. कई बार ऐसा लगता है जैसे जमीन और आसमान एक हो रहे हों. सूरज मानो जमीन में ही समा रहा हो. दूर-दूर तक मृगतृष्णा बनती दिखाई देती है.

इस वजह से अपनी आंखों पर भरोसा करना भी मुश्किल हो जाता है. इस नरम और नमकीन जमीन पर चलना बिल्कुल आसान नहीं है. यहां आगे बढ़ने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है, क्योंकि नमी शरीर की ऊर्जा को जल्दी खत्म कर देती है. इसके बावजूद, सेना यहां टैंक, तोपखाना, L-70 हवाई सुरक्षा तोप, ड्रोन और पैदल सेना की टुकड़ियों के साथ लगातार सक्रिय है. पूरी तरह तैनात और चौकस है.

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'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान की गई तैयारियां आज भी उसी मजबूती के साथ कायम हैं. सैनिक नियमित रूप से अभ्यास करते हैं और हर समय तैयार रहते हैं. मेरे लिए इस इलाके में कुछ घंटों तक टिके रहना भी मुश्किल था, क्योंकि यहां का भूगोल बेहद कठिन है और मौसम अत्यंत कठोर. लेकिन 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान हमारे जवान अप्रैल-मई 2025 में 50 डिग्री तक के तापमान में मुस्तैदी से डटे रहे. 

जंग की तैयारी के लिए लगातार अभ्यास किए गए. जिस तरह से सैनिक अपने साजो-सामान को संभालते हैं, हवाई सुरक्षा तोपों और टैंकों की तैनाती और वापसी करते हैं, और जिस तरह से तोपखाने का संचालन करते हैं, यह सब उनकी ऊर्जा, तत्परता और देश की सीमाओं की रक्षा के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है. मैंने ब्रिगेडियर नीरज खजूरिया से भी बात की, जो 75 (स्वतंत्र) इन्फैंट्री ब्रिगेड के कमांडर हैं. 

उन्होंने बताया कि सेना ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया है और जमीन पर मौजूद सभी संसाधनों के साथ आज भी पूरी तरह तैयार है. यहां आकर सबसे गहरी समझ यह बनी कि रण और खाड़ियों में होने वाली लड़ाई पूरी तरह अलग होती है. यह पारंपरिक युद्ध नहीं है, बल्कि इलाके, मौसम और अनिश्चितताओं के खिलाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई है. भारतीय सेना ने इस पर पूरी तरह महारत हासिल कर ली है. 

भुज का संदेश: पूरी तरह तैयार है भारत

यही कारण है कि इस क्षेत्र में भारत को बढ़त हासिल है. भुज में 'ऑपरेशन सिंदूर' ने एक नए तरह के युद्ध का भी संकेत दिया, खासकर ड्रोन से जुड़े खतरों के संदर्भ में. लेकिन यहां का हवाई सुरक्षा घेरा पूरी तरह मजबूत और अभेद्य साबित हुआ. L-70 हवाई सुरक्षा तोप जैसी प्रणालियों ने एक बार फिर साबित किया कि भारत किसी भी हवाई खतरे का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है.

यह पूरा क्षेत्र भारत की एकीकृत युद्ध क्षमता को दर्शाता है. तोपखाना, टैंक, ड्रोन और पैदल सेना, सब एक साथ मिलकर बिना किसी रुकावट के काम करते हैं. 'ऑपरेशन सिंदूर' केवल रक्षा तक सीमित नहीं था. इसने यह दिखाया कि भारत अपनी शर्तों पर किसी भी स्थिति का जवाब दे सकता है, उस पर नियंत्रण पा सकता है और उसे पूरी तरह संभाल सकता है. भुज से मिला संदेश बिल्कुल स्पष्ट है.

भारत मजबूत है, तैयार है और पूरी तरह सतर्क है. सीमा पार से होने वाली किसी भी दुस्साहसिक कार्रवाई का न सिर्फ जवाब दिया जाएगा, बल्कि उसे पूरी तरह विफल भी किया जाएगा. जब मैं वहां खड़ी थी, उस विशाल कच्छ का रण और शांत खाड़ियों को देख रहा था, तो यह एहसास हुआ कि यह सिर्फ एक सालगिरह मनाने की बात नहीं है. यह भविष्य के लिए हमारी तैयारी का प्रतीक है. 

देश के सबसे दुर्गम इलाकों में से एक भुज में भारतीय सेना पूरी दृढ़ता के साथ तैनात है. हर पल चौकस, हर पल तैयार और हमेशा एक कदम आगे है. जय हिंद.

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