देश में कैश ट्रांसफर और तथाकथित मुफ्त योजनाओं की आर्थिक स्थिरता को लेकर बहस छिड़ी है. इस बीच खुलासा हुआ है कि नीति आयोग के पास राज्य सरकारों की तरफ से घोषित ऐसी योजनाओं के वित्तीय या दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव की जांच करने वाली कोई स्टडी, असेसमेंट या आंतरिक प्रस्ताव नहीं है.
दरअसल इंडिया टुडे ने 26 नवंबर, 2025 को एक आरटीआई दाखिल की थी. इसमें नीति आयोग के मुफ्त योजनाओं के वित्तीय निहितार्थ, राजकोषीय स्थिरता या दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव पर की गई किसी भी स्टडी, मूल्यांकन या रिव्यू की डिटेल्स मांगी गई थी.
नीति आयोग ने साफ तौर पर कहा कि उसके पास इस मामले में किसी तरह की कोई जानकारी नहीं है. नीति आयोग ने जवाब में अपनी वेबसाइट पर जाने की भी सलाह दी. इस आरटीआई के जरिए केंद्र सरकार के नीतिगत तंत्र में एक चौंकाने वाली खामी को उजागर किया है.
मुफ्त योजनाओं के परिणामों पर कोई स्टडी नहीं
पीएम मोदी और वरिष्ठ अधिकारियों बार-बार इस मुद्दे को गंभीर आर्थिक जोखिम बताते आए हैं. ऐसे में नीति आयोग का शोध रिकॉर्ड अहम हो जाता है. अपनी सालाना रिपोर्टों के मुताबिक, थिंक टैंक ने 2022 से अब तक 34 स्टडीज की हैं और इसी अवधि में 32 नई रिसर्च स्टडीज को मंजूरी भी दी गई है. लेकिन इनमें से कोई भी सरकारी मुफ्त योजनाओं की राजकोषीय स्थिरता या दीर्घकालिक आर्थिक परिणामों से जुड़ी नहीं है.
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नीति आयोग रिसर्च टॉपिक कैसे चुनता है, ये जानने के लिए इंडिया टुडे ने 8 जनवरी, 2026 को एक और आरटीआई दायर की थी. इसके जवाब में आयोग ने कहा, 'नीति वेबसाइट पर उपलब्ध आरएसएनए दिशानिर्देश देखें.'
नीति आयोग रिसर्च का टॉपिक कैसे चुनता है?
नीति आयोग के रिसर्च प्लान (आरएसएनए) 2021 के तहत, रिसर्च टॉपिक या तो इनवाइट किए जा सकते हैं, जहां नीति आयोग प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करता है और प्रपोजल इनवाइट करता है. या फिर नीति आयोग अनसोलिसाइट करता है, जहां बाहरी संगठन प्रपोजल पेश करते हैं.
गाइडलाइन्स से पता चलता है कि दोनों ही मामलों में रिसर्च डिपार्टमेंट को प्रपोजल का एनालिसिस करना होगा. आगे के प्रोसेस से पहले इन-प्रिंसिपल अप्रूवल लेना होगा. हालांकि टॉपिक सिलेक्शन पर प्रभावी नियंत्रण नीति आयोग के इंटरनल डिपार्टमेंट और सीनियर लीडरशिप के पास ही रहता है.
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अधिकारियों ने दी थी लोकलुभावन योजनाओं के खिलाफ चेतावनी
बता दें कि 4 अप्रैल, 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई एक बैठक में कई शीर्ष अधिकारियों ने विधानसभा चुनावों के दौरान घोषित लोकलुभावन योजनाओं के खिलाफ चेतावनी दी थी और कहा था कि अगर ये सब बिना रोक-टोक के जारी रहा, तो कुछ राज्य श्रीलंका या ग्रीस जैसी आर्थिक संकट की स्थिति में पहुंच सकते हैं.
मुफ्त योजनाओं को पीएम मोदी ने बताया था 'रेवड़ी संस्कृति'
17 जुलाई, 2022 को पीएम मोदी ने इसे 'रेवड़ी संस्कृति' करार दिया था. उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के कैथेरी में उन्होंने इसे 'शॉर्टकट राजनीति' बताया था. पीएम मोदी ने कहा था कि वोट हासिल करने के लिए मुफ्त योजनाएं बांटना देश के विकास और युवाओं के भविष्य के लिए "बहुत खतरनाक" है. उन्होंने झारखंड के देवगढ़ में भी यही बात दोहराई और चेतावनी दी कि ऐसे लोकलुभावन वादे आर्थिक "अस्थायी" परिणाम ला सकते हैं.
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RBI ने भी किया था विरोध
आरबीआई ने भी अपनी रिपोर्ट 'राज्य वित्त: 2024-25 के बजट का अध्ययन' में बताया है कि कई राज्यों ने कृषि ऋण माफी, कृषि और परिवारों को मुफ्त बिजली, मुफ्त परिवहन, बेरोजगार युवाओं को भत्ते और महिलाओं को डायरेक्ट आर्थिक सहायता जैसी रियायती योजनाओं की घोषणा की है. आरबीआई ने चेताया है कि इस तरह के खर्च से "राज्यों के पास उपलब्ध संसाधन कम हो सकते हैं और अहम सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ढांचा चरमरा सकता है.
अशोक उपाध्याय