महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति में भी शरद पवार का कद इतना मजबूत है कि वह कई मौकों पर विपरीत ध्रुव की राजनीति को आपस में मिलाने में सफल रहे हैं. कुछ दिन पहले जैसे ही उन्होंने एनसीपी प्रमुख के पद से इस्तीफा देने का ऐलान किया तो उनके समर्थक मायूस होकर रोने तक लगे. पवार का कद कितना बड़ा है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि एनसीपी ही नहीं, विपक्ष के नेता भी उनसे इस्तीफे पर फिर से विचार करने को कह रहे हैं. राजनीति में कई ऐसे मोड़ आए हैं जब पवार अपनी 'पावर पॉलिटिक्स' के जरिए ना केवल सियासी धारा को बदलने में सफल रहे हैं, बल्कि उसे अंजाम तक भी पहुंचाया है. तो आइए आपको उन पांच मौकों के बारे में बताते हैं, जब पवार ने साबित किया कि वही असल में राजनीति के चाणक्य हैं -
कांग्रेस से अपनी राजनीति शुरू करने वाले पवार ने आपातकाल के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक से बगावत करते हुए कांग्रेस छोड़ दी. 1978 में उन्होंने जनता पार्टी के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाई और खुद सीएम बने. 1980 में जैसे ही इंदिरा सरकार ने वापसी की तो पवार सरकार को बर्खास्त कर दिया गया. 1983 में उन्होने कांग्रेस पार्टी सोशलिस्ट के नाम से नए दल का गठन किया और इसके सिंबल पर बारामती से सांसद भी बने. 1985 में पवार की पार्टी ने राज्य विधानसभा में 54 सीटें जीतीं और पवार लोकसभा से इस्तीफा देकर राज्य की राजनीति में आ गए और नेता प्रतिपक्ष बने.
राजीव गांधी की सरकार के दौरान 1987 में पवार फिर से कांग्रेस में वापस आ गए. इसके बाद वह 1988 में फिर से महाराष्ट्र के सीएम बने और कुछ समय बाद केंद्र में मंत्री बन गए.1990 के विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस को 288 सीटों में 141 सीटें मिली तो पवार ने 12 निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में कर लिया और फिर से राज्य के मुख्यमंत्री बन गए.1999 को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मात्र एक वोट से गिर गई और इसके साथ ही13वें लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो गई. इसी बीच सीताराम केसरी की जगह सोनिया गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया और उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी घोषित करने की बातें होनी लगीं.सब वजहों से कांग्रेस में बगावत हो गई.
इस बगावत के तीन अहम किरदार- शरद पवार, तारिक अनवर और पीए संगमा. तीनों ने सोनिया गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. तीनों ने सोनिया गांधी के 'विदेशी मूल' होने पर सवाल उठाया. उनका कहना था कि एक विदेशी मूल के व्यक्ति को भारत का प्रधानमंत्री कैसे बनाया जा सकता है? सोनिया गांधी के खिलाफ बगावत ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी की नींव रखी. शरद पवार ने तारिक अनवर और पीए संगमा के साथ मिलकर 10 जून 1999 को एनसीपी का गठन किया. उसी साल अक्टूबर में महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए. एनसीपी का ये पहला विधानसभा चुनाव था. पार्टी ने राज्य की 288 सीटों में से 223 पर अपने उम्मीदवार खड़े किए. कांग्रेस जहां 75 सीटें जीतने में सफल रही तो एनसीपी के हिस्से में 58 सीटें आईं. बाद में दोनों दलों ने मिलकर सरकार बनाई.
कोई सोच भी नहीं सकता था कि शिवसेना जैसी कट्टर हिंदूवादी पार्टी कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बना सकती है और ऐसा 2019 में हुआ. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी-शिवसेना गठबंधन टूट गया. इसके बाद बीजेपी ने रातों-रात अजित पवार के साथ मिलकर सरकार बना ली. लेकिन यहां पवार ने एनसीपी विधायकों को एकजुट करते हुए एक भी विधायक को अजित पवार के पाले में नहीं जाने दिया और परिणाम ये हुआ कि सरकार महज कुछ घंटों में गिर गई. इसके बाद शरद पवार ने न केवल तत्कालीन शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को मनाया बल्कि दो विपरीत विचारधारा वाली पार्टियों को एक पाले में लाकर महाविकास अघाड़ी का गठन कर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में सरकार बना दी. पवार को यहां तीन पार्टियों- कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना को मिलकर बने महाविकास अघाड़ी का अध्यक्ष बनाया गया. इसके बाद जब- जब अघाड़ी सरकार पर संकट आया, तो पवार एक पिलर बनकर सरकार के बचाव में खड़े रहे.
प्रधानमंत्री मोदी विपक्ष के कुछ गिने-चुने नेताओं के ही करीबी माने जाते हैं, जिनमें पवार का नाम सबसे ऊपर है. जुलाई 2021 में जब पवार ने पीएम मोदी से मुलाकात की तो राजनीतिक अटकलों का बाजार गर्म हो गया. हालांकि इससे पहले 2019 में भी पवार इसी तरह पीएम मोदी से मिले थे और तब भी कई तरह की अटकलें लगाई थी. खुद पीएम मोदी कई बार शरद पवार की खुले मंच से तारीफ कर चुके हैं. 2016 में पवार ने पीएम मोदी की तारीफ करते हुए कहा, 'मैं मोदी के काम करने के तरीके से हैरान हूं. कल वह जापान में थे और सुबह वह गोवा गए. दोपहर में मोदी बेलगाम आए और अभी वीएसआई में हैं. मुझे नहीं पता कि वह रात में कहां जा रहे हैं.यह देश के लिए उनकी कुल प्रतिबद्धता को दर्शाता है.'
पवार की सियासत का लोहा उनकी पार्टी के नेता ही नहीं बल्कि विपक्ष के नेता भी मानते हैं.कुछ समय पहले जब अडानी और पीएम मोदी की डिग्री के मुद्दे को लेकर कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव गुट) सरकार पर हमलावर थी तो यहां पवार ने पूरे मुद्दे की हवा निकाल दी. शरद पवार ने इस मसले पर दो टूक कह दिया कि 'आज कॉलेज डिग्री का सवाल बार-बार पूछा जा रहा है, आपकी क्या डिग्री है या मेरी क्या डिग्री है लेकिन क्या ये राजनीतिक मुद्दा है?
ठीक इसी तरह हिंडनबर्ग रिपोर्ट के सामने आने के बाद अडानी मुद्दा लगातार चर्चा में बना हुआ था. कांग्रेस नेता राहुल गांधी हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछ रहे थे कि अडानी के पास 20 हजार करोड़ किसके. इस मामले में जेपीसी जांच पर सभी की एक राय बनी, लेकिन शरद पवार फिर इस से अलग हो गए. उन्होंने कहा, इससे कुछ खास फायदा नहीं होगा. "मेरी पार्टी ने अदाणी मुद्दे पर जेपीसी का समर्थन किया है, लेकिन मुझे लगता है कि सत्तासीन पार्टी का कब्जा रहेगा, इसलिए इससे सच्चाई सामने नहीं आ पाएगी. इस तरह से उन्होंने यहां विपक्ष के अहम मुद्दों की हवा निकाल दी, जिससे बीजेपी को ही राहत मिली.
जब राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता चली गई तो उनसे प्रेस कॉन्फ्रेंस में माफी मांगे जाने को लेकर एक सवाल किया गय, जिसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा, 'मैं सावरकर नहीं हूं, मैं राहुल गांधी हूं, माफी नहीं मांगूगा.' इस बयान के बाद जमकर हंगामा हुआ तो पवार ने मामला शांत करा दिया. पवार ने खुले मंच से की सावरकर की तारीफ कर दी. नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा, 'आज सावरकर कोई राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है, यह पुरानी बात है. हमने सावरकर के बारे में कुछ बातें कही थीं लेकिन वह व्यक्तिगत नहीं थी. यह हिंदू महासभा के खिलाफ था. लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है. हम देश की आजादी के लिए सावरकर जी द्वारा दिए गए बलिदान को नजरअंदाज नहीं कर सकते.'
किशोर जोशी