अमेरिका फर्स्ट, लेकिन इंडिया फॉरवर्ड: मार्को रुबियो की पहली यात्रा और संबंधों का निर्णायक पल

मार्को रुबियो का देश भर का यात्रा कार्यक्रम यह संकेत है कि उनका यह दौरा रिश्तों में हाल में आई खटास को दूर करने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. यह इस बात की ओर इशारा है कि वॉशिंगटन और नई दिल्ली ने आपसी मतभेदों को पीछे छोड़ दिया है और अब वे अपने संबंधों को अगले चरण में ले जाने के लिए तैयार हैं.

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मार्को रुबियो भारत-अमेरिकी साझेदारी के मुखर समर्थक रहे हैं. (File photo: ITG) मार्को रुबियो भारत-अमेरिकी साझेदारी के मुखर समर्थक रहे हैं. (File photo: ITG)

रोहित शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 23 मई 2026,
  • अपडेटेड 8:42 AM IST

अटलांटिक महासागर से 32000 फीट की ऊंचाई पर

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो शनिवार को अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पर भारत पहुंचे हैं. मार्को रुबियो के इस दौरे में कोलकाता, आगरा, जयपुर और नई दिल्ली जैसे कई शहर शामिल हैं, तो वाशिंगटन में एक नैरेटिव यह भी है कि वे संबंधों को 'रिपेयर' करने आ रहे हैं. अमेरिकी सिस्टम की ओर से तीखी बयानबाजी, बेवजह की गलतियों से नीचे जाते रिश्ते और जैसे तैसे गुजरे एक साल के बाद एक्सपर्ट मानते हैं कि अब इन रिश्तों में परिपक्वता भरे ठहराव की जरूरत है.

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लेकिन रुबियो की यात्रा को महज कूटनीतिक डैमेज कंट्रोल के तौर पर देखना इस बात को बुनियादी तौर पर गलत समझना है कि विमान से उतरने वाला व्यक्ति कौन है?

नई दिल्ली के लिए रुबियो केवल 72वें विदेश मंत्री ही नहीं हैं. वे आधुनिक वॉशिंगटन में अमेरिका-भारत साझेदारी के शायद सबसे अधिक सुसंगत, संस्थागत रूप से शक्तिशाली और ऐतिहासिक रूप से मुखर समर्थक हैं. 

रुबियो जिस तरह भारत को समझते हैं वो कहानी तब ही नहीं शुरू होती है जब उन्होंने जनवरी 2025 में मंत्री पद की शपथ ली. ये सफर तब से शुरू होता है जब वे सीनेटर थे. इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के हमारे समय का एक निर्णायक भू-राजनीतिक मंच बनने से बहुत पहले ही सीनेटर रुबियो स्पष्ट रूप से वॉशिंगटन से यह आग्रह कर रहे थे कि वह भारत को केवल एक उभरते हुए बाज़ार के रूप में ही नहीं, बल्कि अमेरिकी सुरक्षा के एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में देखे. 

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एक दशक पहले ही संपादकीय लेख लिखकर ज़्यादा रणनीतिक तालमेल की मांग करने से लेकर "गैंग ऑफ़ एट" में अपने कार्यकाल के दौरान अत्यधिक कुशल भारतीय पेशेवरों के लिए H-1B वीजा के विस्तार की वकालत करने तक रुबियो ने लंबे समय से लोकतांत्रिक भारत के महत्व को पहचाना है. 

भारत के लिए उनकी यह गहरी सराहना तत्काल कार्रवाई में बदल गई जब उनके अधिकार में निर्णय लेने की क्षमता आई. 

यह कोई इत्तेफ़ाक नहीं था कि अपने पद पर पहले ही दिन रुबियो ने 'क्वाड-Quad' के विदेश मंत्रियों की मेजबानी की और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ अपनी पहली द्विपक्षीय बैठक की. यह दुनिया को दिया गया एक सोचा-समझा संकेत था- इंडो-पैसिफिक और विशेष रूप से भारत, अमेरिकी रणनीतिक प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रहने वाला है. 

पिछले एक साल के दौरान यह अडिग प्रतिबद्धता बेहद अहम रही है. जहां एक ओर प्रशासन के कुछ तत्वों ने कभी-कभार तीखी बयानबाज़ी की है या अमेरिका की ओर से भारत को मिल रहे प्रोटेक्शन का मुद्दा उठाया है वहीं रुबियो एक मजबूत सहारे के तौर पर डटे रहे हैं. 

अमेरिकी सिस्टम पर उनका प्रभाव बेजोड़ है. एक ऐतिहासिक संयोग ने इसे और भी बढ़ा दिया है. रुबियो इस समय एक साथ 'सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट'  यानी विदेश मंत्री और 'कार्यवाहक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार' दोनों पदों पर कार्यरत हैं. विदेश नीति की शक्ति का ऐसा एकीकरण 1970 के दशक में हेनरी किसिंजर के बाद से अब तक देखने को नहीं मिला है. जब रुबियो भारत के विषय पर बात करते हैं तो वे अमेरिकी सुरक्षा तंत्र की ओर से पूरे वजन के साथ बोलते हैं.

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उनकी रणनीति एक स्पष्ट और यथार्थवादी सोच पर आधारित है. वाशिंगटन के चीन-संबंधी मामलों के सबसे मुखर और कड़े रुख वाले विशेषज्ञों में से एक होने के नाते रुबियो उस दुनिया को भली-भांति समझते हैं जिसमें हम जी रहे हैं. 

भारत के लिए अपनी फ़्लाइट में चढ़ने से ठीक पहले उन्होंने एक बुनियादी सच्चाई जाहिर की. उन्होंने कहा- अमेरिका को इस तेजी से बदलते और अस्थिर दिखने वाली सेंचुरी में टिके रहने और अपनी बढ़त बनाए रखने के लिए काबिल सहयोगियों और साझेदारों की ज़रूरत है, और वह भारत को इसी नजर से देखते हैं. 

वह जानते हैं कि इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र में दबंगई को बढ़ने से सिर्फ वॉशिंगटन ही नहीं रोक सकता. इसके लिए एक मज़बूत, ताकतवर और पूरी तरह से जुड़े हुए 'क्वाड' (Quad) की जरूरत है. इसके लिए नई दिल्ली में एक ऐसे साझेदार की जरूरत है जो आर्थिक रूप से मजबूत, सैन्य नजरिये के लिहाज से काबिल और तकनीकी रूप से एडवांस हो. रुबियो न सिर्फ भारत के बढ़ते कद को स्वीकार करते हैं, बल्कि वह इसे वैश्विक स्थिरता के लिए एक रणनीतिक जरूरत भी मानते हैं. 

आगे देखें तो वॉशिंगटन में रुबियो का कद लगातार बढ़ रहा है. एक गहरे तौर पर बंटे हुए राजनीतिक माहौल में उन्हें दोनों ओर से सम्मान मिलता दिख रहा है. 

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इसकी बदौलत वे 2028 के राष्ट्रपति चुनावों के लिए एक प्रमुख उम्मीदवार के तौर पर तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं. नई दिल्ली के लिए इस रिश्ते को मजबूत बनाना अमेरिकी नेतृत्व में लंबे समय के भविष्य में किया गया एक निवेश है.

कुल मिलाकर रुबियो की यह यात्रा मौजूदा प्रशासन के मुख्य नारे को एक नया अर्थ देती है. उनकी विदेश नीति के फ्रेमवर्क में 'अमेरिका फर्स्ट' का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका अकेला है. इसका मतलब है एक ऐसा अमेरिका जो उन देशों को प्राथमिकता देता है, उनके साथ चलता है और उनके साथ साझेदारी करता है, जिनकी भावना बुनियादी तौर पर लोकतंत्र और आजादी के मूल्यों से मेल खाती है.

आखिरकार रुबियो की भारत के कई शहरों की यात्रा यह साबित करती है कि उनका दौरा महज 'डैमेज कंट्रोल' के बारे में नहीं है. कोलकाता की सड़कों से लेकर नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक की उनकी प्रस्तावित यात्रा एक संकेत है. यह संकेत है कि वॉशिंगटन और नई दिल्ली ने हाल के टकराव से पैदा हुए तनाव को सोख लिया है और अब वे अपने संबंधों को अगले चरण पर ले जाने के लिए तैयार हैं. जहां 'अमेरिका पहले, लेकिन भारत आगे' रहेगा. 

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