पाकिस्तान में जन्मे लेकिन PM रहते हुए वहां कभी नहीं गए, पड़ोसी मुल्क को लेकर सख्त रहा डॉ. मनमोहन सिंह का स्टैंड

पूर्व डिप्टी एनएसए पंकज सरन ने कहा, "डॉ. मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के साथ किसी तरह की शांति स्थापित करने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह कामयाब नहीं हो पाए. लेकिन उन्होंने कोशिश की और वह बहुत निराश थे कि उनके प्रयास सफल नहीं हुए.

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डॉ. मनमोहन सिंह डॉ. मनमोहन सिंह

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 27 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 12:58 PM IST

डॉ. मनमोहन सिंह के तत्कालीन करीबी सहयोगी रहे पूर्व डिप्टी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए)  पंकज सरन ने कहा कि प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. सिंह ने पाकिस्तान के साथ शांति स्थापित करने के लिए 'बहुत कोशिश' की, लेकिन कामयाब नहीं हुए.

डॉ. सिंह का गुरुवार देर रात 92 वर्ष की आयु में यहां निधन हो गया था. सरन ने गुरुवार को सिंह के निधन को "बहुत दुर्भाग्यपूर्ण" करार दिया और उन्हें एक बुद्धिजीवी, वैश्विक स्तर के अर्थशास्त्री, लेकिन "विनम्रता के प्रतीक" शख्स के रूप में याद किया.

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पंकज सरन ने डॉ. सिंह को याद करते हुए कहा कि वह आम सहमति बनाने वाले, बहुत ही सरल व्यक्ति थे जिन्हें कभी प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद नहीं थी, लेकिन उन्होंने 10 साल तक सेवा की. 1982 बैच के आईएफएस अधिकारी सरन ने रूस में भारत के राजदूत के रूप में काम किया था. उन्होंने भारत और विदेशों में विभिन्न पदों पर भी काम किया था, जिसमें बांग्लादेश में देश के उच्चायुक्त का पद भी शामिल है. उन्हें 2018 में डिप्टी एनएसए नियुक्त किया गया था.

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पाकिस्तान से संंबंध सुधारने की बहुत कोशिश की

 पंकज सरन ने पीटीआई से बात करते हुए कहा कि 'साल 2008 में जी20 शिखर सम्मेलन की शुरुआत में मनमोहन सिंह पहले (भारतीय) प्रधानमंत्री थे जिन्होंने वैश्विक नेताओं के बीच बहुत उच्च प्रतिष्ठा हासिल की. मनमोहन सिंह का मानना था कि भारत का भविष्य पश्चिम के साथ अच्छे संबंधों में निहित है.'

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पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में जन्मे मनमोहन सिंह पड़ोसी देश के साथ संबंध सुधारने की भरपूर कोशिश की लेकिन वह अपने कार्यकाल के दौरान या संसद सदस्य के तौर कभी भी पाकिस्तान नहीं गए. लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का मुद्दा को प्रमुखता से उठाया था.

पंकज सरन ने आगे कहा, "पड़ोसियों के बीच, उन्होंने पाकिस्तान के साथ किसी तरह की शांति स्थापित करने की बहुत कोशिश की, लेकिन यह काम नहीं आया. लेकिन उन्होंने कोशिश की और वह बहुत निराश थे कि उनके प्रयास सफल नहीं हुए. 2008 में जब वह प्रधानमंत्री थे, तब 26/11 के मुंबई हमलों ने शांति के प्रयास पीछे धकेल दिए और इसने वास्तव में उन्हें बहुत बुरी तरह हिला दिया."  

सरन ने कहा कि सिंह ने खाड़ी देशों में भी अपनी पहुंच बढ़ाई और सऊदी अरब का दौरा किया. वह ऐसा करने वाले पहले प्रधानमंत्रियों में से एक थे.

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आर्थिक सुधारों को लेकर थे प्रतिबद्ध

वरिष्ठ राजनयिक ने कहा कि उन्हें लगता है कि सिंह ने "विदेश में भारत को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बहुत अच्छी छवि दी जो देश के प्रति कटिबद्ध था...देश का निर्माण कर रहा था. वे 1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधारों के भी निर्माता थे. वे भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध थे. विदेश नीति के क्षेत्र में, मुझे लगता है कि वे इतिहास में ऐसे नेता के रूप में जाने जाएंगे जिन्होंने अमेरिका के साथ परमाणु समझौते की सफलता के साथ भारत-अमेरिका संबंधों के प्रतिमान को बदल दिया."

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उन्होंने कहा, "उन्होंने कभी भी खुद को मुखर करने या विपरीत विचारों को दबाने की कोशिश नहीं की. मुझे लगता है कि वह गैर-पारिवारिक कांग्रेस के महान लोगों में से एक थे, और परिवार से बाहर 10 साल तक प्रधानमंत्री के रूप में सेवा करना एक बड़ी उपलब्धि थी."

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