बीजेपी सरकार ने बंद की 5% मुस्लिम कोटे की फाइल, कांग्रेस का हमला

अब महाराष्ट्र सरकार ने उस पुराने अध्यादेश से जुड़े आखिरी प्रशासनिक आदेश भी वापस ले लिए हैं. यानी जो थोड़ी-बहुत औपचारिक संरचना बची थी, उसे भी खत्म कर दिया गया है. जमीन पर तुरंत कोई बदलाव नहीं होगा, क्योंकि यह आरक्षण पहले से लागू नहीं था. न शिक्षा में इसका फायदा मिल रहा था, न नौकरियों में. लेकिन कानूनी और राजनीतिक रूप से यह एक बड़ा संकेत है.

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aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 19 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:37 PM IST

महाराष्ट्र की बीजेपी-नीत सरकार ने 2014 में दिए गए 5% मुस्लिम आरक्षण से जुड़ा आखिरी प्रशासनिक ढांचा भी औपचारिक रूप से खत्म कर दिया है. इस फैसले के बाद कांग्रेस ने सरकार पर 'एंटी-मुस्लिम' होने का आरोप लगाया है. लेकिन असल सवाल यह है कि यह आरक्षण था क्या, क्या यह लागू हुआ था और अब इसके खत्म होने से क्या बदलेगा?

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सबसे पहले एक बात साफ कर लें- यह 5% आरक्षण पूरे मुस्लिम समाज के लिए नहीं था. यह सिर्फ 50 चिन्हित मुस्लिम उप-जातियों (सब-कास्ट) को 'स्पेशल बैकवर्ड कैटेगरी-A' के तहत शैक्षणिक संस्थानों में दिया गया था.

2014 में क्या हुआ था?

साल 2014 में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने एक अध्यादेश (ऑर्डिनेंस) लाकर मराठा समुदाय को 16% और 50 मुस्लिम उप-जातियों को 5% आरक्षण देने का फैसला किया था.

सरकार ने इसके लिए 2006 की सचर कमेटी रिपोर्ट और 2008 की राज्य स्तरीय स्टडी ग्रुप की रिपोर्ट का हवाला दिया था. इन रिपोर्ट्स में कहा गया था कि मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्से शिक्षा और सरकारी नौकरियों में काफी पीछे हैं.

5% मुस्लिम आरक्षण जुड़ने से राज्य में कुल आरक्षण 52% से बढ़कर 57% हो गया था. और 16% मराठा आरक्षण जोड़ने पर यह 68% तक पहुंच गया. यहीं से कानूनी विवाद शुरू हुआ, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंद्रा साहनी केस में 50% की सीमा तय की थी.

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अदालत में क्या हुआ?

इस अध्यादेश को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई. याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह धर्म के आधार पर आरक्षण है और 50% की सीमा का उल्लंघन है.

नवंबर 2014 में हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने अंतरिम आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि 50 मुस्लिम उप-जातियों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा मानने के लिए पर्याप्त शुरुआती (प्राइमा फेसी) आधार मौजूद है. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह आरक्षण पूरे मुस्लिम समुदाय के लिए नहीं था, बल्कि सिर्फ चिह्न‍ित उप-जातियों के लिए था.

धर्म के आधार पर भेदभाव की दलील कोर्ट ने अंतरिम स्तर पर खारिज कर दी. कोर्ट ने माना कि शिक्षा में पिछड़ापन गंभीर है और मुस्लिम युवाओं को मुख्यधारा की शिक्षा में लाना जरूरी है. हालांकि, यह सिर्फ अंतरिम आदेश था, अंतिम फैसला नहीं.

फिर क्या हुआ?

2014 के अंत में सरकार बदल गई और बीजेपी सत्ता में आ गई. यह अध्यादेश स्थायी कानून में नहीं बदला गया. संविधान के मुताबिक, अध्यादेश को तय समय के भीतर विधानसभा से पास कराना जरूरी होता है. ऐसा नहीं हुआ और दिसंबर 2014 में यह स्वतः समाप्त (लैप्स) हो गया.

बाद की सरकारों ने मराठा आरक्षण को लेकर कानूनी कोशिशें जारी रखीं, लेकिन 5% मुस्लिम आरक्षण को लेकर कोई ठोस विधायी कदम नहीं उठाया गया, न बीजेपी सरकार ने, न उद्धव ठाकरे सरकार ने, जिसमें कांग्रेस भी शामिल थी. इस तरह 5% मुस्लिम आरक्षण काफी समय पहले ही व्यवहार में खत्म हो चुका था.

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अब क्या बदला?

अब महाराष्ट्र सरकार ने उस पुराने अध्यादेश से जुड़े आखिरी प्रशासनिक आदेश भी वापस ले लिए हैं. यानी जो थोड़ी-बहुत औपचारिक संरचना बची थी, उसे भी खत्म कर दिया गया है. जमीन पर तुरंत कोई बदलाव नहीं होगा, क्योंकि यह आरक्षण पहले से लागू नहीं था. न शिक्षा में इसका फायदा मिल रहा था, न नौकरियों में. लेकिन कानूनी और राजनीतिक रूप से यह एक बड़ा संकेत है. अब 2014 वाले मॉडल को फिर से लागू करने के लिए पूरी नई कानून प्रक्रिया से गुजरना होगा.

सियासत क्यों गरम है?

कांग्रेस का कहना है कि सरकार का कदम 'मुस्लिम विरोधी' है. बीजेपी का दावा है कि 2014 का फैसला चुनाव से पहले तुष्टिकरण की राजनीति था और कभी सही तरीके से लागू ही नहीं हुआ. सच्चाई यह है कि 5% मुस्लिम आरक्षण कागजों पर ज्यादा रहा, जमीन पर कम. अब सरकार ने उस अध्याय को औपचारिक रूप से बंद कर दिया है. लेकिन राजनीतिक बहस जरूर जारी रहेगी.

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