आंखों देखी: घरों में पड़ी फसल, छतों को छूते गेहूं के ढेर... ईरान युद्ध की मार झेल रहे MP के किसान

मिडिल ईस्ट में जारी ईरान युद्ध का असर अब मध्य प्रदेश के खेतों तक पहुंच गया है. पेट्रोलियम उत्पादों की कमी के कारण बारदाने (पीपी बैग) का संकट खड़ा हो गया है, जिससे सरकार को गेहूं खरीदी की तारीख तीसरी बार बढ़ानी पड़ी है. फसल कटकर तैयार है, लेकिन बोरी न होने से किसान परेशान हैं.

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ईरान युद्ध की मार झेल रहे हैं मध्य प्रदेश के किसान. (photo: ITG) ईरान युद्ध की मार झेल रहे हैं मध्य प्रदेश के किसान. (photo: ITG)

रवीश पाल सिंह

  • सीहोर,
  • 01 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 7:38 AM IST

हजारों किलोमीटर दूर चल रहा ईरान युद्ध अब मध्यप्रदेश के किसानों की जिंदगी पर असर डाल रहा है. असर ऐसा कि सरकार को एक बार फिर समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी की तारीख आगे बढ़ानी पड़ी है. वजह है बारदाने (पीपी और एचडीपीपी बैग) की भारी कमी जो पेट्रोलियम प्रोडक्ट से बनता है. सरकार ने पहले गेहूं खरीदी की तारीख 16 मार्च तय की थी. बाद में इसे एक अप्रैल तक बढ़ाया गया और अब फिर 10 अप्रैल कर दिया गया है. बार-बार तारीख बदलने से वो किसान सबसे ज्यादा परेशान हैं, जिन्होंने तय समय को देखते हुए पहले ही फसल कटवा कर बेचने की तैयारी कर ली थी.

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आख़िर ईरान युद्ध ने कैसे एमपी के किसानों को संकट में डाल दिया है, ये देखने मैं भोपाल से सटे सीहोर जिले की ओर निकला. भोपाल के ट्रैफ़िक से बाहर आते ही मैंने देखा कि गांवों में बने मकानों के बाहर लगे गेहूं के ढेर और ट्रॉलियों में गेहूं लदा हुआ है. दिन की तेज धूप में बमुश्किल ही कोई घर से बाहर है. गांव की सड़कों और गलियों में लगभग सन्नाटा पसरा हुआ है. करीब आधे घंटे बाद में सीहोर के एक गांव रफीकगंज पहुंचा. सबसे पहले मेरी नजर पड़ी घरों के बाहर और खलिहानों में लगे गेहूं के ऊंचे-ऊंचे ढेरों पर. यह वही सीहोर है जो अपने शरबती गेहूं के लिए देश-दुनिया में पहचान रखता है. लेकिन इस बार किसानों के चेहरों पर गर्व से ज्यादा चिंता साफ दिख रही थी.

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किसानों की मुश्किलें 

फसल तैयार है, कट चुकी है, साफ-सुथरी कर बोरी में भरने का इंतजार कर रही है, लेकिन खरीदी केंद्रों के दरवाजे अभी तक नहीं खुले है. थोड़ी देर बाद रफीकगंज गांव में किसान अवध नारायण से मेरी मुलाकात उनके घर के आंगन में हुई. सामने तिरपाल से ढंका गेहूं का बड़ा ढेर था. सफेद कुर्ते में खड़े अवध के माथे पर चिंता की लकीरें थी.

मुझसे बात करते हुए अवध नारायण बोले, 'हमने 20 एकड़ में गेहूं लगाया है. 16 मार्च को खरीदी शुरू होनी थी, उसी हिसाब से मजदूर लगाए, कटाई करवाई, ट्रॉली तैयार रखी. पिछले साल इस वक्त तक तो गेहूं बिक चुका था और पैसे भी खाते में आ गए थे. इस बार तारीख पर तारीख बढ़ रही है. बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे गेहूं के ढेर के पास ले जाकर दिखाया देखिए, एक महीना हो गया कटे हुए. दिन-रात निगरानी करनी पड़ रही है. मौसम भी बदल रहा है. अगर बारिश आ गई तो नुकसान अलग. ऊपर से प्याज भी खेत में तैयार पड़ी है. पहले इसे बेचें या गेहूं संभालें?' 

अवध नारायण की आवाज में नाराजगी कम, चिंता ज्यादा थी. उनके लिए समर्थन मूल्य पर समय पर खरीदी सिर्फ सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि नकदी प्रवाह का आधार है. गेहूं बिकेगा तो अगली फसल, घर-परिवार और कर्ज की किस्तें चलेंगी.

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छत छूने लगे गेहूं के ढेर

अवध नारायण के घर से करीब आधा किलोमीटर आगे हमें मिले किसान नरेश परमार ने कहा, 'उन्होंने 15 एकड़ में गेहूं बोया है. गेहूं इतना निकला की घर में रखा गेहूं का ढेर अब कमरे की छत को छूने लगा है. इसी के ऊपर चढ़ कर नरेश ज़ोर-ज़ोर से बात करते हुए बोले “कटाई को लगभग एक महीना हो गया. तारीख नहीं आई तो गेहूं यहीं पड़ा है. अब 10 अप्रैल कह रहे हैं. जब एक साथ खरीदी शुरू होगी तो सभी किसान केंद्रों पर पहुंचेंगे. लाइन लगेगी, नंबर आने में दिन निकल जाएंगे. अगर समय पर खरीदी होती तो भुगतान भी समय पर मिल जाता.' सिर्फ़ यही नहीं, मैंने देखा कि कई किसान गेहूं के पास ही सो रहे हैं. वजह, चोरी का डर और मौसम की अनिश्चितता इसलिए हर दिन की देरी उनके लिए जोखिम बढ़ा रही है.

वेयरहाउसों में सन्नाटा

किसानों से बात करने के बाद मैं वापस शहर की ओर आया. शहर आकर जब मैंने जिला मुख्यालय और वेयरहाउस संचालकों से बात की तो तस्वीर का दूसरा पहलू सामने आया. समस्या बारदाने की है. वही पीपी और एचडीपीपी बैग, जिनमें गेहूं भरकर सरकारी भंडारण में रखा जाता है. सरकार को इस सीजन में करीब 15.60 करोड़ बारदानों की जरूरत है, जबकि उपलब्धता लगभग 5.50 करोड़ के आसपास बताई जा रही है. 

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अधिकारियों से इस बारे में बात करने से मालूम हुआ कि बारदाने और पीपी बैग दोनों ही पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं. इसलिए उपार्जन शुरू करने से पहले उनकी संख्या सुनिश्चित करना जरूरी है, लिहाजा तारीख आगे बढ़ाई गई. इसके बाद में एक वेयरहाउस में पहुंचा तो प्लेटफॉर्म तैयार दिखे, लेकिन बैग की गिनती सीमित थी. 

10 अप्रैल से शुरू होगी खरीद

वेयरहाउस के मालिक चैतन्य दुबे मिले. मिलते ही बोले कि थोड़ी देर पहले ही अधिकारियों की मीटिंग से फ्री हुए हैं. पूछने पर बताया कि हमें साफ कहा गया कि 10 तारीख से खरीदी शुरू होगी. देरी की वजह बारदाने की कमी है. जूट और पीपी, दो तरह के बारदान होते हैं. इस बार सप्लाई प्रभावित हुई है.

बातों-बातों में चाय भी आ गई. चाय पर चर्चा करते हुए चैतन्य दुबे ने ये भी बताया कि पीपी बैग पेट्रोलियम आधारित उत्पाद से बनते हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार की हलचल का असर सीधा उत्पादन पर पड़ता है. ईरान क्षेत्र में चल रहे युद्ध से सप्लाई चेन प्रभावित हुई है. कच्चा माल महंगा और सीमित हुआ है, जिसका असर बैग निर्माण पर पड़ा है. ऊपर से केंद्र सरकार ने पेट्रोल, डीजल और गैस के अलावा बाक़ी उत्पादों को प्राथमिकता में नहीं रखा है.

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सरकारी सूत्रों के मुताबिक बारदाने की खरीद के लिए टेंडर जारी कर दिए गए हैं और जल्द आपूर्ति की कोशिश की जा रही है. लेकिन विपक्ष इस देरी को लेकर सरकार पर हमलावर है.

विपक्ष ने सरकार को घेरा

सीहोर से वापस भोपाल आकर मैंने रूख किया कांग्रेस कार्यालय का, जहां मुझे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव कुणाल चौधरी मिले. किसान पृष्ठभूमि से आने वाले कुणाल चौधरी कालापीपल से विधायक रह चुके हैं और किसानों की हालत को अच्छे से समझते हैं.

कुणाल से बातचीत शुरू की तो उनका कहना था, “हर साल खरीदी से पहले तैयारी की जाती है. अगर अंतरराष्ट्रीय हालात खराब थे तो वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? 19 लाख से ज्यादा किसानों ने पंजीयन कराया है और 78 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा खरीदी का लक्ष्य है. इतनी बड़ी प्रक्रिया बिना पर्याप्त बारदाने के कैसे शुरू होगी?” 

कुणाल चौधरी का आरोप है कि यह केवल युद्ध का असर नहीं, बल्कि तैयारी की कमी भी है.'किसान को हर बार इंतजार कराना ठीक नहीं. जब समर्थन मूल्य 2585 रुपये प्रति क्विंटल और 40 रुपये बोनस के साथ घोषित किया गया है तो खरीदी भी समय पर होनी चाहिए.'

सीहोर के लौटने के बाद भी मेरे जहन में एक ही तस्वीर थी, तिरपाल से ढंके गेहूं के ढेर और उनके पास बैठे किसान. ईरान में चल रहे युद्ध की खबरें भले टीवी स्टूडियो में चर्चा का विषय हों, लेकिन उसका असर यहां जमीन पर दिख रहा है. ये पहली बार इतनी स्पष्टता से महसूस हुआ कि वैश्विक घटनाएं अब गांव के खलिहान तक पहुंच चुकी हैं.

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