Beat Report: दुनियाभर में फ्यूल इमरजेंसी! भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर, सरकार ने कैसे संभाला मोर्चा?

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण वैश्विक तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं, लेकिन भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम फिलहाल स्थिर बने हुए हैं. हालांकि, माना जा रहा है कि अगर युद्ध के चलते हालातों में सुधार नहीं हुआ, तो यह स्थिरता लंबे समय तक कायम नहीं रह सकती और आने वाले समय में कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.

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हॉन्गकॉन्ग में पेट्रोल की कीमत करीब ₹295 प्रति लीटर तक पहुंच गई है. (Photo: PTI/ITG) हॉन्गकॉन्ग में पेट्रोल की कीमत करीब ₹295 प्रति लीटर तक पहुंच गई है. (Photo: PTI/ITG)

जितेंद्र बहादुर सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 09 मई 2026,
  • अपडेटेड 8:56 AM IST

वेस्ट एशिया में जारी युद्ध ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला दिया है. होर्मुज़ जलडमरूमध्य जहां से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल गुजरता है, पिछले दो महीनों से लगभग ठप पड़ा है. कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर से बढ़कर 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है, जब पूरी दुनिया महंगे पेट्रोल-डीज़ल से जूझ रही है, तब भारत में दाम स्थिर कैसे हैं?

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वेस्ट एशिया में जारी तनाव के परिणामस्वरूप भारतीय तेल कंपनियों (OMCs) को मार्च के मध्य से अब तक हर महीने लगभग ₹30,000 करोड़ का नुकसान हो रहा है.

80 दिनों से अधिक समय से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं हुई है, लेकिन जानकारों का मानना है कि अब स्थिति बदल सकती है. कई जानकार ये कहते है कि तेल कंपनियों को हो रहे भारी नुकसान (पेट्रोल पर लगभग ₹18/लीटर और डीजल पर ₹25/लीटर तक) के कारण, मध्य मई से पहले पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि हो सकती है.

आइओसीएल के पूर्व अध्यक्ष बी अशोक ने ये कहा कि अगर युद्ध की स्थिति में सुधार नहीं होता है, तो सभी पक्षों भारत सरकार, राज्य सरकारों (वैट में युक्तिकरण के माध्यम से) और आम जनता (उच्च कीमत चुकाने के रूप में) को इस भार को साझा करना होगा. अन्यथा, देश को आपूर्ति संकट, आर्थिक मंदी और ऊर्जा क्षेत्र के कमजोर होने जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है.

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गवर्नमेंट की अगर बात करें तो वह अब तक एक्साइज ड्यूटी कम करके जनता को राहत दी है, लेकिन तेल कंपनियों की बैलेंस शीट पर दबाव बहुत अधिक बढ़ रहा है है. प्रति बैरल कच्चे तेल की कीमतों इजाफा लगातार हो रहा है. फिर भी भारत ने ऐसे कदम उठाए इसके चलते अभी देश की जनता को किसी भी तरीके से तेल की कीमतों का सामना नहीं करना पड़ा. 

हॉन्गकॉन्ग में पेट्रोल लगभग ₹295 प्रति लीटर, सिंगापुर ₹240, नीदरलैंड ₹225, इटली ₹210, जर्मनी ₹205, फ्रांस ₹200, ब्रिटेन ₹195 है जबकि भारत में लगभग ₹95 प्रति लीटर बिना किसी बढ़ोतरी के है.

दुनिया के कई देशों को कठोर कदम उठाने पड़े. बांग्लादेश में फ्यूल राशनिंग लागू हुई. श्रीलंका ने 4 दिन का वर्क वीक लागू किया. फिलीपींस ने राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल घोषित कर दिया. पाकिस्तान में सरकारी दफ्तरों का 4 दिन का सप्ताह, दक्षिण कोरिया ने 30 साल में पहली बार फ्यूल प्राइस कैप लगाया. लेकिन भारत में इसके विपरीत इसका कुछ खास असर देखने को नहीं मिला. 

भारत में क्यों नहीं बढ़े दाम?

केंद्र सरकार ने जनता को महंगाई के बड़े झटके से बचाने के लिए, कंपनियों को कीमतों में बढ़ोतरी न करने के लिए कहा था. पिछले दिनों जब तेल की कीमतें कम थीं, तब कंपनियों ने काफी मुनाफा कमाया था, जिसका उपयोग अब इस घाटे की भरपाई में किया जा रहा है, पर जानकार यह कहते हैं कि जिस तरीके की स्थिति पश्चिम एशिया में बनी हुई है उसे भारत भी अछूता नहीं है, आने वाले दिनों में तेल कंपनियों को हो रहे बड़े घाटे को देखने के लिए कई कड़े कदम उठाने होंगे जिसका सामना आम जनता को करना पड़ सकता है. जिससे कि देश की अर्थव्यवस्था पर फर्क ना पड़े.

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जंग अभी जारी है...

युद्ध जारी है, होर्मुज पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ है, और सरकार लगातार हजारों करोड़ रुपये का बोझ उठा रही है. आने वाले महीनों में सबसे बड़ा सवाल यही होगा, भारत इस सुरक्षा कवच को कितने समय तक बनाए रख सकता है और भविष्य के लिए ऊर्जा सुरक्षा को कितना मजबूत कर पाता है.

इस पूरे मामले पर आइओसीएल के पूर्व चेयरमैन बी अशोक ने  कहा. "मूल सिद्धांत यह है कि आम उपभोक्ता को वैश्विक संघर्ष के प्रभाव से सुरक्षित रखा जाए. इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और ईंधन की कीमतों में वृद्धि के बावजूद, इनका बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला गया है. 

इसका वित्तीय भार भारत सरकार और तेल विपणन कंपनियां वहन कर रही हैं. सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में प्रति लीटर 10 रुपये की कटौती की है. साथ ही घरेलू बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने के लिए ईंधन के निर्यात पर अस्थायी कर लगाया गया है.

नियंत्रण आदेश के माध्यम से रिफाइनरियों को घरेलू स्तर पर एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं, जिससे उत्पादन में लगभग 50% की वृद्धि हुई है. मांग पक्ष को भी संतुलित किया गया है, जिसमें एलपीजी और पीएनजी में घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी गई है.

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परिवहन ईंधन पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की आपूर्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है और इनके खुदरा मूल्य भी नहीं बढ़ाए गए हैं. साथ ही वैकल्पिक ईंधन और विद्युत उपकरणों को बढ़ावा दिया गया है. आइओसीएल के पूर्व चेयरमैन बी अशोक के मुताबिक, इस स्तर का संकट पहले कभी देखने को नहीं मिला.

पूर्व में हुए संघर्षों का प्रभाव आपूर्ति पर केवल कुछ दिनों या हफ्तों तक ही रहता था और वह भी पूर्ण अवरोध नहीं होता था. किंतु वर्तमान संघर्ष अब तीसरे महीने में प्रवेश कर चुका है और इसके समाप्त होने के स्पष्ट संकेत नहीं हैं.

इसका सार्वजनिक कोष पर भारी प्रभाव पड़ रहा है, जो विभिन्न रूपों में दिखाई देगा. विकसित देशों और पड़ोसी राष्ट्रों ने कीमतें बढ़ाने, राशनिंग लागू करने, वर्क फ्रॉम होम जैसे उपाय अपनाए हैं या फिर आपूर्ति संकट का सामना किया है. भारत में अब तक जनता को इन प्रभावों से सुरक्षित रखा गया है, किंतु यह स्थिति दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ नहीं है.

यूएई के पूर्व एम्बेसडर समाज संजय सुधीर ने आजतक से कहा कि, पश्चिम एशिया में जो युद्ध चल रहा है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से तेल के दाम तेजी से बढ़े हैं. साथ ही सप्लाई को लेकर काफी अनिश्चितता है. सरकार ने अभी तक एक्साइज ड्यूटी कम करके पेट्रोल-डीजल के दाम कंट्रोल में रखे हैं, क्योंकि दाम बढ़ते ही महंगाई पर सीधा असर पड़ता है.

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भारत ने पिछले दो महीनों में अपने तेल के सोर्स बदल दिए हैं. अब हम रूस, अमेरिका, ईरान, नाइजीरिया और अंगोला से ज्यादा तेल ले रहे हैं. पहले भी रूस से सस्ता तेल लेने के लिए खास डील हुई थी. साथ ही भारत अपने स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व भी बढ़ा रहा है. 

खाड़ी देश हमारे लिए बहुत बड़े सप्लायर हैं. करीब 50% तेल, 90% एलपीजी और 60% गैस हम वहीं से लेते हैं. यूएई के ओपेक से बाहर निकलने के फैसले से दुनिया में तेल के दाम थोड़े नरम पड़ सकते हैं, जिसका फायदा भारत को मिलेगा. अभी तक सरकार ने एक्साइज ड्यूटी घटाकर दाम खुद संभाले हैं.

तेल कंपनियों को भी काफी नुकसान झेलना पड़ा है. लेकिन ये लंबे समय तक चल नहीं सकता. किसी समय सरकार को फैसला लेना पड़ेगा और तब दाम बढ़ भी सकते हैं. पश्चिमी देशों में तो पहले ही करीब 25% तक दाम बढ़ चुके हैं. तेल के बढ़ते दाम का असर सिर्फ महंगाई पर नहीं, बल्कि जीडीपी ग्रोथ पर भी पड़ा है. इसके अलावा कई और सेक्टर भी इससे प्रभावित हुए हैं. उम्मीद है कि ये युद्ध जल्द खत्म होगा.

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