यूरोपीय संघ (EU) के प्रमुख नेता गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत पहुंच रहे हैं. इस दौरान नजरें भारत और ईयू के बीच होने वाले ट्रेड एग्रीमेंट पर होगी. इस अहम कूटनीतिक मुलाकात के केंद्र में दो शीर्ष हस्तियां हैं. यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा.
ये दोनों प्रमुख ईयू नेता मिलकर यूरोपीय संघ का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन की सह अध्यक्षता करेंगे. इस दौरान यूरोपीय नेता, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भी मुलाकात करेंगे. यह पहला अवसर है जब EU के शीर्ष नेतृत्व को संयुक्त रूप से भारत के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया है. यह कदम भारत-ईयू रिश्तों को किसी एक सदस्य देश तक सीमित न रखकर पूरे यूरोपीय संघ के साथ रणनीतिक साझेदारी के रूप में देखने का स्पष्ट संकेत देता है.
भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते पर फोकस
ईयू नेताओं का यह दौरा 25 से 27 जनवरी 2026 के बीच होगा. 26 जनवरी को उर्सुला वॉन डेर लेन और एंटोनियो कोस्टा नई दिल्ली में 77वें गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे. इसके बाद 27 जनवरी को भारत-ईयू शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाएगा. इस दौरे का मुख्य एजेंडा व्यापार, सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण है लेकिन सबसे बड़ा फोकस लंबे समय से अटके भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर है.
करीब नौ साल के अंतराल के बाद 2022 में फिर से शुरू हुई एफटीए वार्ताएं अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं. संभावना है कि शिखर सम्मेलन के दौरान इस समझौते को लेकर बड़ी घोषणा की जाए. यह समझौता 27 देशों वाले ईयू और भारत यानी करीब दो अरब की आबादी वाले मुल्क के बीच 90 फीसदी से अधिक वस्तुओं पर टैरिफ खत्म करने, सेवाओं को बढ़ावा देने और निवेश को आसान बनाने का लक्ष्य रखता है. फिलहाल भारत-ईयू के बीच वस्तुओं का व्यापार लगभग 136.53 अरब डॉलर का है.
वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच अहम समय
यह यात्रा 25 से 27 जनवरी 2026 के बीच होगी, जो भारत के गणतंत्र दिवस समारोह के साथ मेल खाती है. अगर शिखर सम्मेलन के दौरान एफटीए पर हस्ताक्षर होते हैं, तो कुछ ही महीनों में इसे अस्थाई रूप से लागू किया जा सकता है. हालांकि ईयू के सदस्य देशों और यूरोपीय संसद से पूरी मंजूरी मिलने में 12 से 18 महीने लग सकते हैं. इस हिसाब से यह समझौता 2027 के अंत या 2028 की शुरुआत तक पूरी तरह लागू हो सकता है.
इसका समय बेहद अहम है क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित टैरिफ बढ़ोतरी और वैश्विक संरक्षणवाद के ट्रेंड के बीच भारत और ईयू दोनों चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं.
इस पूरी कवायद का केंद्र नई दिल्ली रहेगा. गणतंत्र दिवस परेड राजपथ पर होगी, जबकि भारत-ईयू शिखर सम्मेलन हैदराबाद हाउस जैसे किसी सरकारी स्थल पर आयोजित किया जा सकता है.
भारत-ईयू FTA की अहमियत आर्थिक और भूराजनीतिक दोनों स्तरों पर है. भारत के लिए यह समझौता ईयू के जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (GSP) के तहत खोई हुई टैरिफ रियायतों को फिर से बहाल करेगा. इससे परिधान, दवाइयों, स्टील और पेट्रोलियम उत्पादों जैसे प्रमुख भारतीय निर्यातों पर शुल्क घटेगा और विनिर्माण क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ेगा. अनुमान है कि इससे भारत का निर्यात 20 से 30 फीसदी तक बढ़ सकता है.
ईयू के लिए यह समझौता भारत के 1.4 अरब उपभोक्ताओं वाले विशाल बाजार तक गहरी पहुंच सुनिश्चित करेगा. इसके साथ ही, चीन से हटकर सप्लाई चेन को विविध बनाने और ऑटोमोबाइल, टेक्नोलॉजी और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे क्षेत्रों में मजबूती लाने में मदद करेगा. सेवाओं के क्षेत्र में ईयू का भारत को निर्यात दोगुना होने की संभावना है जबकि भारत की सेवाओं का ईयू को निर्यात करीब 50 फीसदी बढ़ सकता है.
समझौते के तहत 90 फीसदी से अधिक वस्तुओं पर टैरिफ चरणबद्ध तरीके से 5 से 10 वर्षों में खत्म किए जाएंगे. भारत लगभग 90 फीसदी और ईयू करीब 95 फीसदी तक टैरिफ कटौती चाहता है. कृषि, डेयरी, ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट्स जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में कोटा या धीरे-धीरे शुल्क घटाने की व्यवस्था होगी और शुरुआती चरणों में इन्हें काफी हद तक संरक्षण मिलेगा.
फिलहाल ईयू में भारतीय वस्तुओं पर औसत टैरिफ 3.8 फीसदी है, जबकि भारत में EU उत्पादों पर यह 9.3 फीसदी है. एफटीए के बाद अधिकांश शुल्क शून्य हो जाएंगे, जिससे भारतीय श्रम-प्रधान निर्यातों को बड़ी राहत मिलेगी, जो अभी तक 10 फीसदी तक के शुल्क का सामना कर रहे हैं.
‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ क्यों?
यह समझौता अपने आकार और प्रभाव के कारण मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है. यह दुनिया के सबसे बड़े सिंगल मार्केट (ईयू) और सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था (भारत) को जोड़ता है. मौजूदा 137 अरब डॉलर के वस्तु व्यापार और 50 अरब डॉलर से अधिक के सेवा व्यापार को मिलाकर अगले एक दशक में कुल व्यापार 200 से 250 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. केवल मौजूदा क्षमताओं के आधार पर ही भारत को ईयू में 10-11 अरब डॉलर के अतिरिक्त निर्यात का अवसर मिल सकता है.
2007 में शुरू हुई वार्ताएं 2013 में टैरिफ, बौद्धिक संपदा अधिकार, सतत विकास मानकों (जैसे कार्बन बॉर्डर टैक्स) और कृषि-डेयरी बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दों पर अटक गई थीं. कोविड-19 के बाद बदली वैश्विक सप्लाई चेन और भूराजनीतिक तनावों के बीच 2022 में इन्हें फिर से शुरू किया गया.
भारत के अन्य द्विपक्षीय एफटीए (जैसे ब्रिटेन या ऑस्ट्रेलिया) के विपरीत यह समझौता पूरे यूरोपीय संघ के साथ एकीकृत रूप से किया जा रहा है. इससे 27 अलग-अलग देशों से अलग-अलग समझौते करने की जरूरत नहीं होगी और टैरिफ, मानकों और निवेश नियमों में एकरूपता आएगी.
प्रणय उपाध्याय