पावरफुल देशों के लिए नो इंटरनेशनल लॉ! क्या नियम नहीं अब ताकत चला रही व्यवस्था? हरिश साल्वे ने दी चेतावनी

सीनियर एडवोकेट और पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने वार्निंग दी है कि इंटरनेशनल कानूनों को सहारा देने वाली वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था अब कमजोर होती जा रही है. दुनिया में नियमों की नहीं, बल्कि ताकत के आधार पर व्यवस्था चल रही है.

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हरीश साल्वे ने कहा कि अब दुनिया नियमों से नहीं, बल्कि ताकत के आधार पर आगे बढ़ रही है. (Photo: ITG) हरीश साल्वे ने कहा कि अब दुनिया नियमों से नहीं, बल्कि ताकत के आधार पर आगे बढ़ रही है. (Photo: ITG)

अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली,
  • 06 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 9:42 AM IST

भारत के सीनियर एडवोकेट और पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने चेतावनी दी है कि अंतरराष्ट्रीय कानून को सहारा देने वाली वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था कमजोर होती जा रही है. उनका कहना है कि वैश्विक संघर्षों में अब कानूनी नियमों की जगह ताकत की राजनीति हावी होती दिख रही है.

हरीश साल्वे ने कहा कि हाल के युद्धों और भू-राजनीतिक तनावों से संकेत मिलता है कि शक्तिशाली देशों पर अंतरराष्ट्रीय कानून का प्रभाव लगातार कम हो रहा है. साल्वे कहते हैं कि मुझे नहीं लगता आज पब्लिक इंटरनेशनल लॉ कुछ खास देशों के लिए सच में ऑपरेटिव हैं. यह अब ज्यादा तर अकादमिक बहस का विषय बन गया है, न कि ऐसा नियम जिसे देश वास्तव में मानें.
 
World War II के बाद जो ढांचा बनाया गया था, वह यूनाइटेड नेशन्स के चार्टर पर आधारित था. इसका उद्देश्य यह था कि देश बिना वजह ताकत का इस्तेमाल न करें, केवल आत्मरक्षा में या फिर यूनाइटेड नेशन्स सिक्योरिटी काउंसिल की मंजूरी के साथ ही सैन्य कार्रवाई की जाए.

लेकिन इन नियमों को अब लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है. हरीश साल्वे बताते हैं कि नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था की बात तो हर कोई करता है, लेकिन आज इसे एक तरफ रख दिया गया है. अब दुनिया में नियमों की नहीं, बल्कि ताकत के आधार पर व्यवस्था चल रही है.

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इंटरनेशनल कानून के तहत मिलिट्री एक्शन केवल तभी की जा सकती है, जब खतरा तत्काल हो या कोई देश आत्मरक्षा में कदम उठाए,  इसके बाद मामले को तुरंत यूएन सिक्योरिटी काउंसिल के सामने रखा जाना चाहिए. जब देश अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन भी करते हैं, तब भी ग्लोबल सिस्टम में उसके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई के बहुत कम विकल्प मौजूद हैं.

साल्वे ने बताया कि, सैद्धांतिक तौर पर यूनाइटेड नेशन्स प्रतिबंध लगा सकता है, लेकिन वहां यूनाइटेड नेशन्स सिक्योरिटी काउंसिल है, जहां वीटो का अधिकार मौजूद है. अगर कोई वीटो कर देता है, तो प्रस्ताव किनारे हो जाता है.

साफ तौर पर कहें तो बड़े देशों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई संभव नहीं होती. प्रतिबंधों का असर आमतौर पर छोटे देशों पर ही पड़ता है.

IRIS डेना जहाज

हरीश साल्वे ने ईरान के उस दावे पर जानकारी दी, जिसमें कहा गया था कि IRIS Dana नामक जहाज, जिस पर तेहरान के अनुसार भारतीय मेहमान मौजूद थे. उस पर United States ने श्रीलंका के पास समुद्री क्षेत्र में हमला किया. 

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सल्वे ने कहा कि यह मुझे लगता है कि यह घटना अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुई थी और ऐसे में भारत या श्रीलंका पर कोई कानूनी जिम्मेदारी नहीं बनती. 

जहाज की ओर से डिस्ट्रेस कॉल (आपात संदेश) भेजा गया था, जिसके बाद श्रीलंका की नौसेना ने तुरंत प्रतिक्रिया दी. उन्होंने तेजी से कार्रवाई की और जहाज पर मौजूद लोगों को बचाने की कोशिश की. अगर इस हमले में अमेरिकी पनडुब्बी शामिल थी, तो किसी छोटे क्षेत्रीय देश की नौसेना से सैन्य हस्तक्षेप की उम्मीद करना अवास्तविक होगा.

हरीश साल्वे आगे बताते हैं कि संप्रभु देशों को घरेलू अदालतों में जिम्मेदार ठहराने के लिए कानूनी रास्ते बहुत सीमित हैं. किसी भी संप्रभु देश पर इस तरह किसी दूसरे देश की स्थानीय अदालत में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. अगर कोई कानूनी चुनौती दी भी जाए, तो सरकारें सॉवरेन इम्युनिटी का सहारा ले सकती हैं.

सल्वे के मुताबिक, सरकार हमेशा सॉवरेन इम्युनिटी का हवाला देगी और कहेगी कि युद्ध करना है या नहीं, यह उनका अपना आकलन और निर्णय है. साल्वे ने अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था को नाजुक बताया और कहा कि यह काफी हद तक जिम्मेदार नेतृत्व पर निर्भर करती है.

साल्वे कहते हैं कि लोकतंत्र और नियम-आधारित व्यवस्था बहुत नाजुक मूल्य हैं. इन्हें बनाए रखने के लिए समझदारी और संतुलित नेतृत्व की जरूरत होती है. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर दुनिया स्थायी रूप से ताकत की राजनीति की ओर बढ़ती है, तो अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के लिए शांति बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा.

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अगर हम सभी नियमों को किनारे रख दें और कहें कि जिसकी ताकत, उसकी ही बात सही है तो फिर समाधान का रास्ता कहां बचेगा? हरीश साल्वे ने कहा कि सरकारों पर सबसे प्रभावी नियंत्रण अदालतों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से नहीं, बल्कि खुद नागरिकों से आता है. लोकतंत्र में जनता की ताकत, जनमत की शक्ति और समझदारी का कोई विकल्प नहीं है. 

वैश्विक स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि दुनिया दोबारा नियमों के सम्मान को बहाल करे, न कि सैन्य ताकत को अंतरराष्ट्रीय संबंधों का आधार बनने दे. 

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