रूस-यूक्रेन युद्ध से होर्मुज संकट तक... समझिए भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों का पूरा गणित

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल, रूस–यूक्रेन युद्ध और होर्मुज संकट जैसे अंतरराष्ट्रीय तनावों के बावजूद भारत ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों को अपेक्षाकृत नियंत्रित रखा. केंद्र सरकार ने पिछले चार वर्षों में कई बार एक्साइज ड्यूटी घटाकर उपभोक्ताओं को राहत देने की कोशिश की. वहीं राज्यों के अलग-अलग वैट के कारण देशभर में ईंधन कीमतों में अंतर बना रहा.

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रूस युद्ध से होर्मुज संकट तक भारत ने करीब 4 साल तक ईंधन की कीमतें नियंत्रित रखीं. (File Photo: PTI) रूस युद्ध से होर्मुज संकट तक भारत ने करीब 4 साल तक ईंधन की कीमतें नियंत्रित रखीं. (File Photo: PTI)

हिमांशु मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 19 मई 2026,
  • अपडेटेड 4:31 PM IST

पिछले चार सालों में इंटरनेशनल क्रूड मार्केट में भारी उथल-पुथल देखने को मिली. फरवरी 2022 में शुरू हुए रूस–यूक्रेन युद्ध और 2026 में होर्मुज संकट के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमतें कई बार 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं. इसके बावजूद भारत ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने की रणनीति अपनाई और आम उपभोक्ताओं पर बोझ कम करने की कोशिश की.

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केंद्र सरकार ने 2021 से 2026 के बीच चार बार पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में कटौती की. नवंबर 2021 में पेट्रोल ₹5 और डीजल ₹10 सस्ता किया गया. मई 2022 में पेट्रोल पर ₹8 और डीजल पर ₹6 की राहत दी गई. इसके बाद मार्च 2024 और अप्रैल 2025 में भी कीमतें घटाई गईं. सबसे बड़ी कटौती 27 मार्च 2026 को हुई, जब विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) में ₹10 प्रति लीटर की कमी की गई और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी लगभग शून्य कर दी गई.

हालांकि 15 मई 2026 को करीब 4 साल बाद पहली बार भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई. इसके बाद 19 मई को भी दोनों ईंधनों के दाम ₹0.91 प्रति लीटर बढ़ाए गए. इस तरह हफ्ते भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में करीब ₹4 प्रति लीटर का इजाफा हो चुका है. सरकार का कहना है कि मौजूदा कीमतों की तुलना सीधे 2014 से करना सही नहीं है, क्योंकि उस दौर में तेल बांड के जरिए भविष्य पर वित्तीय बोझ डाला गया था. 2005 से 2010 के बीच जारी करीब ₹1.34 लाख करोड़ के तेल बांड का भुगतान बाद की सरकारों को करना पड़ा. 

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2021-2024 के बीच ₹24,500 करोड़ का नुकसान

इसके उलट मौजूदा सरकार ने टैक्स में कटौती कर सीधे राहत देने की नीति अपनाई और किसी नए बांड का सहारा नहीं लिया. सिर्फ मार्च 2026 की कटौती से सरकार पर लगभग ₹30,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ा. कच्चे तेल की उच्च कीमतों के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने भी आर्थिक दबाव झेला. होर्मुज संकट के समय पेट्रोल पर करीब ₹24 प्रति लीटर और डीजल पर ₹30 प्रति लीटर तक का अंतर अप्रत्यक्ष रूप से सरकार और कंपनियों ने वहन किया. 2021 से 2024 के बीच तेल कंपनियों को लगभग ₹24,500 करोड़ का नुकसान हुआ.

वहीं एलपीजी उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए 2024-25 में करीब ₹40,000 करोड़ का भार उठाया गया. अंतरराष्ट्रीय तुलना में भारत में ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी सीमित रही. फरवरी से मई 2026 के बीच जहां म्यांमार, मलेशिया, पाकिस्तान और अमेरिका जैसे देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम 40% से 100% तक बढ़ गए, वहीं भारत में वृद्धि करीब 4% के आसपास रही. सरकार का दावा है कि यह उपभोक्ताओं को वैश्विक बाजार के सीधे असर से बचाने की नीति का परिणाम है.

राज्य सरकारों के वैट की वजह से दरें अलग-अलग

देश के अलग-अलग राज्यों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अंतर की बड़ी वजह राज्य सरकारों का वैट (VAT) है. केंद्र की एक्साइज ड्यूटी पूरे देश में समान है, लेकिन राज्य अपने हिसाब से वैट की अलग-अलग दरें लगाते हैं. आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल जैसे राज्यों में ज्यादा वैट के कारण पेट्रोल ₹107 प्रति लीटर से ऊपर पहुंच गया है. वहीं गुजरात, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, गोवा और असम जैसे राज्यों में कम वैट के कारण कीमतें अपेक्षाकृत कम हैं. सरकार का कहना है कि उसने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपनाई.

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केंद्र द्वारा उठाए गए कदमों में एक्साइज ड्यूटी में कटौती, तेल कंपनियों द्वारा नुकसान का वहन, निर्यात शुल्क के जरिए घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करना और पुराने तेल बांड का भुगतान शामिल है. रूस–यूक्रेन युद्ध और होर्मुज संकट जैसे वैश्विक दबावों के बावजूद भारत ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखने की कोशिश की. हालांकि राज्यों की कर नीति के कारण अलग-अलग हिस्सों में कीमतों में बड़ा अंतर बना हुआ है. कुल मिलाकर ईंधन मूल्य निर्धारण में केंद्र और राज्य दोनों की नीतियां अहम भूमिका निभाती हैं और इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है.

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