'झूठी जानकारी को बढ़ावा नहीं...', गलगोटिया यूनिवर्सिटी के तीन ब्लंडर्स, सरकार ने बताई Expo से बाहर करने की वजह

गलगोटिया यूनिवर्सिटी का नाम भारत की उन प्राइवेट यूनिवर्सिटी में आता है, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की पढ़ाई कराई जाती है. अगर आप चार साल के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग में बीटेक की पढ़ाई करते हैं तो हर साल की पढ़ाई का खर्च करीब दो लाख रुपये होगा और चार साल की पढ़ाई का खर्च लगभग 8 लाख रुपये होगा. 

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गलगोटिया यूनिवर्सिटी पर विवाद बरपा है. (Photo: PTI) गलगोटिया यूनिवर्सिटी पर विवाद बरपा है. (Photo: PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 18 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 11:41 PM IST

ग्रेटर नोएडा की गलगोटिया यूनिवर्सिटी के झूठ ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की फजीहत करा दी है. लेकिन जिस AI समिट के लिए भारत ने इतनी मेहनत की. जिस समिट की वजह से AI सेक्टर में भारत की बढ़ती भूमिका को लेकर नई चर्चा शुरू हुई और जिसे India’s AI Moment तक कहा जा रहा है.  क्या उस अंतरराष्ट्रीय समिट को सिर्फ एक यूनिवर्सिटी के झूठ की वजह से बर्बाद मान लिया जाएगा. 

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गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने जो झूठ बोला और जो गलती की है, वो किसी अपराध से कम नहीं है. जिस समिट को भारत अपनी आवाज बनाकर पूरी दुनिया तक ये संदेश पहुंच रहा है कि हम भी अब अमेरिका और चीन से पीछे नहीं रहेंगे और अपने खुद के AI मॉडल और टूल बनाएंगे. उस सम्मेलन में चीन के रोबोटिक डॉग को अपना बताकर गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने भारत की छवि को बहुत-बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया.

ऐसे कई वीडियो हैं, जिनसे पता चलता है कि इस यूनिवर्सिटी से जुड़े एक-एक प्रोफेसर और छात्र को इस बात की पूरी जानकारी थी कि ये रोबोटिक डॉग इस यूनिवर्सिटी ने खुद नहीं बनाया है बल्कि इसे चीन की एक रोबोटिक्स कंपनी Unitree Robotics से खरीदा गया है.

लेकिन इस बात को जानते हुए भी गलगोटिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नेहा सिंह ने शब्दश: ये कहा कि इस रोबोटिक डॉग को उनकी यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने विकसित किया है. बड़ी बात ये है कि जब चीन के मीडिया ने इस दावे का खंडन किया और गलगोटिया यूनिवर्सिटी के झूठ की पोल खोल दी, तब भी इस यूनिवर्सिटी ने अपने आधिकारिक बयान में इस झूठ को स्वीकार नहीं किया.

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इस यूनिवर्सिटी के प्रबंधन ने अपने एक झूठ को बचाने के लिए कई और झूठ बोले और ये कहा कि यूनिवर्सिटी ने कभी इस बात का दावा नहीं किया कि इस रोबोटिक डॉग को उसके द्वारा बनाया गया है. प्रोफेसर नेहा सिंह ने भी खुद अपने झूठ को 'स्वीकार' करने से इनकार कर दिय और कहा कि उनके बयान का गलत मतलब निकाला गया है जबकि ये सच नहीं है.

प्रोफेसर नेहा सिंह के दोनों बयानों को देखेंगे तो आपको खुद समझ आएगा कि उन्होंने ही चीन के रोबोटिक डॉग को अपनी यूनिवर्सिटी का रोबोटिक डॉग बताया और बाद में इस झूठ को छिपाने के लिए कई और झूठ बोले.

सरकार ने भी इस समिट से गलगोटिया यूनिवर्सिटी के पवेलियन को खाली करा लिया और इस पवेलियन की लाइटों को भी बंद कर दिया गया. हालांकि यहां ये सवाल उठता है कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी इस समिट में चीन के बने रोबोटिक डॉग को कैसे लेकर आई और सरकार ने उसे ऐसा करने से रोका क्यों नहीं? ये बात हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि ये कोई निजी समिट नहीं था. इस समिट का आयोजन भारत सरकार खुद करा रही है और इस समिट के लिए भारत मंडपम में जितने भी पवेलियन लगाए गए. उनमें किसी ना किसी स्तर पर सरकार की अनुमति जरूर ली गई होगी.

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उदाहरण के लिए गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने इस समिट में अपना पवेलियन लगाया तो इसके लिए पहले उसने आवेदन दिया होगा और भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक एवं सूचना प्रोद्योगिकी मंत्रालय को बताया होगा कि वो अपने पवेलियन में किस तरह के प्रोडक्ट और डेमो को दिखाना चाहती हैं. जब मंत्रालय ने गलगोटिया यूनिवर्सिटी के आवेदन की समीक्षा करने के बाद उसका चयन किया होगा, तभी उसे इस समिट में अपना पवेलियन लगाने की अनुमति मिली होगी और इसलिए हमें लगता है कि ये पूरा मामला जांच के दायरे में आना चाहिए.

यहां इस बात को देखने की जरूरत है कि क्या गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने अपने आवेदन में सरकार को पहले से ये बताया था कि वो एक चाइनीज माल को भारत के AI समिट के मंच पर दिखाने वाली है.

इसके अलावा यहां ये भी देखना होगा कि प्रोफेसर नेहा सिंह ने झूठ क्यों बोला और गलगोटिया यूनिवर्सिटी अब ये क्यों कह रही है कि ये सारा बखेड़ा नेहा सिंह की वजह से हुआ है. ये मामला एक एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी का है, जो इस समिट में ना सिर्फ भारत का प्रतिनिधित्व कर रही थी बल्कि साथ-साथ अपना प्रचार भी कर रही थी.

एक यूनिवर्सिटी का सबसे बड़ा मकसद क्या होता है. उसका मकसद यही होता है कि ज्यादा से ज्यादा छात्र उसके यहां आकर पढ़ाई करे और ये तभी होता है जब छात्रों को उस यूनिवर्सिटी में कुछ अलग दिखाई दे. इस मामले में गलगोटिया यूनिवर्सिटी पर आरोप है कि उसने चीन के रोबोटिक डॉग को अपना बताकर अपनी छवि बेहतर करने की कोशिश की और ऐसा शायद छात्रों को लुभाने के लिए किया गया होग. 

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रोबोटिक डॉग के बाद थर्माकोल ड्रोन पर भी विवाद

एआई इम्पैक्ट समिट में रोबोटिक डॉग पर बवाल के बाद गलगोटिया यूनिवर्सिटी के थर्माकोल ड्रोन के वीडियो ने भी सवाल खड़े कर दिए हैं. लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह असली इनोवेशन है या सिर्फ शो के लिए रखा गया मॉडल. सोशल मीडिया पर कई लोगों ने कहा कि इसे कोई भी बेसिक DIY किट से बना सकता है.

गलगोटिया यूनिवर्सिटी की तरफ से थर्माकोल ड्रोन पर अब तक कोई साफ बयान सामने नहीं आया है. पहले रोबोट डॉग विवाद पर यूनिवर्सिटी ने सफाई दी थी. उन्होंने कहा था कि मशीन स्टूडेंट्स के लर्निंग टूल के तौर पर रखी गई थी. लेकिन खुद बनाया जैसा कोई दावा नहीं किया गया था.

गलगोटिया के सॉकर ड्रोन पर भी घिरी यूनिवर्सिटी

गलगोटिया यूनिवर्सिटी सॉकर ड्रोन (soccer drone) को लेकर विवादों में घिर गई है. बताया जा रहा है कि यह सॉकर ड्रोन साउथ कोरिया में बना हुआ है. लेकिन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने दावा किया है कि इसे यूनिवर्सिटी ने पूरी तरह से खुद विकसित किया है.

रोबोटिक डॉग विवाद में भी शामिल रहीं यूनिवर्सिटी की संचार विभाग की प्रोफेसर नेहा सिंह का एक वीडियो वायरल हो गया है, जिसमें वह एक रिपोर्टर को इन हाउस सॉकर ड्रोन के बारे में समझा रही हैं. उनका कहना है कि ड्रोन की एंड टू एंड इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी कैंपस में ही की गई है.

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उन्होंने कहा कि यह एक दिलचस्प डिवाइस है. इसकी एंड टू एंड इंजीनियरिंग से लेकर इसके एप्लीकेशन तक सब कुछ यूनिवर्सिटी में ही विकसित किया गया है. सिंह ने यह भी दावा किया कि गैलगोटिया यूनिवर्सिटी ने अपने परिसर में भारत का पहला ड्रोन सॉकर एरीना विकसित किया है.

गलगोटिया यूनिवर्सिटी को लेकर यूट्यूब और सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो बनाए गए है, जिनमें सीधे-सीधे ये आरोप लगाया गया है कि ये यूनिवर्सिटी छात्रों को पढ़ाई के बाद नौकरी दिलाने के लिए प्लेसेंट का जो दावा करती है, वो दावे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं. इससे कई छात्र गुमराह होते हैं और वो इस यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लेते हैं और ऐसा नहीं है कि ये आरोप बाकी प्राइवेट यूनिवर्सिटी और कॉलेजों पर नहीं लगते. हमारे कहने का मतलब सिर्फ यही है कि यूनिवर्सिटी के प्रमोशन के लिए ऐसे झूठ और गलत प्रचार का कई बार सहारा लिया जाता है और यही कारण है कि इस मामले में भी गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने जो किया, उसकी जांच होनी आवश्यक है और उसे सिर्फ इस सम्मेलन से बाहर का रास्ता दिखाकर ये मामला रफा-दफा नहीं होना चाहिए.

केंद्र सरकार ने विवाद पर क्या कहा?

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रोद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृ्ष्णनन ने गलगोटिया यूनिवर्सिटी से स्टॉल खाली कराने के सवाल पर कहा कि हम चाहते हैं कि एक्सपो में लोग जो भी डिस्प्ले करते हैं, उसमें वास्तविक और प्रामाणिक काम ही दिखाई दे. इसका उद्देश्य किसी और तरह से इसका उपयोग करना नहीं है. हम नहीं चाहते कि यहां जो डिस्प्ले हो, उस पर विवाद हो इसलिए यह जरूरी है कि एक आचार-संहिता का पालन किया जाए. गलत जानकारी को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता. हम इस मुद्दे पर किसी विवाद को आगे नहीं बढ़ाना चाहते. मैं यह नहीं कह रहा कि वे सही हैं या गलत. हम बस यह चाहते हैं कि किसी प्रकार का विवाद न हो.

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आपको जानकर हैरानी होगी कि ये यूनिवर्सिटी अभी दिल्ली के पास ग्रेटर नौएडा में मौजूद है, जहां 2015 में 8 हजार बच्चे पढ़ रहे थे लेकिन साल 2023-24 में इन छात्रों की संख्या 30 हजार हो गई और ये संख्या इसलिए भी बढ़ी क्योंकि इस यूनिवर्सिटी में प्लेसमेंट 98 प्रतिशत तक माना जाता है, जिसका मतलब ये है कि अगर 100 छात्र इस यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं तो उनमें से 98 छात्रों की पढ़ाई के बाद ही इस यूनिवर्सिटी की मदद से नौकरी लग जाती है.

हम आपको बस ये बता रहे हैं कि इस तरह की प्राइवेट यूनिवर्सिटी में छात्र महंगी फीस देकर तभी पढ़ने जाते हैं, जब उन्हें अच्छी प्लेसमेंट का भरोसा मिलता है या उन्हें उस यूनिवर्सिटी में अच्छा इन्फ्रास्ट्रक्चर और पढ़ाई की संभावना दिखती है और ये जो चीन से रोबोटिक डॉग खरीदा गया था. वो भी छात्रों को ही लुभाने के लिए था. इस यूनिवर्सिटी ने अपने प्रचार के लिए चीन से खरीदे गए इस रोबोटिक डॉग के ऐसे कई वीडियो बनाए, जिससे ऐसा लगे कि ये यूनिवर्सिटी कितनी आधुनिक है और ज्यादा से ज्यादा छात्र इस यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए आकर्षित हों और ये बात हम सिर्फ हवा में नहीं कह रहे हैं बल्कि हमारे पास इसके वीडियो हैं, जिन्हें आप खुद देख सकते हैं.

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गलगोटिया यूनिवर्सिटी का नाम भारत की उन प्राइवेट यूनिवर्सिटी में आता है, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की पढ़ाई कराई जाती है. अगर आप चार साल के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग में बीटेक की पढ़ाई करते हैं तो हर साल की पढ़ाई का खर्च करीब दो लाख रुपये होगा और चार साल की पढ़ाई का खर्च लगभग 8 लाख रुपये होगा. 

इसी तरह अगर कोई छात्र एआई में बीबीए की पढ़ाई करता है तो उसमें भी एक साल की पढ़ाई का खर्च डेढ़ लाख और चार साल की पढ़ाई का खर्च छह लाख रुपये होगा और अगर कोई छात्र एआई में बीएससी की पढ़ाई करता है तो उसमें भी चार साल की पढ़ाई का खर्च 6 लाख रुपये होगा और मजे की बात ये है कि चीन के जिस रोबोटिक डॉग को देखकर छात्र इस यूनिवर्सिटी में पढ़ने आएंगे वो मेड इन चाइना रोबोटिक डॉग सिर्फ दो लाख रुपये का है यानी 2 लाख रुपये के चीन के रोबोटिक डॉग को देखकर सैकड़ों छात्र इस यूनिवर्सिटी में लाखों रुपये खर्च करके पढ़ाई करने करते हैं और ये चाइनीज रोबोटिक डॉग इस यूनिवर्सिटी में AI की पढ़ाई के लिए विज्ञापन का मॉडल बन जाता है.

लेकिन भारत के AI समिट में इस यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर के एक झूठ ने भारत का काफी नुकसान किया और अब राहुल गांधी से लेकर विपक्ष के नेता और कई लोग इस घटना को आधार बनाकर इस अंतर्राष्ट्रीय AI सम्मेलन को निशाना बना रहे है और अब इसका मजाक भी बनाया जा रहा है. हमें लगता है कि इस यूनिवर्सिटी के झूठे के लिए देश के बाकी इनोवेटर्स की मेहनत का मजाक बनाना और उन्हें सजा देना सही नहीं है.

हालांकि, गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने जो किया, हम उसके खिलाफ हैं और आज आप इस ड्रोन को भी देखिए, जिसे इसी यूनिवर्सिटी ने अपने पवेलियन में लगाया था और अब इसका भी मजाक उड़ रहा है.

इस घटना के बाद हम एक ही बात कहना चाहते हैं कि अगर भारत को AI के क्षेत्र में एक बड़ा दावेदार बनना है तो हमारी सरकार और हमारे युवाओं को Innovation और रिसर्च के मामले में अपनी स्थिति को सुधारना होगा और कई बड़े बदलाव करने होंगे.

आज भारत Global Innovation Index की सूची में 38वें स्थान पर है जबकि पूरी दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी हमारे देश में ही रहती है और यहां हम चीन से भी बहुत पीछे हैं. चीन इसी Global Innovation Index में 10वें स्थान पर है, फ्रांस 13वें और इजरायल 14वें स्थान पर है जबकि अमेरिका नई-नई खोज करने के मामले में तीसरे स्थान पर है.

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