सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत ने एक एओआर (एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड) की याचिका पर सुनवाई करते हुए एक निश्चित न्यायिक सेवा पत्र के पुनर्मूल्यांकन की बात कही. इस मामले की सुनवाई करते हुए उन्होंने अपना एक अनुभव भी साझा किया. सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने एओआर से कहा कि आप अगली बार बेहतर न्यायिक सेवाओं के लिए आवेदन करें और आपको इस पर जोर क्यों नहीं देना चाहिए. इसके लिए मैं आपको अपने अनुभव से समझाता हूं.
सीजेआई ने कहा, "जब मैं LLB के अंतिम वर्ष में था, तो मैंने न्यायिक सेवाओं के लिए आवेदन किया था. उस समय अंतिम वर्ष के छात्र आवेदन कर सकते थे. जब तक परिणाम आए, तब तक प्रक्रिया बदल चुकी थी. इससे पहले, लोक सेवा आयोग चयन का संचालन करता था. फिर सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया. उसके अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को विषय विशेषज्ञ के रूप में कार्य करना था. यह भी कहा गया कि उनकी राय आयोग के लिए बाध्यकारी होगी."
इसके साथ ही सीजेआई ने कहा कि इस बीच, मैं उच्च न्यायालय में स्थानांतरित हो गया था. साक्षात्कार पैनल के लिए नामित किए गए वरिष्ठतम न्यायाधीश मुझे पहले से ही जानते थे. क्योंकि, मैंने उनके सामने दो मामलों पर बहस की थी. उन दो मामलों में से एक सुनीता रानी बनाम बलदेव राज का था. वहां हाईकोर्ट में उन जजों ने एक वैवाहिक विवाद के मामले में मेरी अपील स्वीकार कर ली थी. उन्होंने मेरी दलील के आधार पर सिज़ोफ्रेनिया को तलाक का आधार न मानते हुए जिला न्यायाधीश द्वारा दी गई तलाक की डिक्री रद्द कर दी थी. वो जज जानते थे कि मैं न्यायिक सेवा साक्षात्कार के लिए उपस्थित हो रहा हूं. उन्होंने आयोग से जारी सूची देखी थी.
'मेरे सारे सपने मुझे चकनाचूर...'
चीफ जस्टिस ने आगे बताया, "एक दिन, उन्होंने मुझे अपने चैंबर में बुलाया और पूछा, 'क्या आप न्यायिक अधिकारी बनना चाहते हैं?' मैंने हां कहा तो उन्होंने तुरंत कहा कि फिर मेरे चैंबर से बाहर निकलो. गेट आउट फ्रॉम माई चैंबर. मैं डरा कांपता सा बाहर आ गया. न्यायिक सेवा के मेरे सारे सपने मुझे चकनाचूर होते दिखे. मैंने सोचा था कि मैं एक न्यायिक अधिकारी बनूंगा, लेकिन यहां तो बनने से पहले ही उन्होंने मुझे इस तरह फटकार लगाई थी."
"अगले दिन, उन्होंने मुझे फिर से अपने कक्ष में बुलाया और कहा कि अगर आप न्यायिक अधिकारी बनना चाहते हैं, तो आपका स्वागत है. लेकिन मेरी सलाह है कि न्यायिक अधिकारी न बनें. बार आपका इंतजार कर रहा है."
यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट में अब होंगे 38 जज, केंद्र ने पास किया प्रस्ताव
सीजेआई आगे कहते हैं, "मैं चैंबर के बाहर आया और इंटरव्यू के लिए नहीं जाने का फैसला किया. मैंने अपने माता-पिता को बताया नहीं, क्योंकि मुझे पता था कि वे नाराज हो जाएंगे. दो-तीन महीने बाद मैंने कुछ झूठ बोलकर इधर-उधर बोला और जाने से मना कर दिया. अब क्या आपको लगता है कि मेरा फैसला सही था या नहीं?"
आखिरी में सीजेआई ने कहा, "मेरा आपको भी सुझाव है कि इस परीक्षा के बारे में भूल जाओ. 35 वर्ष की उम्र के बाद उच्च न्यायिक सेवा परीक्षा में बैठो. भविष्य में शायद मेरी सलाह और अपने फैसले पर आपको नाज हो."
संजय शर्मा