राउज एवेन्यू कोर्ट ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगी मनीष सिसोदिया को शराब घोटाले के आरोपों से क्लीन चिट देते हुए बरी कर दिया है. कोर्ट ने साफ कर दिया कि केवल बिना ठोस और पर्याप्त सबूत के लगाए गए आरोपों पर विश्वास नहीं किया जा सकता. अदालत ने सबसे पहले आबकारी विभाग के पूर्व कमिश्नर कुलदीप सिंह को बरी किया. इसके बाद मनीष सिसोदिया और अंत में अरविंद केजरीवाल को भी आरोपों से बरी कर दिया.
कोर्ट के फैसले में क्या-क्या है?
राउज एवन्यू कोर्ट के फैसले की सबसे बड़ी बात ये है कि शुक्रवार को कोर्ट ने सीबीआई की ओर से दायर केस बंद कर दिया है. इसी के साथ अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और के. कविता समेत सभी 23 आरोपी बरी हो गए हैं. जानिए कोर्ट ने वो कौन सी 10 बड़ी और अहम टिप्पणियां की, जिनसे पूर्व सीएम केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के बरी होने के रास्ते खुल गए.
1. केजरीवाल के खिलाफ पहली नजर में सबूत नहीं
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष (प्रॉसिक्यूशन) ऐसा कोई ठोस सामग्री पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो सके कि अरविंद केजरीवाल कथित साजिश से सीधे तौर पर जुड़े थे. उनका नाम मुख्य रूप से एक गवाह (PW-225) के देर से दिए गए बयान में सामने आया, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं थी.
2. एक कमजोर गवाह के बयान पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता
कोर्ट ने माना कि केजरीवाल के खिलाफ आरोप मुख्य रूप से PW-225 के बयान की एक लाइन पर आधारित थे. केवल एक असमर्थित बयान के आधार पर आपराधिक साजिश स्टैब्लिश नहीं की जा सकती.
3. नीति में व्यक्तिगत हेरफेर का कोई सबूत नहीं
अदालत ने पाया कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि केजरीवाल ने व्यक्तिगत रूप से आबकारी नीति में हेरफेर किया या किसी को अनुचित लाभ दिया. कैबिनेट के फैसले को अनुमोदित करना महज आपराधिक साजिश नहीं माना जा सकता.
4. जांच प्रक्रिया पर सवाल
जज ने जांच के कुछ हिस्सों को लेकर कड़ी टिप्पणी की और कहा कि कुछ कदम निष्पक्ष जांच के बजाय 'पूर्व नियोजित हेरफेर' जैसे लगते हैं.
5. जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश
एक आरोपी (A-1) के संदर्भ में अदालत ने जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश तक की, क्योंकि बिना पर्याप्त सबूत के आरोपी बनाया गया था. इससे अदालत की चिंता स्पष्ट होती है कि प्रॉसिक्यूशन साक्ष्य-आधारित होना चाहिए.
6. 36 पेज की GoM रिपोर्ट का दावा कमजोर
अभियोजन का एक अहम दावा 36 पन्नों की कथित प्रिंटआउट रिपोर्ट पर बेस्ड था, अदालत ने पाया कि आधिकारिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता है. पन्नों की संख्या और समय-सीमा में विरोधाभास मिला.
7. कथित बैठकों का सबूत नहीं
नीति से जुड़ी कथित बैठकों के समर्थन में मुख्य रूप से ‘एप्रूवर’ के बयान थे. इन बैठकों का कोई दस्तावेजी या इलेक्ट्रॉनिक सबूत पेश नहीं किया गया.
8. सुनी-सुनाई और विरोधाभासी गवाही
कई आरोप ऐसे बयानों पर लगाए गए थे जो या तो सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे या बाद में जोड़े गए थे. ऐसे विरोधाभासी और बाद में आए बयानों से अभियोजन का मामला कमजोर हुआ.
9. अवैध मांग या रिश्वत का प्रमाण नहीं
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत ‘मांग’ (Demand) का सबूत जरूरी होता है. अदालत ने पाया कि कई मामलों में अवैध मांग या रिश्वत की स्पष्ट पुष्टि नहीं की गई.
10. ‘गंभीर संदेह’ की कसौटी पूरी नहीं
आरोप तय करने के स्टेप में अदालत को रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री के आधार पर ‘गंभीर संदेह’ दिखना चाहिए. जज ने कहा कि अभियोजन पक्ष इस स्टैंडर्ड पर भी खरा नहीं उतर सका.
अदालत ने साफ कहा कि केवल संदेह, राजनीतिक पद या आपसी संबंध के आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. आपराधिक साजिश के लिए ठोस, विधिसम्मत और प्रत्यक्ष सामग्री जरूरी है. चूंकि यह मानक पूरा नहीं हुआ, इसलिए सभी आरोपियों को आरोप तय करने के चरण पर ही डिस्चार्ज कर दिया गया.
अनीषा माथुर / नलिनी शर्मा