कैसे छूटा था साथ, कैसे मिले फिर हाथ, ठाकरे ब्रदर्स की 20 साल की दोस्ती-दुश्मनी की पूरी Timeline

शिवसेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे ने अपने बेटे उद्धव ठाकरे को आगे बढ़ाया तो राज ठाकरे ने अलग सियासी राह चुन ली. अब 20 साल बाद फिर से ठाकरे ब्रदर्स एक साथ आए हैं. पढ़ें उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की दोस्ती से लेकर दुश्मनी तक की टाइमलाइन...

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20 साल बाद राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे में दोस्ती (Photo-ANI) 20 साल बाद राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे में दोस्ती (Photo-ANI)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 24 दिसंबर 2025,
  • अपडेटेड 1:50 PM IST

महाराष्ट्र के ठाकरे बंधुओं यानी उद्धव और राज ठाकरे के बीच बीएमसी सहित अन्य नगर निगम चुनाव के लिए गठबंधन की डील फाइनल हो गई है. 20 साल बाद ठाकरे ब्रदर्स एक साथ चुनावी मैदान में उतरेंगे. बुधवार को राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे संयुक्त प्रेस कॉफ्रेंस करके अपने गठबंधन का ऐलान किया. ऐसे में उनके निशाने पर बीजेपी रही.

महाराष्ट्र में दो दशक के बाद फिर से ठाकरे ब्रदर्स एक साथ खड़े नजर आ रहे हैं, क्योंकि ठाकरे परिवार के आखिरी किला बीएमसी को बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है. ऐसे में दोनों भाई अपने सारे गिले-शिकवे भुलाकर फिर से एक साथ आए हैं. उ

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द्धव और राज ठाकरे ने बीजेपी को निशाने पर लेते हुए कहा कि हमारी सोच एक है. हमें मराठियों का संघर्ष, उनका बलिदान याद है. उद्धव ठाकरे ने कहा कि आज हम दोनों भाई एकसाथ हैं. हम एकसाथ रहने के लिए साथ आए हैं. उद्धव ठाकरे ने कहा कि दिल्ली में बैठे लोग हमें तोड़ रहे हैं. इस बार हमें नहीं टूटना है.

हालांकि, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की राजनीतिक जोड़ी का टूटना महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बड़े घटनाक्रमों में से एक रही और अब जब दोनों भाई साथ आ रहे हैं तो फिर सियासी सुर्खियों में है. ऐसे में ठाकरे ब्रदर्स की 20 साल की दोस्ती और दुश्मनी की टाइम लाइन.

बाल ठाकरे की उंगली पकड़ राजनीति में आए राज-उद्धव

शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे की उंगली पकड़कर भतीजे राज ठाकरे और बेटे उद्धव ठाकरे राजनीति में कदम रखा. एक समय राज ठाकरे को बाला साहेब का सियासी उत्तराधिकारी माना जाता था. राज ठाकरे के बोलने की शैली और तौर-तरीका पूरी तरह से बाल ठाकरे की शैली से मेल खाता था. इसके चलते लोगों को लगता था कि राज ठाकरे ही शिवसेना की कमान संभालेंगे लेकिन बाल ठाकरे ने बेटे उद्धव को उत्तराधिकारी चुना.

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राज ठाकरे बचपन से बाल ठाकरे के साथ रहते थे. बाल ठाकरे ने राज ठाकरे को युवा सेना की जिम्मेदारी दी थी. तब उद्धव की राजनीति में रुचि नहीं थी. वह शौकिया फोटोग्राफी किया करते थे. नब्बे के दशक में अचानक बाल ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को सक्रिय राजनीति में लाए. उद्धव आहिस्ता-आहिस्ता राजनीति के गुर सीखने लगे. उन्होंने शुरू में शिवसेना के मुखपत्र सामना में रुचि ली, जिसके बाद राज ठाकरे की सियासी अहमियत शिवसेना में कमजोर होने लगी.

उद्धव के साथ राज ठाकरे के बिगड़ने लगे जब रिश्ते

90 के दशक के आखिर में उद्धव ठाकरे ने धीरे-धीरे पार्टी के संगठनात्मक कार्यों में अपनी पकड़ बनानी शुरू की, जिससे राज ठाकरे और उनके समर्थकों में असुरक्षा का भाव पैदा हुआ. बाल ठाकरे ने 2002 में मुंबई महानगरपालिका चुनाव में प्रचार का राज ठाकरे के बजाय उद्धव ठाकरे को सौंप दिया. ऐसे में शिवसेना को मिली प्रंचड जीत के बाद बाल ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को आगे बढ़ाने का फैसला किया तो राज ठाकरे को सियासी रिश्ते खराब होने लगे.

साल 2004 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव हुए, जिसमें शिवसेना को करारी हार का सामना करना पड़ा. ऐसे में चुनाव हार की ठीकरा राज ठाकरे के समर्थकों ने उद्धव ठाकरे पर फोड़ा. उद्धव के कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए. राज ठाकरे ने आरोप लगाया था कि उद्धव ठाकरे के करीबी नेता उन्हें पार्टी चलाने नहीं दे रहे हैं.

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राज ठाकरे ने शिवसेना से अलग बनाई अपनी पार्टी

बाल ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को 2005 में पार्टी का कार्याध्यक्ष बनाया तो नाराज राज ठाकरे खुद को शिवसेना से किनारा कर लिया. 18 दिसंबर 2005 को राज ठाकरे ने शिवसेना की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. करीब तीन महीने के बाद राज ठाकरे ने अपनी अलग राजनीतिक दल बनाने का पहल किया. 9 मार्च 2006 को राज ठाकरे ने अपनी नई पार्टी 'महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना' की घोषणा की. इसके बाद से उद्धव और राज के सियासी रास्ते अलग हो गए थे.

राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को बनाकर पहली बार 2007 में बीएमसी का पहला चुनाव लड़े. पहले चुनाव में बीएमसी में 28 सीटें जीतकर सभी को आश्चर्य चकित कर दिया. इसके बाद 2009 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के 13 विधायक जीते. मनसे ने मुंबई, ठाणे और नासिक में बड़ी जीत दर्ज की थी. ऐसे में लगने लगने लगा था कि राज ठाकरे महाराष्ट्र की राजनीति में बाल ठाकरे की विरासत संभालने के लिए तैयार हैं लेकिन उनकी सियासत 2009 से आगे नहीं बढ़ पाई.

सियासी वजूद को बचाने को राज-उद्धव साथ आए

वहीं, उद्धव ठाकरे ने शिवसेना की कमान संभालकर भले ही बाल ठाकरे के सियासी वारिस बनकर उभरे, लेकिन 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना पर अपना कब्जा जमा लिया. शिवसेना दो धड़ों में बंट गई. उद्धव ठाकरे को शिवसेना (यूबीटी) के नाम से अपनी पार्टी बनानी पड़ी. महाराष्ट्र की सत्ता पहले ही गंवा चुके हैं. सिर्फ सत्ता ही नहीं बल्कि पार्टी और बालासाहेब ठाकरे की विरासत भी उनके हाथों से निकल गई है.

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2024 के विधानसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने इस बार 95 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और जीत केवल 20 सीटों पर मिली जबकि उद्धव ठाकरे से बग़ावत कर बाल ठाकरे की विरासत पर अपनी दावेदारी पेश करने वाले पुराने शिव सैनिक एकनाथ शिंदे ने 81 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और उन्हें 57 सीटों पर जीत मिली. राज ठाकरे की पार्टी अपना खाता नहीं खोल सकी. ऐसे ही नगर परिषद के चुनाव में भी करारी मात उद्धव और राज ठाकरे की पार्टी को झेलना पड़ा है.

बीएमसी चुनाव के लिए उद्धव-राज ठाकरे में गठबंधन

बीएमसी (BMC) चुनाव जीतना केवल एक नगर निकाय का चुनाव नहीं, बल्कि उनके लिए राजनीतिक अस्तित्व और विरासत की सबसे बड़ी लड़ाई है. करीब तीन दशकों तक बीएमसी पर अविभाजित शिवसेना का कब्जा रहा है, लेकिन 2022 के विभाजन के बाद स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं

वहीं, महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज होने के बाद से बीजेपी की नजर बीएमसी पर है. इस बहाने मुंबई की सियासत पर अपना दबदबा बीजेपी कायम रखना चाहती है. ऐसे में उद्धव ठाकरे ने अपना आखिरी सियासी दुर्ग को बचाए रखने के राज ठाकरे से हाथ मिला लिया है. 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद से राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की बीच नजदीकियां बढ़ने लगी थी, जिस पर फाइनल मुहर बुधवार को गठबंधन के ऐलान के साथ लग गई है. उद्धव-राज के निशाने पर बीजेपी है.

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