दो साल से 'पत्थर' बने बेटे को निहार रहे हैं बूढ़े मां-बाप, 4 करोड़ खर्च कर घर को ही बना दिया अस्पताल

मुंबई में रहने वाले 70 साल के वीरेंद्र दीक्षित और उनकी पत्नी पिछले दो साल से अपने बेटे आनंद दीक्षित के होश में आने का इंतजार कर रहे हैं. साल 2023 में बाइक हादसे के बाद आनंद वेजिटेटिव स्टेट में हैं. इलाज पर अब तक 4 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं और परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा है.

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दो साल से कोमा में बेटा, माता-पिता की उम्मीद जिंदा (Photo: Mustafa Shaikh/ITG) दो साल से कोमा में बेटा, माता-पिता की उम्मीद जिंदा (Photo: Mustafa Shaikh/ITG)

मुस्तफा शेख

  • मुंबई ,
  • 18 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 6:52 PM IST

एक परिवार की उम्मीद और संघर्ष की कहानी सामने आई है, जहां माता-पिता पिछले दो साल से अपने बेटे के होश में आने का इंतजार कर रहे हैं. 70 वर्षीय वीरेंद्र दीक्षित और उनकी पत्नी का इकलौता बेटा आनंद दीक्षित 29 दिसंबर 2023 को हुए एक भीषण बाइक हादसे के बाद से वेजिटेटिव स्टेट में है.

35 साल के आनंद दीक्षित पेशे से रियल एस्टेट कंसल्टेंट थे. हादसे के बाद उनकी हालत इतनी गंभीर हो गई कि उन्हें लगातार मेडिकल निगरानी की जरूरत पड़ने लगी. परिवार ने अपने घर को ही एक छोटे अस्पताल की तरह तैयार कर दिया है, जहां मॉनिटर, फीडिंग ट्यूब और लाइफ सपोर्ट से जुड़े उपकरण लगाए गए हैं.

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बाइक हादसे के बाद से वेजिटेटिव स्टेट में है युवक
 

वीरेंद्र दीक्षित का कहना है कि उन्हें पूरा विश्वास है कि उनका बेटा एक दिन जरूर होश में आएगा. उनका कहना है कि यही विश्वास उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता है. इस इलाज का आर्थिक बोझ परिवार पर बेहद भारी पड़ा है. अब तक करीब 4 करोड़ रुपये इलाज, जांच और देखभाल में खर्च हो चुके हैं. इस दौरान परिवार को अपनी लगभग सभी संपत्तियां बेचनी पड़ीं.

स्थिति तब और कठिन हो गई जब मुंबई में उनका जर्जर घर पिछले साल प्रशासन ने तोड़ दिया. इसके कारण पुनर्विकास का काम भी रुक गया और परिवार को किराए के मकान में रहना पड़ रहा है. आनंद का हादसा उनके पैतृक स्थान गोरखपुर में हुआ था, जिसके बाद उन्हें इलाज के लिए मुंबई लाया गया. उनकी हालत को देखते हुए परिवार ने एक केयरटेकर भी रखा है, जिस पर हर महीने करीब 90 हजार रुपये खर्च हो रहे हैं.

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वीरेंद्र दीक्षित ने बताया कि आनंद की स्थिति बहुत नाजुक है और जरा सी लापरवाही भी जानलेवा साबित हो सकती है. इसी कारण हर समय विशेष देखभाल की जरूरत पड़ती है. परिवार पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहा था, लेकिन स्वास्थ्य बीमा कंपनी ने उनका क्लेम मंजूर नहीं किया. इससे उनकी परेशानी और बढ़ गई और इलाज का पूरा खर्च खुद ही उठाना पड़ा.

हर महीने 90 हजार रुपये में केयरटेकर की व्यवस्था

यह कहानी एक ऐसे परिवार की है जो कठिन हालात के बावजूद उम्मीद नहीं छोड़ रहा है. माता-पिता को आज भी विश्वास है कि उनका बेटा एक दिन जरूर ठीक होगा और सामान्य जीवन में लौटेगा.
 

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