मुंबई: ईशनिंदा मामले में आरोपी को मिली जमानत, जानिए कोर्ट ने क्या कहा

मुंबई की मजिस्ट्रेट कोर्ट ने धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप में गिरफ्तार आरोपी को जांच पूरी होने के आधार पर सख्त शर्तों के साथ जमानत दे दी. पुलिस और अभियोजन ने इसका विरोध किया.

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आरोपी पर मुसलमानों के खिलाफ बयानबाजी करने का आरोप है. (Photo: Representational/File) आरोपी पर मुसलमानों के खिलाफ बयानबाजी करने का आरोप है. (Photo: Representational/File)

विद्या

  • मुंबई,
  • 16 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 3:59 AM IST

मुंबई की एक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने बुधवार को एक शख्स को ज़मानत दे दी, जिस पर एक विशेष समुदाय के खिलाफ बयानबाजी करने का आरोप था. शख्स पर आरोप है कि उसने इस्लाम धर्म की पवित्र किताब 'कुरान शरीफ', मस्जिद और मदरसे के लिए गंदी भाषा का इस्तेमाल किया था, जिससे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची थी. उसने इस कृत्य का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड किया था.

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जब यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तो एक शख्स ने कफ परेड पुलिस स्टेशन में केस दर्ज करवाया था. आरोपी को 31 मार्च, 2026 को गिरफ्तार किया गया था.

आरोपी सुनील बाबूलाल राजदोर की तरफ से पेश वकील सुनील पांडे ने कहा कि ये अपराध ज़्यादातर ज़मानती हैं और इनमें 3 साल तक की सज़ा हो सकती है. सिर्फ़ सेक्शन 299 नॉन-ज़मानती है और उसमें भी 3 साल तक की सज़ा हो सकती है. पांडे ने यह भी कहा कि पुलिस ने आरोपी को कोई नोटिस नहीं दिया, जो देना चाहिए था.

पांडे ने कहा कि आरोपी के मुताबिक, किसी ने उसके मोबाइल फ़ोन का गलत इस्तेमाल किया है. वीडियो आरोपी के अकाउंट से अपलोड नहीं किया गया था और चूंकि जांच पूरी हो गई है, इसलिए आरोपी को ज़मानत मिलनी चाहिए.

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आरोपी के खिलाफ क्या दलील दी गई?

प्रॉसिक्यूटर ने ज़मानत याचिका का इस आधार पर विरोध किया कि आरोपी को वीडियो में यह अपराध करते हुए देखा जा सकता है. पहली नज़र में, आरोपी का इस अपराध में शामिल होना देखा जा सकता है. वह इस वीडियो में भी देखा गया था. ये अपराध संज्ञेय, नॉन-ज़मानती और गंभीर प्रकृति के हैं. आरोपी ने जानबूझकर और गलत इरादे से काम करके मुस्लिम समुदाय के धर्म और धार्मिक भावनाओं का अपमान करके उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है. एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने कहा कि आरोपी ने जानबूझकर और जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है.

इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर ने भी बेल अर्जी का विरोध किया और कहा कि जुर्म गंभीर है और इससे दो धार्मिक ग्रुप में फूट पड़ी है. अगर आरोपी को बेल पर रिहा किया जाता है, तो लॉ एंड ऑर्डर का सवाल उठेगा. इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर को बताया गया कि अगर आरोपी को बेल पर रिहा किया जाता है, तो वह गवाहों को धमकाएगा और इसी तरह का जुर्म करेगा.

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हालांकि, एस्प्लेनेड कोर्ट के मजिस्ट्रेट पीएस गोडके ने मामले के फैक्ट्स और डिटेल्स देखने के बाद कहा कि जांच पूरी हो गई है. मजिस्ट्रेट ने कहा, "जांच टेक्निकल है और आरोपी की आगे की कस्टडी गैर-जरूरी है. इसलिए, जुर्म के नेचर को देखते हुए, आरोपी को जेल में रखना सही नहीं है. आरोपी को रिहा करते समय सख्त शर्तें लगाई जानी चाहिए." उन्होंने आरोपी को इस तरह का जुर्म न करने और 60 दिनों तक कफ परेड पुलिस के अधिकार क्षेत्र में न आने का निर्देश दिया.

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