एकनाथ शिंदे मामले में कुणाल का माफी मांगने से इनकार, बोले- व्यंग्य को दबाना लोकतंत्र के खिलाफ

कुणाल कामरा ने महाराष्ट्र विधान परिषद की समिति के सामने पेश होकर राजनीतिक व्यंग्य का बचाव किया. उन्होंने बालासाहेब ठाकरे की कार्टून परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि व्यंग्य लोकतंत्र का हिस्सा है. कामरा ने माफी मांगने से इनकार किया और कहा कि ऐसा करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ गलत मिसाल होगा.

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कॉमेडियन कुणाल कामरा ने माफी मांगने से किया इंकार (Photo: ITG) कॉमेडियन कुणाल कामरा ने माफी मांगने से किया इंकार (Photo: ITG)

ऋत्विक भालेकर

  • मुंबई ,
  • 12 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 6:35 AM IST

स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा ने महाराष्ट्र विधान परिषद की विशेषाधिकार समिति के सामने पेश होकर राजनीतिक व्यंग्य की खुलकर पैरवी की. 9 अप्रैल 2026 को हुई इस सुनवाई के दौरान कामरा ने अपने लिखित बयान में पूरे मामले को विडंबना बताया और कहा कि उन्हें एक मजाक के लिए निशाना बनाया जा रहा है. साथ ही उन्होंने इस दौरान बालासाहेब ठाकरे की विरासत का भी जिक्र किया.

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कामरा ने अपने बयान में कहा कि बालासाहेब ठाकरे सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, बल्कि देश के सबसे चर्चित राजनीतिक कार्टूनिस्टों में से एक थे. उन्होंने दशकों तक सत्ता में बैठे लोगों, यहां तक कि प्रधानमंत्रियों की भी आलोचना और मजाक उड़ाया, लेकिन कभी उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन जैसी कार्रवाई नहीं की गई. कामरा ने समिति को याद दिलाया कि राजनीतिक व्यंग्य लोकतंत्र का अहम हिस्सा है और इसी परंपरा को आज के कलाकार भी आगे बढ़ा रहे हैं.

‘एक मजाक पर कार्रवाई’, कामरा ने बताया विडंबना

इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे  जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं, उसकी नींव ही व्यंग्य और आलोचना पर टिकी रही है. ऐसे में अगर उसी परंपरा को आज के समय में रोका जाता है, तो यह उस विरासत के खिलाफ होगा जिसे नेता खुद आगे बढ़ाने की बात करते हैं.

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यह पूरा मामला कामरा के एक शो नया भारत से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने बॉलीवुड के मशहूर गाने भोली सी सूरत की पैरोडी पेश की थी. समिति का आरोप है कि इस प्रस्तुति के जरिए कामरा ने जानबूझकर उपमुख्यमंत्री शिंदे का मजाक उड़ाया और महाराष्ट्र विधानसभा का अपमान किया. हालांकि कामरा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनका काम 2022 की राजनीतिक घटनाओं पर आधारित है और इससे सदन के कामकाज पर कोई असर नहीं पड़ता है.

कामरा ने अपने बयान में यह भी कहा कि उन्होंने गद्दार शब्द का इस्तेमाल एक निजी राय के तौर पर किया था. उन्होंने बताया कि यह शब्द पहले भी सार्वजनिक रूप से कई बड़े नेताओं द्वारा इस्तेमाल किया जा चुका है, जिनमें उद्धव ठाकरे और अजित पवार जैसे नाम शामिल हैं. ऐसे में उनके खिलाफ कार्रवाई करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़ा करता है.

बिना माफी झुके नहीं कामरा, बोले गलत मिसाल बनेगी

सुनवाई के दौरान समिति के अध्यक्ष प्रसाद लाड ने यह माना कि कामरा का रवैया सम्मानजनक रहा, लेकिन उन्होंने बिना शर्त माफी मांगने से इनकार कर दिया. इस पर कामरा ने साफ कहा कि अगर वह माफी मांगते हैं, तो वह ईमानदार नहीं होगी और इससे एक गलत उदाहरण स्थापित होगा.

बाद में कामरा ने सोशल मीडिया पर भी अपनी बात दोहराई. उन्होंने कहा कि उन्होंने समिति से साफ कहा है कि माफी मांगना उनके लिए संभव नहीं है, क्योंकि इससे कलात्मक स्वतंत्रता पर खतरा पैदा होगा. उन्होंने यह भी जोड़ा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की शक्तियों का इस्तेमाल नागरिकों को चुप कराने के लिए नहीं होना चाहिए, खासकर तब जब वे सिर्फ व्यंग्य या कटाक्ष के जरिए अपनी बात रख रहे हों.

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कामरा का यह रुख एक बड़े बहस को जन्म दे रहा है, जिसमें सवाल उठ रहा है कि क्या राजनीतिक व्यंग्य को सीमित किया जा सकता है. कामरा का कहना है कि लोकतंत्र में असहज करने वाले विचारों और आलोचना के लिए भी जगह होनी चाहिए. अगर कलाकारों और कॉमेडियन को डर के माहौल में काम करना पड़ेगा, तो इससे समाज में खुलकर विचार रखने की परंपरा कमजोर होगी.

राजनीतिक व्यंग्य पर नई बहस, क्या सीमित होगी अभिव्यक्ति

इस पूरे घटनाक्रम में कामरा ने जिस तरह से बालासाहेब ठाकरे की विरासत का हवाला दिया, वह चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गया है. उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि जिस परंपरा में सत्ता की आलोचना को स्वीकार किया जाता था, आज उसी को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है. अंत में कामरा ने अपने बयान में यह स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी संस्था का अपमान करना नहीं था, बल्कि राजनीतिक घटनाओं पर व्यंग्य करना था. उन्होंने कहा कि अगर ऐसे मामलों में कार्रवाई होती है, तो यह सिर्फ एक कलाकार का मामला नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करेगा.
 

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