'साहब मैं जिंदा हूं, मुझे कागजों में मत मारिए...', झारखंड में सिस्टम की लापरवाही, दर-दर भटक रहा बुजुर्ग

झारखंड के बोकारो जिले में एक बुजुर्ग को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिए जाने का मामला सामने आया है. 83 वर्षीय धरनीधर मांझी की पेंशन सत्यापन के बाद बंद कर दी गई, जबकि वे जीवित हैं. उन्होंने कई अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन समाधान नहीं मिला. अब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मामले की जांच के निर्देश दिए हैं और पीड़ित को मदद का भरोसा दिलाया है.

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बुजुर्ग न्याय की गुहार लगा रहा है. Photo ITG बुजुर्ग न्याय की गुहार लगा रहा है. Photo ITG

सत्यजीत कुमार

  • बोकारो,
  • 06 मई 2026,
  • अपडेटेड 8:10 PM IST

झारखंड के बोकारो जिले के चंदनकियारी प्रखंड से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसने सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. दामुडीह पंचायत के गोपीनाथपुर निवासी 83 वर्षीय धरनीधर मांझी को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया, जबकि वे जीवित हैं और अब न्याय की गुहार लगा रहे हैं.  

जानकारी के अनुसार, धरनीधर मांझी को वर्ष 2021-22 में वृद्धावस्था पेंशन मिलनी शुरू हुई थी, लेकिन 2022-23 में हुए संयुक्त भौतिक सत्यापन के बाद पंचायत स्तर पर उन्हें 'मृत' दिखा दिया गया, जिसके चलते उनकी पेंशन अचानक बंद कर दी गई.

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पीड़ित बुजुर्ग का कहना है कि पेंशन बंद होने के बाद से वे लगातार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं मिला. उन्होंने प्रखंड विकास पदाधिकारी, उपायुक्त और उप विकास आयुक्त को कई बार आवेदन देकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है और पेंशन बहाल करने की मांग की है. बुजुर्ग ने अधिकारियों से कहा, 'साहब मैं जिंदा हूं, मुझे कागजों में मत मारिए.'

मुखिया, पंचायत सचिव और आंगनबाड़ी कर्मियों की रिपोर्ट
धरनीधर मांझी का आरोप है कि मुखिया, पंचायत सचिव और आंगनबाड़ी कर्मियों की संयुक्त रिपोर्ट के आधार पर उन्हें गलत तरीके से मृत घोषित किया गया. उन्होंने मांग की है कि उनकी पेंशन तुरंत बहाल की जाए, रुकी हुई राशि का भुगतान किया जाए और इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो.

इस पूरे मामले में हेमंत सोरेन ने भी संज्ञान लिया है. उन्होंने X के जरिए बोकारो के उपायुक्त को निर्देश दिया है कि मामले की जांच कर पीड़ित की मदद सुनिश्चित की जाए और उन्हें इसकी जानकारी दी जाए.

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लगातार दर-दर भटकने के बावजूद समाधान न मिलने से बुजुर्ग की उम्मीद अब प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी है. यह मामला न केवल एक व्यक्ति की परेशानी को दर्शाता है, बल्कि सिस्टम की खामियों को भी उजागर करता है.

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