आनंदीबेन पटेल के मन की बात, इन 5 वजहों से दिया मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा

पिछले एक साल से गुजरात में चल रहे पाटीदार आरक्षण आंदोलन ने मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल की भूमिका पर ही सवाल खड़े कर दिए थे. 2002 के दंगों के बाद पहली बार पाटीदार आंदोलन के दौरान गुजरात में कर्फ्यू लगा जो कि आनंदीबेन पटेल के लिये एक बड़ा झटका माना जा रहा था.

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आनंदीबेन पटेल आनंदीबेन पटेल

सना जैदी / गोपी घांघर

  • अहमदाबाद,
  • 02 अगस्त 2016,
  • अपडेटेड 2:43 PM IST

आनंदीबेन पटेल ने सोमवार को सोशल मीडिया पर जैसे ही लिखा कि वो अब मुख्यमंत्री पद से हटना चाहती हैं, गुजरात के सियासी गलियारे में भूंचाल आ गया. पिछले दो दिन में आनंदीबेन पटेल जिस तरह एक के बाद एक सरकारी योजनाओं को लेकर घोषणाएं कर रही थीं, हर कोई यही सोच रहा होगा कि मुख्यमंत्री ये कर क्या रही हैं. आनंदीबेन ने दो दिनों में 4 बड़े फैसले लिए जिसके जरिए उन्होंने अपनी एक सकारात्मक छवि गढ़ने करने की कोशिश की.

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पहले तो उन्होंने गुजरात में सभी छोटी गाड़ि‍यों पर टोल टैक्स खत्म करने का फरमान सुनाया तो दूसरी बड़ी घोषणा पाटीदारों को लेकर भी की गई जिसमें उन्होंने पाटीदार आंदोलन के दौरान किए गए दंगों के केस में 90 फीसदी मामले वापस लेने का फैसला किया. तीसरा बड़ा फैसला 8 लाख सरकारी और रिटायर्ड सरकारी कर्मचारियों के लिए खुशी लेकर आया जिसमें आनंदीबेन ने 1 अगस्त से सातवें वेतन आयोग को लागू किए जाने की घोषणा कर दी और चौथी घोषणा आज फेसबुक पर अपनी पोस्ट लिखने से पहले की जिसमें 80 प्रतिशत से ज्यादा अंक लाने वाली छात्राओं को फ्री हायर एजुकेशन दिए जाने का ऐलान किया.

आइए जानते हैं कि वो कौन सी परिस्थ‍ितियां बनीं, जिनके चलते आनंदीबेन को अपने इस्तीफे का ऐलान करना पड़ा.

1) पाटीदार आरक्षण आंदोलन
पिछले एक साल से गुजरात में चल रहे पाटीदार आरक्षण आंदोलन ने की भूमिका पर ही सवाल खड़े कर दिए थे. 2002 के दंगों के बाद पहली बार पाटीदार आंदोलन के दौरान गुजरात में कर्फ्यू लगा जो कि आनंदीबेन पटेल के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा था. साथ ही पाटीदारों को कंट्रोल करने के लिए सेना तक को तैनात करना पड़ा.

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पाटीदार आंदोलन जब उग्र हुआ तो जगह जगह बीजेपी के खिलाफ नारेबाजी हुई. पाटीदार आंदोलन के दौरान बीजेपी की अंदरूनी कलह भी बाहर आ गई जिसने आनंदीबेन सरकार को हासिये पर लाकर खड़ा कर दिया. यहां तक कि सरकार पाटीदारों से सुलह का कोई जरिया भी नहीं ढूंढ पाई.

2) आनंदीबेन और शाह के बीच कोल्ड वार
बनने के बाद से ही उनके और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बीच कोल्ड वार चल रहा था. आनंदीबेन और शाह एक मंच पर एक साथ आना पंसद नहीं करते थे. अगर आते भी थे तो उनके बीच की दूरियां साफ दिखती थी. इसी बीच निकाय चुनाव में आनंदीबेन और शाह के गुट के बीच टिकट बंटवारे को लेकर भी काफी बवाल हुआ था. इस वजह से निकाय चुनावों में बीजेपी को काफी नुकसान भी उठाना पड़ा था.

3) परिवारवाद का आरोप
आनंदीबेन पटेल के लिए कहा जाता था कि उनकी सरकार उनके बेटे-बेटी चलाते हैं. यहां तक कि उनपर उनकी बेटी अनार पटेल को करोड़ों की वन विभाग की जमीन गलत तरीके से बेटी को देने के आरोप भी लगे. आनंदीबेन पटेल की बेटी को जमीन देने के मुद्दे को कांग्रेस ने इस कदर उछाला कि केंद्र में मौजूद मोदी सरकार को जवाब देना पड़ा.

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4) दलित आंदोलन
के बाद गुजरात के ऊना में गौरक्षकों ने जिस तरह दलितों को पीटा और मायावती ने मुद्दे को संसद में उछाला, आनंदीबेन सरकार एक बार फिर बैकफुट पर आ गई. आनंदीबेन सरकार ने आनन फानन में इस केस की जांच सीआईडी को सौंप दी, लेकिन सरकार कुछ और ठोस कदम उठाती, दलित समुदाय के लोग सड़कों पर उतर गए और 25 से ज्यादा लोगों ने सरकार का विरोध करते हुए आत्महत्या का प्रयास किया. यहां तक कि गुजरात में दलित महासम्मेलन हुआ तो उसमें भी भारी तादाद में जुटे दलितों ने आनंदीबेन पटेल सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

5) 75 की एज लिमिट
ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर 75 साल की उम्र की पार्टी की पॉलिसी की दुहाई देते हुए कहा कि वो खुद अपनी जिम्मेदारी से हटना चाहती हैं. लेकिन नरेंद्र मोदी की करीबी रहीं आनंदीबेन पटेल का यह फैसला मोदी सरकार के लिए भी काफी अहम माना जा रहा है. जानकार यही मान रहे हैं कि आनंदीबेन की ये फेसबुक पोस्ट अचानक नहीं आई है, इसके लिये प्रधानमंत्री के जरिए आनंदीबेन को पूरी तरह भरोसे में लिया गया है कि आनंदीबेन को कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जाए.

जानकार मानते हैं कि आनंदीबेन पटेल को अब किसी राज्य का गवर्नर बनाया जाया सकता है. हालांकि इसके बाद आने वाले उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए भी आनंदीबेन के नाम का प्रस्ताव भेजा जा सकता है.

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वैसे यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि आनंदीबेन को मुख्यमंत्री पद से हटा कर पार्टी ने और खास कर प्रधानमंत्री मोदी ने उनके लिए क्या भूमिका तय की है.

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