मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध का असर सूरत की प्रसिद्ध टेक्सटाइल इंडस्ट्री को बुरी तरह प्रभावित किया है. कच्चे माल, केमिकल्स, यार्न और कोयले की कमी के साथ-साथ उनकी कीमतों में भारी उछाल ने डाइंग और प्रिंटिंग मिलों की हालत खराब कर दी है. ऐसे में टेक्सटाइल इंडस्ट्री को चलाना मुश्किल हो रहा है. इंडस्ट्री में जारी भारी क्राइसिस और जमीनी हालातों को समझने के लिए आजतक की टीम 1200 कर्मचारियों वाले एक प्रतिभा डाइंग एंड प्रिंटिंग टेक्सटाइल मिल पर पहुंची, जहां मिल मालिक ने समस्याओं के बारे में जानकारी दी.
इस मुश्किल की पड़ताल के लिए आजतक की टीम सूरत के पांडेसरा इलाके में स्थित प्रतिभा डाइंग एंड प्रिंटिंग मिल पर पहुंची थी. यहां हमारी टीम की मुलाकात प्रतिभा टेक्सटाइल मिल के मालिक प्रमोद भाई चौधरी से हुई. उन्होंने हमारी टीम को अपनी टेक्सटाइल मिल में चल रहे काम काज का मुआयना करवाया.
उन्होंने बताया कि सूरत की इस मिल में अब सामान्य दिनों की तरह काम नहीं चल रहा है. गैस की किल्लत की वजह से, जहां एक तरफ श्रमिक पलायन कर रहे हैं तो दूसरी ओर मिल को चलाने में इस्तेमाल होने वाला मटेरियल आसानी नहीं मिल रहा है और मिल भी रहा है तो बहुत महंगा मिल रहा है. ऐसे हालात में उनके लिए मिल चलाना काफी मुश्किल हो रहा है.
'लागत में बढ़ोतरी'
उन्होंने बताया कि हमारी इंडस्ट्री पर युद्ध का काफी गंभीर असर दिख रहा है. हम जो कपड़ा बनाते हैं, वह ज्यादातर पेट्रोकेमिकल्स से बनता है (जैसे पॉलिस्टर फैब्रिक). युद्ध की वजह से धागे (यार्न) के दाम 25 से 30 रुपये प्रति किलो बढ़ गए हैं, जिससे कपड़े की क्वालिटी पर 4 से 5 रुपये प्रति मीटर का फर्क पड़ा है. कुल मिलाकर लागत में 10% से 20% तक की बढ़ोतरी हुई है. इस कारण व्यापारी माल कम खरीद रहे हैं और मिलों में भी काम कम आ रहा है.
आयात की चुनौतियां
इसके साथ ही डाइंग और प्रिंटिंग में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स और कलर्स भी 25% से 30% महंगे हो गए हैं. आयात (import) में भी दिक्कतें आ रही हैं, क्योंकि जहाजों की आवाजाही कम हो गई है, भाड़ा बढ़ गया है और डॉलर की दर भी बढ़ी हैं. एक और बड़ी समस्या कोयले की है जो हमारी लागत का 20% से 25% हिस्सा होता है. युद्ध के बाद से कोयले के दाम 1500 से 2000 रुपये प्रति टन बढ़ गए हैं. इन सब वजहों से श्रमिक भी अपने घरों की ओर लौट रहे हैं, क्योंकि उन्हें भविष्य की चिंता सता रही है. हालांकि, हमने और सरकार ने उनकी मदद के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे भोजन की व्यवस्था करना, पर फिर भी डर का माहौल बना हुआ है. हम पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब उत्पादन में 20% से 25% की कटौती करनी पड़ रही है.
मार्केट में कम हुई मांग
उन्होंने चेतावनी दी कि मार्केट में भी मांग कम हो गई है. हो सकता है कि आने वाले वक्त में हमें हफ्ते में दो दिन मिल बंद रखनी पड़े. पूरी तरह बंद करना तो मुश्किल है, पर कच्चे माल और कोयले की कमी की वजह से काम प्रभावित जरूर होगा.
मिडिल ईस्ट के युद्ध का असर सिर्फ़ एक टेक्स्टाइल मिल पर नहीं पड़ा है, बल्कि सारे टेक्स्टाइल मिलों की एक जैसी हालत है. ऐसे हालात में सूरत के टेक्सटाइल मिल कब तक चलेंगे ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.
संजय सिंह राठौर