प्रदूषण से निपटने के लिए दिल्ली में फिर होगा क्लाउड सीडिंग का ट्रायल, IIT कानपुर ने मांगी मंजूरी

Cloud Seeding: IIT कानपुर एक बार फिर दिल्ली में क्लाउड सीडिंग के ट्रायल की तैयारी कर रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि सही मौसम और नमी के साथ यह तकनीक सफल हो सकती है. IIT कानपुर ने इसके लिए DGCA से अनुमति मांगी है.

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दिल्ली में अक्टूबर 2025 में क्लाउड सीडिंग के दो ट्रायल फेल हुए थे (Getty Image) दिल्ली में अक्टूबर 2025 में क्लाउड सीडिंग के दो ट्रायल फेल हुए थे (Getty Image)

सिमर चावला

  • नई दिल्ली,
  • 03 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 12:59 PM IST

दिल्ली में खराब हवा और प्रदूषण से निपटने के लिए एक बार फिर क्लाउड सीडिंग (कृत्रिम वर्षा) का ट्रायल करने की तैयारी चल रही है. सूत्रों के मुताबिक, गर्मी के मौसम में आईआईटी कानपुर इसके लिए नई कोशिश कर सकता है. बता दें कि दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग और आईआईटी कानपुर के बीच 25 सितंबर 2025 को एक समझौता हुआ था. इसके बाद अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में क्लाउड सीडिंग के दो ट्रायल किए गए थे, लेकिन दोनों बार दिल्ली में आर्टिफिशियल बारिश नहीं हुई थी.

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IIT  कानपुर के विशेषज्ञों ने बताया कि ट्रायल नाकाम रहने की मुख्य वजह बादलों में नमी की कमी थी. फिर भी इन ट्रायलों से बहुत सारी उपयोगी जानकारी मिली है. इससे आगे के ट्रायल को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी. दिल्ली सरकार की रिपोर्ट में कहा गया, भले ही बारिश नहीं हुई लेकिन ट्रायल वाले इलाकों में हवा में मौजूद छोटे-छोटे कण (पार्टिकुलेट मैटर) कम जरूर हुए थे. यानी हवा थोड़ी साफ हुई.

अब IIT कानपुर पुराने ट्रायल की समीक्षा कर रहा है. संस्थान ने सिविल एविएशन महानिदेशालय (DGCA) से जरूरी मंजूरी मांगी है. एक अधिकारी ने बताया कि पिछले ट्रायलों के नतीजों को ध्यान में रखकर गर्मी के मौसम में नया ट्रायल किया जा सकता है. सही तारीख आईआईटी कानपुर ही तय करेगा.

दिल्ली में अक्टूबर 2025 में हुआ था क्लाउड सीडिंग का ट्रायल, देखें वीडियो

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क्लाउड सीडिंग क्या है?
क्लाउड सीडिंग एक ऐसी तकनीक है जिसमें बादलों में कुछ रसायन छोड़े जाते हैं ताकि बारिश हो सके. दिल्ली में सर्दियों में प्रदूषण बहुत बढ़ जाता है, ऐसे में सरकार और वैज्ञानिक क्लाउड सीडिंग और आर्टिफिशियल बारिश से हवा साफ करने की कोशिश कर रहे हैं. पिछले ट्रायल में सफलता नहीं मिलने के बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि सही मौसम और पर्याप्त नमी वाले बादलों में यह तरीका काम कर सकता है.

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