किशोर ने सारी रिहर्सल उत्तम नगर मेट्रो जाते हुए कर ली थी. अंदर जाओ, अपने ब्रांड की व्हिस्की मांगो, पैसे दो और निकल लो. एकदम सिंपल. लेकिन जैसे ही वह अपने मोहल्ले की सरकारी शराब की दुकान पर पहुंचा, उसका सारा प्लान चौपट हो गया.
बहुत छोटा सा काउंटर था, बाहर लोग लगभग एक-दूसरे पर चढ़े हुए थे. चारों ओर बेसब्री का आलम था. लोग सेल्समैन को चिल्ला-चिल्लाकर ब्रांड का नाम बोलते हुए, करारे नोट काउंटर पर फेंक रहे थे. सेल्समैन पहले ही शोर से चिढ़ा हुआ था.
किशोर किसी तरह भीड़ में से रास्ता बनाता हुआ ग्रिल तक पहुंचा और पूछा, "भैया ये ब्रांड मिलेगी?"
सेल्समैन ने मुश्किल से नजर मिलाई और कहा- ये नहीं है. फिर बिना रुके, उसने एक ऐसे ब्रांड का नाम लिया जिसे किशोर ने कभी सुना ही नहीं था. आवाज आई- ये ले लो. पीछे से किसी ने उसे धक्का दिया. इस हो-हल्ला के बीच किसी और ने एक और ब्रांड का नाम लिया.
सेल्समैन ने चिढ़कर किशोर को इशारा किया- चलो हटो. भीड़ में घिरा किशोर एक ऐसी बोतल लेकर चला आया जो उसे कभी चाहिए ही नहीं थी.
"वे ऐसे ब्रांड क्यों रखते हैं जिनके बारे में किसी ने सुना ही नहीं?" उसने सोचा और एक बार फिर सोचा "और वे ब्रांड कहां चले जाते हैं, जिसे हम मांगते हैं?"
दिल्ली के शराब के शौकीनों की ये वो टेंशन है, जिसका जवाब आसान नहीं.
दिल्ली के कई ग्राहकों को इसका जवाब साफ है- कोई, कहीं, कुछ गुमनाम ब्रांड्स को आगे बढ़ाने के लिए पैसे ले रहा है. और यह शक पूरी तरह से बेबुनियाद भी नहीं है.
यह मुद्दा शराब नीति बनाने वाले लोगों के बीच भी सामने आता रहता है. अधिकारियों ने माना है कि फालतू ब्रांड्स के शराब ने दिल्ली के लोगों को बॉर्डर पार करके गुरुग्राम और नोएडा जाने के लिए मजबूर किया है. दिसंबर के आखिर में दिल्ली सरकार ने अपनी शराब की दुकानों पर ब्रांड्स की मोनोपॉली को रोकने के लिए कुछ कदम उठाए. ऐसा उन रिपोर्टों के बाद किया गया जिनमें बताया गया था कि मुट्ठी भर ब्रांड्स ने ही दुकानों की शेल्फ़ पर कब्जा कर लिया है. इससे शराब के कई प्रीमियम ब्रांड पीछे छूट गए हैं.
दिल्ली पर्यटन और परिवहन विकास निगम (DTTDC) ने अपने वेंडर को एक निर्देश जारी किया है, और कहा गया है कि व्हिस्की, वोदका और बीयर सेगमेंट में एक ब्रांड या दो ब्रांड्स के ही प्रोडक्ट बिक रहे हैं. इस समस्या को दूर किया जाए. निर्देश की भाषा तो सरकारी थी, लेकिन जिस समस्या का इसमें ज़िक्र था वह बिल्कुल भी सरकारी नहीं थी.
एजेंसियों के छापों ने पब्लिक के अविश्वास को और गहरा ही किया है.
एक मामले में एक गुप्त सूचना पर कार्रवाई करते हुए इंस्पेक्टर नरेला के एक मॉल में मौजूद शराब दुकान में घुसे. दुकान आधी खुली, आधी बंद थी. ये दुकान दिल्ली राज्य औद्योगिक और बुनियादी ढांचा विकास निगम (DSIIDC) चलाता है. अंदर उन्हें कथित तौर पर चार लोग खाली प्रीमियम बोतलों में सस्ती शराब और पानी भरते हुए मिले. बाहर खाली बोतलों से भरी एक गाड़ी इंतजार कर रही थी. एक अन्य घटना में जो नरेला में ही हुई, कर्मचारियों को महंगे ब्रांड्स की ऐसी बोतलें बेचते हुए पकड़ा गया जिनमें सस्ती शराब मिला दी गई थी. आबकारी विभाग ने तब से राजधानी के सभी 793 वेंड्स पर अपनी निगरानी बढ़ा दी है.
इस मोनोपॉली में कोई कॉम्पिटिशन नहीं
आज दिल्ली में शराब की हर दुकान एक सरकारी निगम द्वारा चलाई जाती है. चार सरकारी एजेंसियां DTTDC, DSIIDC, दिल्ली राज्य नागरिक आपूर्ति निगम (DSCSC) और दिल्ली उपभोक्ता सहकारी थोक भंडार लिमिटेड (DCCWS) द्वारा संचालित 793 दुकानें, लगभग 2 करोड़ लोगों के शहर को सेवा देती हैं.
यह व्यवस्था 2021 की आबकारी नीति को वापस लेने के बाद शुरू की गई थी. इसकी एक वजह पारदर्शिता भी थी. लेकिन कई ग्राहकों का कहना है कि ट्रांसपेरेंसी तो छोड़िए यहां मोनोपॉली हो गई है. आपके पास कुछ ही ऑप्शन हैं, बेकार सर्विस और कभी कभी तो आपको ऐसा अनुभव होगा जैसे लगेगा कि आज तो मारपीट ही हो जाती.
मार्केटिंग पेशेवर अनमोल जायसवाल साफ-साफ कहते हैं, "सेल्समैन आमतौर पर व्यस्त रहते हैं और उनसे बात करना मुश्किल होता है. वे ग्राहकों को सही जानकारी नहीं देते. दुकानों में भीड़ रहती है, लंबी कतारें होती हैं और प्रोडक्ट को ठीक से दिखाया नहीं किया जाता."
जामिया नगर में रहने वाले सेल्स एग्जीक्यूटिव जुनैद, जो कभी-कभार शराब पीते हैं, गुस्से से ज़्यादा निराश हैं. वे कहते हैं कि कर्मचारियों को कोई मतलब नहीं है. "वे बदतमीज़ तो नहीं हैं, लेकिन मददगार भी नहीं हैं." वीकेंड पर आपकी पसंद की ब्रांड मिलती नहीं है. कभी-कभी उन्हें अपनी पसंद की चीज पाने के लिए कई दुकानों के चक्कर लगाने पड़ते हैं.
महिलाओं के लिए समस्या प्रोडक्ट और क्वालिटी नहीं माहौल है
"मैंने सालों से किसी दुकान पर जाना छोड़ दिया है," वसुंधरा एन्क्लेव की आकांक्षा माथुर कहती हैं. "वहां बहुत भीड़ होती है और सुरक्षित महसूस नहीं होता. ज़्यादातर दुकानें ऐसी जगहों पर होती हैं जहां का माहौल ठीक नहीं होता. और वहां का स्टाफ महिला कस्टमर को अक्सर जज करने वाली निगाहों से देखता है.
वे थोड़ी देर रुकती हैं, फिर कहती हैं, "गुरुग्राम के प्राइवेट स्टोर के मुकाबले यहां का फ़र्क साफ नजर आता है."
कई महिलाओं ने तो वहां जाना ही पूरी तरह से बंद कर दिया है. जो अब भी जाती हैं वे अपने अनुभव को गुस्से से नहीं बल्कि एक तरह की थकी हुई आदत के तौर पर बताती हैं.
"सरकारी दुकानों में एक तरह की बेपरवाही नज़र आती है," एडवरटाइजिंग प्रोफ़ेशनल सुप्रिया सेन कहती हैं. वह मयूर विहार एक्सटेंशन में अपने इलाके में मौजूद कॉर्पोरेशन के ठेके पर हर कुछ महीनों में एक बार जाती हैं. "अगर आप पूछेंगी तो वे मदद करेंगे, लेकिन स्टाफ को अक्सर प्रॉडक्ट्स के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं होती." वह वाइन पीती हैं, और स्टाफ की नादानी उन्हें झुंझलाहट होती है. "अगर मैं 'Pinot noir' ढूंढ रही हूं, तो मैं यह नहीं सुनना चाहती कि 'हमारे पास सिर्फ़ सुला है, 'ग्राहक सजेशन चाहते हैं, सिर्फ लेन-देन नहीं."
गुरुग्राम के कई बड़े स्टोर्स में कंपनियों ने ठीक इसी वजह से काबिल वाइन वेटर्स को रखना शुरू कर दिया है.
ये वैसा ही है कि आप महज बॉर्डर पार करें, एक नई किस्म की दुनिया आपका इंतजार कर रही है.
उत्तम नगर से बीस मिनट की दूरी पर, दिल्ली-गुरुग्राम सीमा के उस पार नजारा बिल्कुल ही अलग और हैरान करने वाला है.
गुरुग्राम की शराब दुकानें मॉर्डन रिटेल आउटलेट्स जैसी दिखती हैं. चमकदार रोशनी, एयरकंडीशन की ठंडी हवा. सुपरमार्केट की तरह चीजें करीने से रखी हुईं. स्टाफ दरवाजे पर ही मुस्कुराकर ग्राहकों का स्वागत करता है, उनकी पसंद पूछता है, और उन्हें व्हिस्की कॉर्नर में ले जाता है, वाइन की वैरायटी बताता है. कस्टमर को एक बास्केट मिलती है, वे आराम से अपनी पसंद की चीज़ें देख-परख सकते हैं.
वहां न कोई शोर-शराबा होता है. न कोई आपको कोहनी से टक्कर मारता है. और न ही किसी की मर्ज़ी के बिना, जबरदस्ती उनके हाथों में कोई अनजान बोतल थमा दी जाती है.
"यहां वैरायटी बहुत ज़्यादा है, इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर है, और स्टाफ़ भी विनम्र और मददगार हैं," माथुर कहती हैं. "यहां का माहौल सभ्य लगता है. और सुरक्षित भी." पार्किंग आसान है. बिलिंग तेज़ है. यहां का माहौल चीज़ों को एक्सप्लोर करने के लिए बढ़ावा देता है, न कि ये सजा बन जाता है.
यह फ़र्क दिल्ली जैसे शहर में खास तौर पर साफ़ दिखता है. जो भारत की राजधानी है, और जहां डिप्लोमैट, प्रवासी, बड़े अफसर और रईस लोग रहते हैं. दुनिया की ज़्यादातर राजधानियों में शराब की रिटेल बिक्री अब एक अनुभव-आधारित सेक्टर बन गई है, जहां एम्बिएंस, वैरायटी और एक्सपर्टीज को ज्यादा बेहतर बनाने पर जोर होता है. इसके उलट दिल्ली अभी भी 'मोहल्ले के ठेके' वाले दौर में ही फंसी हुई है. जहां सब कुछ बस कामचलाऊ है, कोई भाव नहीं. और जिसे ग्राहक के बजाय सिर्फ ज़्यादा से ज़्यादा बिक्री के हिसाब के लिए डिजाइन किया गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक अब अधिकारियों ने सुधारों पर चर्चा शुरू कर दी है, वे कुछ ज़्यादा भीड़भाड़ वाली दुकानों को आधुनिक बनाने, लेआउट और इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने पर काम कर रहे हैं. लेकिन जब तक ढांचागत समस्याएं बनी रहेंगी जैसे नाम मात्र के ब्रांड, खराब सर्विस कल्चर और जब तब पसंद के ब्रांड का गायब हो जाना, तब तक इस अनुभव में कोई खास बदलाव आने की उम्मीद कम ही है.
दिल्ली में शराबनोशी करने वालों के लिए हिसाब पहले ही तय हो चुका है. वे बीस मिनट ड्राइव करते हैं. बॉर्डर के उस पार होते है, वहां शेल्फ भरी होती हैं, स्टाफ वेलकम करने वाला होता है, और बोतल खरीदने के लिए भीड़ से भिड़ने की जरूरत नहीं होती. ऐसी हर ट्रिप दिल्ली के एक्साइज़ डिपार्टमेंट के लिए कमाई की चपत है. ऐसी हर ट्रिप बताती है कि शराब के क्षेत्र में सरकार की मोनोपॉली ने शहर के रिटेल इकोसिस्टम को क्या बना दिया है.
किशोर, अपने हाथ में उस अनजान बोतल को घूरते हुए उसी नतीजे पर पहुंचे. अगली बार उसने तय किया वह उत्तम नगर बिल्कुल नहीं जाएगा.
गुरुग्राम इतना भी दूर नहीं था.
बिशन कुमार