बिहारः लालू के 'M-Y' समीकरण की प्रयोगशाला रहा सीमांचल, 2019 से कितनी बदल गई तस्वीर?

बिहार में लालू यादव के मुस्लिम यादव समीकरण की प्रयोगशाला सीमांचल में लोकसभा चुनाव से पहले समीकरण बदले हुए हैं. जेडीयू महागठबंधन के साथ है तो वहीं पप्पू यादव ने भी पूर्णिया सीट से मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया है. सीमांचल में 2019 की तुलना में तस्वीर कितनी बदल गई है?

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बिहार में बदल गए हैं राजनीतिक समीकरण बिहार में बदल गए हैं राजनीतिक समीकरण

कुणाल कौशल

  • नई दिल्ली,
  • 17 जुलाई 2023,
  • अपडेटेड 2:17 PM IST

लोकसभा चुनाव अगले साल होने हैं. चुनाव कार्यक्रम का ऐलान अभी नहीं हुआ है लेकिन सभी राजनीतिक पार्टियों ने चुनावी बिगुल फूंक दिया है. 2024 के चुनाव में सत्ताधारी बीजेपी को मात देने के लिए बीते महीने 23 जून को बिहार की राजधानी पटना में पंद्रह दलों ने एकजुट होकर लड़ने का ऐलान किया था. इस विपक्षी एकता के सूत्रधार महागठबंन में शामिल जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के दो प्रमुख नेता नीतीश कुमार और लालू यादव हैं. महागठबंधन की इस कोशिश का बिहार की राजनीति पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है.

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नीतीश की पार्टी के एनडीए छोड़कर आरजेडी के साथ महागठबंधन में आने का असर बिहार के राजनीतिक समीकरण पर पड़ा. बदले हालात में सीमांचल बिहार की सियासी जंग का केंद्र बनकर उभरा है. जेडीयू हो या आरजेडी या फिर बीजेपी, तीनों ही दलों ने सीमांचल में खुद को मजबूत करने में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया है.

दरअसल, सीमांचल में विधानसभा की 24 सीटें हैं जबकि लोकसभा की चार सीटें इस क्षेत्र से आती हैं. करीब 60 लाख वोट वाले इस इलाके में ज्यादातर सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. वहीं बीजेपी को इस क्षेत्र में अपने कोर वोटरों (ब्राह्मण, बनिया, ओबीसी) पर भरोसा है. महागठबंधन में नीतीश के शामिल होने के बाद बदले समीकरण को देखते हुए बीजेपी इस इलाके में इस बार ज्यादा सक्रिय नजर आ रही है.

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यही वजह है कि बीते साल जब नीतीश कुमार एनडीए से अलग हो गए थे तो बीजेपी ने गृह मंत्री अमित शाह की पहली रैली पूर्णिया में आयोजित की थी. पूर्णिया सीमांचल के सभी जिलों की कमिश्नरी है और ज्यादातर प्रशासनिक काम यहीं से होते हैं. इसके जवाब में आरजेडी, जेडीयू, कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों वाले महागठबंधन ने भी पूर्णिया के रंगभूमि मैदान में रैली का आयोजन किया था जिसमें निशाने पर अमित शाह ही थे.

सीमांचल में बदले समीकरण

सीमांचल में 2019 के मुकाबले इस बार चुनावी समीकरण बिल्कुल उलट चुके हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में सीमांचल के चार लोकसभा सीटों में से बीजेपी-जेडीयू गठबंधन को तीन सीटें मिली थी. पूर्णिया, कटिहार सीट जेडीयू के खाते में गई थी जबकि अररिया में बीजेपी ने बाजी मारी थी.

अररिया सीट पर बीजेपी को नीतीश कुमार की छवि का फायदा मिला था तो वहीं, कटिहार में जेडीयू को बीजेपी से गठबंधन का लाभ हुआ था. 2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन को सीमांचल की 24 विधानसभा सीटों में से 12 सीटों पर जीत मिली थी और महागठबंधन को 2015 के चुनाव के मुकाबले 11 सीटों का नुकसान हुआ था. 

बीते विधानसभा चुनाव में सीमांचल में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने सबसे ज्यादा नुकसान महागठबंधन को ही पहुंचाया था. ओवैसी की पार्टी चार सीटों पर जीती थी और इसे मुस्लिम वोट पर आरजेडी की कमजोर होती पकड़ का संकेत माना गया. मुस्लिम वोट बंटे और बीजेपी को इसका सीधा लाभ मिला. बीजेपी छह सीटें जीतने में सफल रही थी.

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लालू के एम-वाई समीकरण की प्रयोगशाला

ओवैसी के चार में से तीन विधायक आरजेडी में शामिल हो चुके हैं. सीमांचल में पार्टी के संगठन प्रभारी रहे मौलाना गुलाम रब्बानी भी कांग्रेस में जा चुके हैं. सीमांचल में ओवैसी के कमजोर होने का मतलब है कि महागठबंधन को लाभ मिलेगा. बीजेपी को एनडीए से जेडीयू के अलग होने का नुकसान होगा. अगर सीमांचल के इन जिलों में मुस्लिमों मतदातातों की संख्या सबसे ज्यादा है. इस क्षेत्र में यादवों की संख्या भी अच्छी है. यही वजह है कि इस इलाके को लालू यादव के MY (मुस्लिम+यादव) समीकरण की प्रयोशाला कहा जाता है.

आरजेडी राज्य की सत्ता में आने के बाद से ही इस इलाके में अपने कोर वोटरों की गोलबंदी में लगी हुई है. यही वजह है कि आए दिन तेजस्वी यादव इस इलाके का दौरा कर अपनी पार्टी को मजबूत करने की कोशिश में लगे रहते हैं. वहीं जेडीयू ने भी पूर्णिया के सांसद संतोष कुशवाहा को महासचिव बनाकर सीमांचल को संदेश देने की कोशिश की है. पूर्णिया में कुर्मी जाति के मतदाताओं अच्छी तादाद में हैं जिन्हें जेडीयू का कोर वोटर माना जाता है.

पूर्णिया-कटिहार से कौन होगा बीजेपी उम्मीदवार

जेडीयू से गठबंधन टूटने के बाद बीजेपी इस बार पूर्णिया और कटिहार से अपना उम्मीदवार उतारेगी. पिछले चुनाव में ये दोनों सीटें जेडीयू के हिस्से में थीं. बीजेपी के टिकट पर दो बार के पूर्व सांसद उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह इस बार कांग्रेस का दामन छोड़कर घर वापसी कर सकते हैं. पिछले दिनों उन्होंने इसके संकेत भी दे दिए थे. पिछले चुनाव में उदय सिंह कांग्रेस के टिकट पर पूर्णिया से मैदान में उतरे थे लेकिन जेडीयू के संतोष कुशवाहा से मात खानी पड़ी थी.

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पप्पू यादव ने किया पूर्णिया से चुनाव लड़ने का ऐलान

पूर्णिया सीट पर इस बार जन अधिकार मोर्चा के अध्यक्ष पप्पू यादव महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं. उन्होंने राजधानी पटना में अपनी पार्टी को महागठबंधन में शामिल किए जाने की अपील की थी. पप्पू की अपील पर जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. उन्होंने अब पूर्णिया लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. पप्पू यादव पूर्णिया से सांसद रह चुके हैं और अगर वे इस सीट से मैदान में उतरते हैं तो महागठबंधन का खेल खराब कर सकते हैं. शहरी आबादी के साथ ही यादव वोट पर भी उनकी अच्छी पकड़ है.

वहीं, कटिहार सीट पर इस बार बीजेपी मौजूदा सांसद दुलाल चंद्र गोस्वामी (जेडीयू) के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारेगी. अररिया में महागठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर सीमांचल के गांधी कहे जाने वाले मरहूम नेता तस्लीमुद्दीन के बेटे को चुनाव में उतारने की तैयारी है. किशनगंज सीट कांग्रेस के खाते में जाएगी. पिछले लोकसभा चुनाव में महागठबंधन को जिस एक सीट पर जीत मिली थी वह किशनगंज ही थी जहां से कांग्रेस उम्मीदवार विजयी हुए थे.

 

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