अकादमिक में हिन्दुत्व पर शोध करने वालों को भी मौका क्यों न मिले?

ज्यादातर अकादमिक केंद्रों और प्रकाशन एजेंसियों पर वामपंथी नेताओं का नियंत्रण है. अपने दायरे से बाहर के विद्वानों को मान्यता देने में उन्हें झिझक होती है.

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एमजीएस नारायणन

  • नई दिल्ली,
  • 12 अगस्त 2014,
  • अपडेटेड 2:47 PM IST

भारत के सबसे चर्चित इतिहासकारों में से एक रोमिला थापर ने भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आइसीएचआर) के अध्यक्ष के रूप में वाइ. सुदर्शन राव की नियुक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करते हुए बयान दिया है. उनकी विद्वता और मुकाम का पूरा सम्मान करते हुए मैं चंद तथ्यों और इस मामले से जुड़े असहमतिपूर्ण विचारों पर रोशनी डालना चाहता हूं.

उनकी सबसे बड़ी शिकायत है कि राव के काम से ज्यादातर इतिहासकार परिचित नहीं हैं. उन्होंने प्रतिष्ठित समीक्षात्मक पत्रिकाओं में भारतीय महाकाव्यों की ऐतिहासिकता पर लेख आदि भी नहीं लिखे हैं. ऐसे में उनका कुछ शोधकार्य भी दिखाई नहीं दिया है. यह सच है, लेकिन हमें यह भी तो सोचना पड़ेगा कि बदकिस्मती से हमारे ज्यादातर शैक्षिक केंद्रों और प्रकाशन एजेंसियों पर वामपंथी दलों के राजनेताओं का कब्जा है. अपनी जमात से बाहर के लोगों को पहचान देने में उन्हें बड़ा संकोच होता है.

कई स्वयंभू मार्क्सवादी लेखक संकीर्ण सांप्रदायिक विचारों का पोषण करते हैं. वे दावा करते हैं कि वे कभी गलत नहीं होते पर इतर दृष्टिकोण उन्हें बर्दाश्त नहीं है. आइसीएचआर के सदस्य सचिव (1990-92) और इसके अध्यक्ष (2001-03) के रूप में कार्य करते हुए मैंने परिषद पर चंद केंद्रीय विश्वविद्यालयों (जेएनयू, अलीगढ़ और कलकत्ता) के एकाधिकार को खत्म करने के लिए कई कदम उठाए.

बाबरी मस्जिद ग्रुप और राम जन्मभूमि ग्रुप दोनों तरह के इतिहासकारों को मैं कट्टरपंथी मानता हूं. मार्क्सवादी इतिहासकारों का तबका सांप्रदायिक नहीं था फिर भी उसने राजनीति से प्रेरित होकर छिपे तौर पर बाबरी मस्जिद खेमे की तरफदारी की. हिंदुत्व समर्थक हलके की रणनीति अधकचरी थी, वहीं 'माक्र्सवादी’ हलके की रणनीति मंझी हुई थी.

पहली बीजेपी सरकार के वक्त जब मैं आइसीएचआर में अध्यक्ष था, उस समय वाइ. सुदर्शन राव आइसीएचआर के सदस्य थे. परिषद में बारह दूसरे इतिहासकारों के मुकाबले छह इतिहासकारों वाला हिंदुत्व समूह छोटा था. राव के विचार उस बहुसंख्यक विचारधारा के विरुद्ध थे जिसका मार्गदर्शन मैं बतौर अध्यक्ष कर रहा था, लेकिन वे मुझे पूरी तरह से गरिमापूर्ण और खुले विचारों वाले शख्स लगे.

मैं महाकाव्यों की ऐतिहासिक प्रामाणिकता के संबंध में पेश उनके नजरिए से सहमत नहीं, फिर भी मैं मानता हूं कि कई इतिहासकार ऐसे दृष्टिकोण रखते हैं और मैं शोध को आगे बढ़ाने के लिए तरीकों का चुनाव करने के उनके लोकतांत्रिक अधिकार का समर्थन करता हूं. ऐतिहासिक निष्कर्ष पर पहुंचने का कोई अंतिम चरण नहीं होता और सभी पर एक खुली बहस होनी चाहिए.

इस सिलसिले में मैंने हमेशा देखा है कि किसी भी रूढि़वादी हिंदुत्ववादी विचार के प्रति सहानुभूति रखने वाला फासीवादी करार दे दिया जाता है और 'मार्क्सवादी’ उसे दबोच लेते हैं, जबकि दूसरे समुदायों के उग्रपंथी तत्वों को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर संरक्षण दिया गया है. हिंदुत्व पर शोध करने वाले इतिहासकारों को उनकी अपनी अगुआई में संस्थानों की प्रतिष्ठापूर्ण शोध पत्रिकाओं में उनके विचारों को छपवाने का मौका मिलना चाहिए.

वैसे भी रोमिला थापर की तरह सभी को तो बड़ा शोध करने के लिए भारत से बाहर के अधिक सुविधापूर्ण शोध केंद्रों में प्रशिक्षण हासिल करने का मौका नहीं मिलता.

मुझे थापर की मानव संसाधन विकास मंत्री के बारे में की गई कठोर टिप्पणी पर एतराज है. शैक्षणिक योग्यता को हमारे समाज में योग्यता का पैमाना नहीं माना जा सकता जहां उच्चतम शैक्षिक केंद्रों पर कांग्रेस पार्टी या मार्क्सवाद के हिमायती विद्वानों ने नियंत्रण और एकाधिकार जमा रखा है.

थापर ने अपने बयान में एक जगह राव के उस दावे की आलोचना की है जिसमें उन्होंने बाबरी मस्जिद के निर्माण से पहले वहां मंदिर होने के पुरातात्विक साक्ष्य की मौजूदगी पर जोर दिया है. वे इस दावे को काफी हद तक एक राजनैतिक बयान ठहरा रही हैं क्योंकि अयोध्या में विवादास्पद स्थल पर हुई खुदाई की रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है.

इस संदर्भ में मैं उनका ध्यान नागरी लिपि और संस्कृत भाषा में गोविंद चंद्र के लिखे हरि-विष्णु शिलालेखों की ओर खींचना चाहता हूं जो बाबरी मस्जिद की दीवार की दो परतों के बीच पाए गए थे और जिन्हें नागपुर यूनिवर्सिटी में प्राचीन इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष अजय मित्र शास्त्री ने प्रकाशित कराया था.

गोविंद चंद्र के शिलालेख 11वीं और 12वीं ईस्वी के हैं जिनमें विष्णु-हरि के एक अद्भुत मंदिर की बात कही गई है जो साकेतमंडल में स्थित मंदिरों के शहर अयोध्या में बनाया गया था. शिलालेख के मुताबिक, विष्णु-हरि बाली और दशानन के संहारक थे. यह दस्तावेज इस बात का साफ  सबूत है कि बाबरी मस्जिद बनने के पहले वहां एक विष्णु मंदिर था.

दिलचस्प बात है कि अयोध्या मंदिर का निर्माण कराने वाले राजा गोविंद चंद्र पुनरुत्थानवादी ब्राह्मणवाद के पैरोकार और उत्तर कोशल (तब जहां अयोध्या स्थित थी) के शासक थे जिनकी तुर्कों से दुश्मनी थी. उन्होंने वाराणसी की तुर्कों से रक्षा की थी. गोविंद चंद्र के बाद विजय चंद्र सिंहासन पर बैठे. उनके बेटे जयचंद्र को मुहम्मद गोरी ने मार डाला, जिसने दिल्ली में मुस्लिम सुल्तानों के शासन की बुनियाद रखी जो आगे जाकर मुगल साम्राज्य के रूप में फैला और बाद में भारत पर ब्रिटिश हुकूमत काबिज हुई.

एमजीएस नारायणन आइसीएचआर के अध्यक्ष रहे हैं. यह आलेख उन्होंने 23 जुलाई के अंक में वेताल फिर से डाल पर शीर्षक से लिखे इतिहासकार रोमिला थापर के आलेख की प्रतिक्रियास्वरूप लिखा है.

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