'ट्रंप के टैरिफ...', भारत के हालात पर दुनिया भर में क्यों जताई जा रही चिंता

दुनिया की नामचीन पत्रिका 'द लैंसेट' के एडिटर और हेल्थ एक्सपर्ट रिचर्ड हॉर्टन ने भारत में वायु प्रदूषण की स्थिति पर चिंता जताई है. उन्होंने कहा है कि भारत इस बड़े संकट से निपटने में विफल रहा है. उन्होंने कहा कि आखिर क्या वजह है कि लाखों मौतों और जहरीली हवा के बावजूद भारत में अब तक कोई आक्रोश नहीं है

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गीता गोपीनाथ और रिचर्ड हॉर्टन ने भारत में प्रदूषण पर चिंता जताई (ITG) गीता गोपीनाथ और रिचर्ड हॉर्टन ने भारत में प्रदूषण पर चिंता जताई (ITG)

सुमी सुकन्या दत्ता

  • नई दिल्ली,
  • 23 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:21 PM IST

आजकल हर दिन भारत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ के असर को लेकर चर्चा होती है लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इस वक्त भारत के लिए टैरिफ से कहीं बड़ी ज्यादा समस्या वायु प्रदूषण है. 

भारत में हवा एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बन चुकी है. 'द लैंसेट' के अनुसार, देश में साल 2022 में प्रदूषण के कारण लगभग 17 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई. इस भयावह स्थिति पर दुनिया की जानी-मानी पत्रिका 'द लैंसेट' के संपादक और वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञ रिचर्ड हॉर्टन ने भारत को आईना दिखाते हुए कड़े सवाल खड़े किए हैं.

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उन्होंने कहा कि भारत गंदी हवा से मर रहा है और किसी को भी इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा रहा. आखिर भारत का लोकतंत्र साफ हवा की मांग क्यों नहीं कर रहा है और लोग भी सवाल नहीं कर रहे हैं. भारत की सरकार का वायु प्रदूषण को गंभीरता से न लेना रहस्यमयी और अजीब है. उनका कहना है कि असली समस्या लोगों की उदासीनता और राजनीतिक जवाबदेही की कमी है. 

वायु प्रदूषण से निपटने में भारत फेल

इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में हॉर्टन ने कहा कि यह परेशान करने वाली बात है कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र होने के बावजूद बढ़ते सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का सामना करने में विफल रहा है. उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि बीजिंग जैसे शहरों में सालों तक दमघोंटू हवा और प्रदूषण झेलने के बाद चीन ने स्थिति सुधारने के लिए कड़े और ठोस कदम उठाए जबकि भारत इस दिशा में अब भी पिछड़ा हुआ है. 

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जनसंख्या के मुद्दे, पर्यावरण स्वास्थ्य के मुखर पैरोकार और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति को नई दिशा देने के लिए विश्व स्तर पर पहचाने जाने वाले रिचर्ड हॉर्टन ने भारत की स्थिति पर आश्चर्य व्यक्त किया है. हॉर्टन का कहना है कि वो इस बात से हैरान हैं कि भारत में प्रदूषण जैसे गंभीर विषय पर अब तक कोई बड़ा आक्रोश नहीं देखा गया है. 

उन्होंने पूछा, 'भारत जैसा मजबूत लोकतंत्र होने के बावजूद मुझे यह परेशान करने वाला लगता है. जनता परेशान क्यों नहीं है? वो सरकार से ज्यादा सवाल क्यों नहीं पूछ रहे हैं? वो यह क्यों नहीं कह रहे हैं कि यह मंजूर नहीं है और अगर आप इसे ठीक नहीं करेंगे तो हम आपको वोट का इस्तेमाल कर हटा देंगे.'

टैरिफ नहीं जहरीली हवा ज्यादा बड़ा खतरा

उनकी ये टिप्पणियां अर्थशास्त्रियों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की बढ़ती चिंताओं के बीच आई हैं.

बुधवार को IMF की पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर व अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने जेनेवा में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के एक कार्यक्रम में कहा कि इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा टैरिफ नहीं बल्कि वायु प्रदूषण है. प्रदूषण की वजह से भारत को पैसे और इंसानी जिंदगी दोनों के मामले में भारी नुकसान हो रहा है और इस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है.

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वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि 2022 में भारत में वायु प्रदूषण के कारण अनुमानित 17 लाख मौतें हुईं. 

वर्ल्ड बैंक ने भी दी चेतावनी

पिछले हफ्ते जारी वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट ने इस संकट की गंभीरता की तरफ इशारा करते हुए कहा कि भारत की 1.4 अरब आबादी का 100 प्रतिशत हिस्सा कई स्रोतों से उत्पन्न होने वाले सबसे हानिकारक वायु प्रदूषक PM2.5 के खतरनाक संपर्क में है. यह स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चेतावनी है. 

साल के ज्यादातर समय तक भारत के किसी भी बड़े शहर में एयर क्वालिटी इंडेक्स 50 या उससे कम नहीं रहता जिसे 'अच्छा' माना जाता है. उत्तरी भारत के बड़े हिस्सों में अक्सर AQI लेवल 400 से ऊपर चला जाता है. खासकर सर्दियों में दिल्ली और उसके आसपास के इलाके दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरी इलाकों में से हैं.

धीमी मौत पर कोई जवाबदेही नहीं
हॉर्टन का मानना ​​है कि प्रदूषण से होने वाली बीमारियों और उनसे होने वाली मौत धीमे-धीमे होती हैं. इस वजह से ही जनता और पॉलिसी बनाने वाले दोनों जिम्मेदारी से बच निकलते हैं.

उन्होंने कहा, ' गंभीर स्तर का वायु प्रदूषण कार्डियोवैस्कुलर बीमारियां, सांस की समस्याएं यहां तक कि फेफड़ों का कैंसर का भी कारण बन सकता है लेकिन इनमें से कुछ भी एक दिन, एक हफ्ते या एक साल में नहीं होता. जनवरी 2026 में जिस प्रदूषण के संपर्क में आप आएंगे, उसका असर 12, 18 या 24 महीने बाद दिखेगा.'

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हॉर्टन ने आगे कहा, 'अगर मुझे कोई कार टक्कर मार दे तो जिंदगी तुरंत खत्म हो जाती है. प्रदूषण के साथ ऐसा नहीं होता.'

उन्होंने कहा कि पॉलिसी बनाने वाले यह जानते हैं कि इसके सबसे बुरे असर भविष्य में होंगे और इसलिए उन्हें अभी कार्रवाई करने का ज्यादा दबाव महसूस नहीं होता.

चीन ने वायु प्रदूषण पर लगाई लगाम

चीन से तुलना करते हुए हॉर्टन ने कहा कि एक समय बीजिंग में प्रदूषण का स्तर इतना गंभीर था कि उसे हवा में महसूस किया जा सकता था. इसके बाद चीन ने शहर के अंदर और आसपास के इलाकों में ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को बंद कर दिया और गाड़ियों के इस्तेमाल पर सख्त पाबंदियां लगा दी थी.

लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन में मानद प्रोफेसर हॉर्टन ने आगे कहा, 'अब बीजिंग जाना हवा के मामले में गांव जाने जैसा लगता है. यह बहुत साफ और सुंदर है.'

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