पश्चिम बंगाल में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू किए जाने के ऐलान के बाद एक बार फिर देशभर में इस कानून को लेकर बहस तेज हो गई है. बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बुधवार को घोषणा की कि राज्य में अब CAA लागू कर दिया गया है और जो लोग इस कानून के दायरे में नहीं आते, उन्हें अवैध घुसपैठिया मानकर गिरफ्तार किया जाएगा और सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंपा जाएगा, ताकि उन्हें बांग्लादेश वापस भेजा जा सके.
नाबन्ना में BSF अधिकारियों के साथ बैठक के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा, “CAA के तहत आने वाले लोगों को नागरिकता दी जाएगी, लेकिन जो इसके दायरे में नहीं आते, वे घुसपैठिए हैं. पुलिस उन्हें गिरफ्तार करेगी और BSF उन्हें बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (पूर्व में बांग्लादेश राइफल्स) के संपर्क में जाकर डिपोर्ट करेगी.”
आखिर CAA है क्या?
नागरिकता संशोधन कानून यानी Citizenship Amendment Act (CAA) संसद से 2019 में पारित हुआ था. इसका उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए छह गैर-मुस्लिम समुदायों को भारतीय नागरिकता देना है. इनमें हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय शामिल हैं. केंद्र सरकार की सितंबर 2025 की अधिसूचना के मुताबिक, जो लोग 31 दिसंबर 2024 तक भारत आ चुके हैं, वे CAA के तहत नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं. खास बात यह है कि इन समुदायों के लोग वैध पासपोर्ट या दस्तावेज न होने पर भी भारत में कानूनी रूप से रह सकते हैं.
क्या CAA से किसी की नागरिकता चली जाती है?
CAA को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या इस कानून से किसी भारतीय मुसलमान या किसी अन्य नागरिक की नागरिकता छिन सकती है? इसका सीधा जवाब है- नहीं. CAA नागरिकता देने का कानून है, नागरिकता छीनने का नहीं. यह कानून सिर्फ कुछ विशेष समुदायों के शरणार्थियों को नागरिकता देने की प्रक्रिया आसान करता है. इसमें कहीं भी किसी भारतीय नागरिक की नागरिकता समाप्त करने का प्रावधान नहीं है.
हालांकि, विरोध करने वाले समूहों का तर्क रहा है कि जब इसे राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के साथ जोड़ा जाएगा, तब यह विवाद पैदा कर सकता है. आशंका यह जताई जाती रही है कि अगर NRC लागू हुआ और कोई व्यक्ति अपने दस्तावेज नहीं दिखा पाया, तो गैर-मुस्लिम समुदाय के लोग CAA के जरिए राहत पा सकते हैं, जबकि मुसलमानों के पास वैसा विकल्प नहीं होगा. इसी वजह से CAA को लेकर देश के कई हिस्सों में बड़े आंदोलन हुए थे.
पश्चिम बंगाल में लागू होने से क्या बदलेगा?
पश्चिम बंगाल की राजनीति में CAA हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है. राज्य की सीमा बांग्लादेश से लगती है और यहां बड़ी संख्या में शरणार्थी तथा सीमा पार से आए लोग रहते हैं. बीजेपी लंबे समय से मांग कर रही थी कि बंगाल में CAA लागू किया जाए. अब राज्य सरकार के ऐलान के बाद सबसे बड़ा असर उन हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई परिवारों पर पड़ेगा, जो बांग्लादेश, पाकिस्तान या अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए थे. ऐसे लोग अब नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे.
दूसरी ओर, सरकार ने साफ कहा है कि जो लोग CAA के दायरे में नहीं आते और अवैध तरीके से सीमा पार कर भारत में रह रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई होगी. राज्य सरकार का कहना है कि केंद्र ने 14 मई 2025 को नोटिफिकेशन भेजकर ऐसे अवैध प्रवासियों को BSF को सौंपने के निर्देश दिए थे.
सीमा सुरक्षा पर भी जोर
CAA लागू करने के साथ-साथ बंगाल सरकार ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर फेंसिंग के लिए BSF को जमीन भी सौंप दी है. करीब 27 किलोमीटर लंबी सीमा पर बाड़ लगाने के लिए शुरुआती 75 एकड़ जमीन दी गई है. इसमें 43 एकड़ खरीदी गई जमीन और 32 एकड़ सरकारी वेस्टेड लैंड शामिल है.
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि पिछली सरकार ने वर्षों तक BSF को जमीन नहीं दी, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित हो रही थी. उन्होंने कहा कि अब सीमा चौकियों और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जमीन उपलब्ध कराई जा रही है. भारत और बांग्लादेश के बीच 4,000 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सीमा है, जिसमें लगभग 2,200 किलोमीटर हिस्सा पश्चिम बंगाल में पड़ता है. इनमें से करीब 1,600 किलोमीटर क्षेत्र में पहले से फेंसिंग की जा चुकी है.
CAA का बंगाल में लागू होना सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है. बीजेपी लंबे समय से मतुआ समुदाय और बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों के बीच CAA को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाती रही है. ऐसे में इस फैसले को आगामी राजनीतिक रणनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है. वहीं विपक्षी दलों और कई मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस कानून के लागू होने से धार्मिक आधार पर भेदभाव की आशंका बढ़ सकती है. बंगाल में इसे लेकर आने वाले दिनों में राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना है.
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