पाकिस्तान के कराची में भी हैं अग्निपूजक पारसी, क्या ईरान हिंसा की आंच उन तक भी पहुंच सकती है?

सदियों पहले ईरान में इस्लामिक चरमपंथ के बीच खुद को बचाए रखने के लिए पारसी समुदाय दुनिया के कई देशों में फैल गया. भारत उनमें से एक था. बंटवारे के समय पारसियों की बड़ी आबादी पाकिस्तान में रह गई. वे कराची बंदरगाह के जरिए कई देशों में अपना व्यापार फैलाए हुए थे. लेकिन अब उनकी आबादी महज कुछ सैकड़ा है.

Advertisement
बंटवारे से पहले कराची और रावलपिंडी में बसे पारसी परिवार पढ़े-लिखे और काफी संपन्न थे. (Photo- Reuters) बंटवारे से पहले कराची और रावलपिंडी में बसे पारसी परिवार पढ़े-लिखे और काफी संपन्न थे. (Photo- Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 13 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:59 PM IST

ईरान में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन जारी है. इस बीच प्रदर्शनकारी देश के मौजूदा इस्लामिक रिपब्लिक वाले झंडे को हटाकर पुराना झंडा लगाते दिखे, जो जोरास्त्रियन धर्म की पहचान है. इसी से पारसी समुदाय भी बना. सदियों पहले इस्लामिक आक्रांताओं की वजह से इनकी बड़ी आबादी ने भारत में शरण ली. इनका कुछ हिस्सा बंटवारे के बाद पाकिस्तान पहुंच गया. यहां भी इस्लामिक कट्टरता है. ऐसे में किस हाल में हैं पाकिस्तानी पारसी?

Advertisement

जोरास्त्रियन धर्म दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में से एक है. इसकी शुरुआत लगभग तीन हजार साल पहले ईरान में हुई थी. इस धर्म की नींव ज़रथुस्त्र ने रखी थी. उन्हीं के नाम पर इसे जोरास्त्रियन कहा जाता है. प्राचीन ईरान इसी धर्म को मानने वाला था. सातवीं सदी में इस्लाम के आने के बाद जोरास्त्रियन पर हिंसा होने लगी. 

शुरुआत में जोरास्त्रियन लोगों को जबरन देश छोड़ने के लिए नहीं कहा गया. लेकिन समय के साथ-साथ उनकी मुश्किलें बढ़ती गईं. उन्हें जजिया टैक्स देना पड़ता था, जो गैर-मुसलमानों से लिया जाता था. कई जगहों पर मंदिरों पर पाबंदियां लगीं. धीरे-धीरे हालात ऐसे बने कि समुदाय को लगा कि या तो धर्म बदलो या कहीं और सुरक्षित जगह खोजो. इसी के साथ पलायन होने लगा. मेजोरिटी जोरास्त्रियन दुनिया के अलग-अलग देशों में जाने लगे. इन्हीं का एक हिस्सा समुद्र के रास्ते गुजरात पहुंचा और वहां से अलग-अलग राज्यों, खासकर मुंबई में फैल गया. 

Advertisement

फारस से आने की वजह से हमारे यहां इन्हें पारसी कहा जाने लगा. बेहद पढ़ा-लिखा ये समुदाय इंफ्रास्ट्रक्चर और बिजनेस में भी योगदान देने लगा. मुंबई के खानपान से लेकर व्यापार में पारसी छाप दिखने लगी. 

पाकिस्तान में चुनिंदा बड़े शहरों में ही पारसी बाकी हैं. (Photo- Reuters) 

ये बंटवारे से पहले की बात है. पारसी व्यापार में काफी तेज थे. वे उन सारे शहरों की तरफ जाने लगे, जहां बंदरगाह थे. इसी कड़ी में गुजरात और मुंबई के अलावा वे कराची भी पहुंचे. वहां तब कराची पोर्ट हुआ करता था, जिससे कई देशों के रास्ते खुलते थे. 
साल 1930 के दशक में जब कराची को पहली बार चुना हुआ मेयर मिला, तो वह भी एक पारसी थे- जमशेद नुसरवानजी. उन्होंने अस्पताल से लेकर थिएटर भी बनवाए. 

बंटवारे के बाद पाकिस्तान में पारसियों की सबसे बड़ी आबादी कराची में ही रही. इसके अलावा लाहौर, रावलपिंडी और पेशावर में भी पारसी परिवार बसे हुए थे. 

तब उनकी आबादी को लेकर अलग-अलग अनुमान मिलते हैं. हालांकि ज्यादातर इतिहासकार मानते हैं कि तब लगभग आठ हजार पारसी पाकिस्तान में थे. ये पढ़े-लिखे थे और संपन्न परिवार थे. कराची में पारसी स्कूल, कॉलोनियां और अग्नि मंदिर तक मौजूद थे.

समय के साथ हालात बदले. पाकिस्तान राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहा था. ऐसे में पहचान पक्की करने के फेर में चरमपंथी सोच हावी होने लगी. बहुसंख्यक आबादी, माइनोरिटी पर हिंसा करने लगी. इनमें हिंदुओं से लेकर पारसी समुदाय तक शामिल था. एक बार फिर पलायन होने लगा. लेकिन साल 1970 के दशक में स्थिति तेजी से बिगड़ी.

Advertisement

पूर्वी पाकिस्तान तब बांग्लादेश बना. इस बीच हिंसा चरम पर थी. काफी सारे पारसी तब भागकर अमेरिका जैसे देशों में शरण ले चुके थे. अब भी काफी सारे बदलाव बाकी थे. सत्तर के दशक के आखिर में वहां सैन्य तख्तापलट हुआ. इसी दौरान ईरान में इस्लामिक रिवॉल्यूशन हुआ. यही वो समय था, जब अफगानिस्तान में भी तख्तापलट जैसी घटनाएं हो रही थीं. इन सब घटनाओं का सीधा असर पाकिस्तान पर पड़ा.

ईरान में सर्वोच्च लीडर अली खामेनेई के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं. (Photo- AP)

अफगानिस्तान से शरणार्थियों की खेप की खेप पाकिस्तान पहुंची और पाकिस्तान के अफगान मुजाहिदीन से रिश्ते मजबूत होने लगे. इससे देश में लोकतंत्र लगातार कमजोर पड़ता गया. इसकी जगह धार्मिक चरमपंथ ले चुका था. कराची में हालात इतने बिगड़े कि बचे-खुचे पारसी परिवार भी जाने लगे. 

डीडब्ल्यू की एक रिपोर्ट में बताया गया कि अब पाकिस्तान में आठ सौ पारसी ही बाकी होंगे. इनमें से भी 60 फीसदी लोग 65 साल या इससे ज्यादा उम्र के हैं. माना जा रहा है कि आने वाले दो-चार सालों में ही ये आबादी भी घटकर आधी रह जाएगी. 

पाकिस्तान में माइनोरिटी पर हिंसा तो पारसियों के कम होने की वजह है ही, लेकिन साथ ही पारसी रीति-रिवाज भी कारण हैं. पारसी अपने समुदाय से बाहर शादी नहीं कर पाते. खासकर महिला अगर दूसरे धर्म में जाए तो उसका सामाजिक बहिष्कार हो जाता है. यही स्थिति पुरुषों की है. बहिष्कार भले न हो, लेकिन अपने ही धर्म में शादी का दबाव उनपर खूब रहता है. विकल्प की कमी के चलते बड़ा हिस्सा अविवाहित रह जाता है.

Advertisement

बड़ी उम्र में शादी की वजह से उनमें फर्टिलिटी रेट भी बेहद कम लगभग 0.8 प्रतिशत है, मतलब 10 महिलाओं को मिलाकर औसतन सिर्फ 8 बच्चों का जन्म हो रहा है. किसी भी समुदाय के लिए ये खतरनाक स्थिति है, जहां मृत्युदर, जन्मदर से ऊपर हो जाए. 

जहां तक सवाल है कि ईरान में होने वाली हिंसा का उन पर असर पड़ेगा या नहीं, तो सीधा असर पड़ने की संभावना बहुत कम है. कराची के पारसी पाकिस्तान के नागरिक हैं. उनका ईरानी राजनीति या वहां की हलचल से कोई सीधा संबंध नहीं. लेकिन अप्रत्यक्ष मुश्किलों से इनकार नहीं किया जा सकता. ऐसा पहले भी देखा जा चुका है. अफगानिस्तान तक में सत्ता का बदलाव पाकिस्तान की माइनोरिटी को और कमजोर बना देता है. फिलहाल ईरान में बगावत की जो आग लगी हुई है, इसमें संभव है कि कराची में बसे पारसियों तक आंच पहुंचे.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement