डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे दौर में अमेरिका दो कामों पर फोकस किए हुए है. एक तो अपनी सीमाएं बढ़ाने की कोशिश. और दूसरा- कई बड़े इंटरनेशनल संगठनों से किनारा करना. अब यूएस विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से भी अलग हो गया. ये वहीं संगठन है, जो महामारियों से लेकर टीके और कई क्रॉनिक बीमारियों पर लंबे समय से दुनिया के बड़े-छोटे तमाम देशों में काम करता रहा. अमेरिका का इन संगठनों से हटना कितना बड़ा धक्का साबित हो सकता है?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के जेनेवा हेडक्वार्टर से अमेरिका अपना झंडा तक हटा चुका. इससे पहले दशकों तक वो संगठन के फैसलों में हिस्सा लेता था, उसकी बैठकों में वोट करता था और नीतियां बनाने में भूमिका रहती थी.
अमेरिका WHO का सबसे बड़ा फंड देने वाला देश भी था. टीकाकरण, बीमारी रोकथाम, रिसर्च और आपात स्वास्थ्य मदद जैसे कामों में अमेरिका का पैसा और तकनीकी मदद अहम मानी जाती थी. साल 2024-25 में अमेरिका ने उसे लगभग 958 अरब अमेरिकी डॉलर देना तय किया था, जो कि WHO के कुल खर्च का करीब 14 से 15 फीसदी था. संगठन को जितना पैसा दुनिया के किसी भी एक देश से मिलता था, उसमें सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका का ही होता था. अब ये बंद हो चुका है.
इसका असर बेहद व्यापक और लॉन्ग टर्म हो सकता है. सबसे ज्यादा असर महामारी निगरानी और अलर्ट सिस्टम पर पड़ सकता है. फ्लू, कोरोना जैसे नए वायरस की पहचान और समय पर चेतावनी देने वाले नेटवर्क में फंड की कमी आ सकती है. इससे गरीब देशों को ज्यादा नुकसान होगा. इसके अलावा आपात स्वास्थ्य मदद जैसे भूकंप, युद्ध या महामारी के समय मेडिकल सप्लाई और टीम भेजने की क्षमता भी कमजोर पड़ सकती है.
पिछले साल के आखिर में भी ट्रंप प्रशासन ने खुद को करीब 60 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अलग कर लिया. इनमें संयुक्त राष्ट्र से जुड़े 30 से ज्यादा संगठन शामिल थे. ये वही संगठन थे जो दुनिया भर में गरीबी, स्वास्थ्य, मानवाधिकार, पीस मिशन और महिलाओं-बच्चों पर काम कर रहे थे. इसमें यूनेस्को से लेकर यूएन वीमन और यूएनडीपी भी शामिल हैं.
यूएस दशकों तक संयुक्त राष्ट्र और उससे जुड़ी संस्थाओं का समर्थक रहा, लेकिन ट्रंप के दौर में तस्वीर बदल गई. इसकी सबसे बड़ी वजह नीति में बदलाव है.
पहली वजह है अमेरिका फर्स्ट की सोच. ट्रंप मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अमेरिका से ज्यादा पैसा लेती हैं, लेकिन बदले में उसे सीधा फायदा नहीं देतीं. उनका तर्क है कि अमेरिकी टैक्सपेयर्स का पैसा ऐसी जगहों पर खर्च हो रहा है, जहां फैसले अमेरिका के खिलाफ भी जाते हैं.
दूसरी वजह है संप्रभुता का सवाल. ट्रंप प्रशासन को लगता है कि WHO, मानवाधिकार परिषद या जलवायु से जुड़ी संस्थाएं अमेरिका की नीतियों में दखल देती हैं. यानी ये संस्थाएं यह तय करने लगती हैं कि अमेरिका क्या करे और क्या न करे, जो ट्रंप को मंजूर नहीं.
तीसरी वजह है राजनीतिक पक्षपात का आरोप. ट्रंप प्रशासन का कहना रहा कि कई संस्थाएं चीन, रूस या विकासशील देशों के दबाव में काम करती हैं और अमेरिका या उसके सहयोगियों के खिलाफ रुख अपनाती हैं.
क्या असर होगा अमेरिका के बाहर निकलने से
अमेरिका संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं में सिर्फ इसलिए ताकतवर नहीं था क्योंकि वो ज्यादा पैसा देता था. असली वजह यह थी कि अमेरिका अपने साथ टेक्नोलॉजी और राजनीतिक असर भी लाता था. WHO हो या यूनिसेफ, अमेरिकी वैज्ञानिक, डॉक्टर, डेटा सिस्टम और रिसर्च इन संस्थाओं की रीढ़ माने जाते थे. यूएस के पास फैसले को आगे बढ़ाने की क्षमता थी, यानी बात सिर्फ सलाह तक नहीं रुकती थी, उसे जमीन पर लागू करने की ताकत भी रही.
अमेरिका के हटते ही यह खाली जगह किसी न किसी को भरनी ही है. यहां सबसे पहले चीन आगे आता है. चीन पहले से ही यूएन एजेंसियों में अपना असर बढ़ा रहा है. वह पैसे देता है और विकासशील देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर और हेल्थ प्रोजेक्ट के जरिए समर्थन जुटाने लगा है. इससे ग्लोबल एजेंडा धीरे-धीरे चीन के नजरिए के मुताबिक शेप ले सकता है.
खाड़ी देश भी इस खाली जगह को मौके की तरह देख रहे हैं. वे खास प्रोजेक्ट्स के लिए पैसा देंगे, लेकिन अपनी शर्तों के साथ. इसका मतलब है कि कुछ संवेदनशील मुद्दों पर चुप्पी या नरमी बढ़ सकती है.
वहीं यूरोपीय यूनियन नियमों और प्रक्रियाओं पर जोर देगी, लेकिन उसके पास अमेरिका जैसी तेज राजनीतिक ताकत नहीं है. फैसले ज्यादा कागजी और धीमे हो सकते हैं.
अमेरिका के बाहर निकलने का मतलब संयुक्त राष्ट्र का बंद हो जाना नहीं है. यूएन कोई कंपनी नहीं जो एक बड़े इनवेस्टर के हटते ही ताला लग जाए. यह 190 से ज्यादा देशों का साझा प्लेटफॉर्म है.
उसके जाते ही यूरोप सामने आ सकता है. यूरोपीय यूनियन के देश पहले से ही मिलकर बड़ी फंडिंग करते हैं. अब वे अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश करेंगे, ताकि WHO, यूनिसेफ और दूसरे प्रोग्राम पूरी तरह ठप न हों. जर्मनी, फ्रांस और नॉर्डिक देश खास तौर पर स्वास्थ्य और मानवीय मदद में ज्यादा पैसे लगा सकते हैं.
जापान और कनाडा जैसे देश भी अपनी भूमिका बढ़ाएंगे. ये देश खुद को जिम्मेदार ग्लोबल पावर के तौर पर पेश करना चाहते हैं और ऐसे समय में आगे आना उनकी छवि के लिए भी जरूरी है.
कई खाड़ी और अमीर एशियाई देश भी चुनिंदा क्षेत्रों में फंडिंग कर सकते हैं, खासकर राहत, स्वास्थ्य और पुनर्निर्माण से जुड़े कामों में. हालांकि उनकी फंडिंग अक्सर शर्तों के साथ आएगी. कुल मिलाकर, हो सकता है कि प्रोग्राम्स की रफ्तार धीमी हो जाए लेकिन ये पूरी तरह बंद होगा, ऐसा नहीं लगता.
ट्रंप का कार्यकाल खत्म होने के बाद यूएस दोबारा इनमें वापसी कर सकता है. यह पहले भी हो चुका. दरअसल, अमेरिका में विदेश नीति हमेशा एक जैसी नहीं रहती. जैसे ही सत्ता बदलती है, प्राथमिकताएं भी बदल जाती हैं. ट्रंप से पहले और ट्रंप के बाद का फर्क इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. ट्रंप ने WHO से बाहर निकलने की प्रक्रिया शुरू की थी, जिसे बाद में जो बाइडेन ने पलट दिया और अमेरिका की वापसी कराई.
संयुक्त राष्ट्र और उसकी संस्थाओं से जुड़ना कानूनी तौर पर आसान है. इसके लिए किसी युद्ध या संधि की जरूरत नहीं होती. नया राष्ट्रपति सिर्फ एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी कर दे और फंडिंग फिर से शुरू हो सकती है. हां, ये जरूर हो सकता है कि अमेरिका इनमें वापसी करे तो अपनी कुछ कंडीशन्स रख सकता है, जैसे फंडिंग में कटौती, या प्रोग्राम्स में कुछ ऐसा जो उसके नागरिकों को भी फायदा दे.
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