9 घंटे में 3 बार बदली थी पार्टी... 'आया राम, गया राम' की वो कहानी, जिसके बाद बना था दल-बदल रोकथाम कानून

महाराष्ट्र में चल रही राजनीतिक घटनाक्रम के बाद एक बार फिर दल-बदल विरोधी कानून की चर्चा तेज हो गई है. दरअसल शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने एनसीपी से 8 विधायकों को तोड़कर शिंदे-बीजेपी सरकार को अपना समर्थन दे दिया है. वहीं शिंदे सरकार में अजित को डिप्टी सीएम भी बना दिया गया है. अब कहा जा रहा है कि शरद पवार बागी विधायकों के खिलाफ दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग कर सकते हैं.

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अजित पवार ने बगावत के बाद एनसीपी के सिंबल और नाम पर किया दावा ( सांकेतिक फोटो) अजित पवार ने बगावत के बाद एनसीपी के सिंबल और नाम पर किया दावा ( सांकेतिक फोटो)

aajtak.in

  • मुंबई,
  • 05 जुलाई 2023,
  • अपडेटेड 2:28 PM IST

Ajit Pawar vs Sharad Pawar: महाराष्ट्र की जमीन पिछले एक साल से राजनीति की नई प्रयोगशाला बनी हुई है. पहले एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे से बगावत कर बीजेपी के समर्थन से सरकार बना ली थी. तब शिंदे ने दावा किया था कि उनके पास शिवसेना के 40 विधायक हैं. उद्धव ने 16 बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने के लिए याचिका दाखिल कर दी.

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ठीक ऐसी ही स्थिति महाराष्ट्र में फिर से बन गई है. अब अजित पवार ने शरद पवार से बगावत कर ली है. दावा है कि उनके पास एनसीपी के करीब 40 यानी दो तिहाई से ज्यादा विधायकों का समर्थन है. वहीं शरद पवार भी अब अपने बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने की अपील कर सकते हैं. इनकी अयोग्यता दल-बदल विरोधी कानून के तहत तय होगी.

तो आइए जानते हैं कि इस कानून की जरूरत क्यों पड़ी, इसे कब लागू किया गया और क्या है आया राम, गया राम का प्रकरण, जिसकी वजह से भविष्य में इस कानून को बनाना पड़ा?

क्या है दल-बदल विरोधी कानून

राजनितिक दल बदल पर रोक लगाने के लिए इस कानून को लाया गया था. इसके लिए 1985 में राजीव गांधी की सरकार में संविधान में 52वां संशोधन किया गया था. इस कानून के तहत उन सांसदों या विधायकों को आयोग्य घोषित किया जा सकता है, जो किसी राजनीति दल से चुनाव चिह्न से चुनाव जीतने के बाद खुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देते हैं, पार्टी लाइन के खिलाफ चले जाते हैं, पार्टी ह्विप के बावजूद वोट नहीं करते हैं, पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करते हैं.

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हालांकि इस कानून में एक अपवाद भी है. इसके तहत अगर किसी दल के एक तिहाई सदस्य अलग दल बनाना या किसी दूसरी पार्टी में विलय चाहते हैं तो उन पर अयोग्यता लागू नहीं होगा. दल बदल विरोधी कानून के प्रावधानों को संविधान की 10वीं अनुसूची में रखा गया है, लेकिन कानून बनने के बाद पहले जो दल-बदल एकल होता था, वह सामूहिक तौर पर होने लगा. इस कारण संसद को 2003 में 91वां संविधान संशोधन करना पड़ा. इसके तहत 10वीं अनुसूची की धारा 3 को खत्म कर दिया गया, जिसमें एक साथ एक-तिहाई सदस्य दल बदल कर सकते थे.

'गया राम' की ऐसे शुरू हुई चर्चा

राजनीति में गया राम का किस्सा हरियाणा से जुड़ा हुआ है. यह 1967 का समय है, जब 81 सीटों वाले हरियाणा राज्य में विधानसभा चुनाव हुए थे. इस चुनाव में कांग्रेस ने बाजी मार ली थी. कांग्रेस के 48, जनसंघ के 12, स्वतंत्र पार्टी के 3, रिपब्लिकन आर्मी ऑफ इंडिया के 2 उम्मीदवारों और 16 निर्दलियों ने जीत हासिल की.

कांग्रेस की सरकार बनी. भगवती दयाल शर्मा को सीएम बनाया गया लेकिन यह सरकार बहुत दिन न चल सकी. दक्षिणी हरियाणा के असंतुष्ट नेता राव बीरेंदर सिंह ने कांग्रेस के 37 विधायकों को साथ लेकर बगावत कर दी. बाद में उन्होंने स्वतंत्र पार्टी, जनसंघ का समर्थन और 16 निर्दलीय विधायकों के समर्थन ने अपनी सरकार बना ली.

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बीरेंदर सिंह की सरकार करीब आठ महीने चली. इसके बाद भारत की राजनीति में ऐसी घटना देखने को मिली, जो हमेशा के लिए चर्चा का विषय बन गई. इस सरकार से भी विधायक छिटकने लगे. 44 विधायकों ने पार्टी बदल ली. इनमें एक सदस्य ने पांच बार, दो सदस्यों ने चार बार, तीन विधायकों ने तीन बार, चार विधायकों ने दो बार और 34 विधायकों ने 1 बार अपना खेमा बदला.

इन्हीं विधायकों में एक थे गया लाल. वह पलवल की हसनपुर सीट से  निर्दलीय विधायक थे. गया लाल ने करीब 360 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी. इन्होंने 9 घंटे में तीन बार पार्टी बदल ली. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक वह पहले कांग्रेस में गए, कुछ घंटे बाद यूनाइटेड फ्रंट में शामिल हो गए थे. इसके बाद वह फिर कांग्रेस में लौट और बाद में यूनाइटेड फ्रंट में आ गए थे. तब राव बीरेंद्र सिंह ने चंडीगढ़ में मीडिया को संबोधित करते हुए कहा था- 'गया राम अब आया राम हैं. संभवत: इसी घटनाक्रम के बाद से दल-बदलुओं के लिए 'आया राम, गया राम' मुहावरे का इस्तेमाल होने लगा.

हालांकि दल बदलने का यह कोई एक मात्र घटना नहीं थी. इसके बाद तो 80 के दशक तक ऐसी घटनाओं में बहुत तेजी देखी को मिली. इस बीच इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई. 1984 के लोकसभा चुनाव के लिए राजीव गांधी को कांग्रेस का फेस बनाया गया. तब राजीव ने लोगों से दल-बदल कानून लाने का वादा किया. कांग्रेस सत्ता में लौटी. राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया. सत्ता संभालने के 8 हफ्ते के भीतर ही उन्होंने 1985 में दल बदल विरोधी कानून लागू कर दिया.

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अजित पवार 5वीं बार बने डिप्टी CM बने

एनसीपी के नेता अजित पवार ने 2 जुलाई को सभी को चौंकाते हुए अपनी पार्टी से बगावत करते हुए एकनाथ शिंदे को अपना समर्थन दे दिया था. उसी दिन उन्होंने डिप्टी सीएम पद की शपथ भी ले थी. उनके साथ एनसीपी के 8 विधायकों छगन भुजबल, धनंजय मुंडे, अनिल पाटिल, दिलीप वलसे पाटिल, धर्मराव अत्राम, संजय बनसोड़े, अदिति तटकरे और हसन मुश्रीफ को भी शिंदे मंत्रिमंडल में जगह दे दी गई थी.

अब असली NCP को लेकर शुरू हुई जंग

अजित गुट के लिए अब एनसीपी के चुनाव चिह्न पर अपना दावा ठोक दिया है. उनका कहना है कि एनसीपी के 40 विधायक उनके साथ हैं. वैसे अजित द्वारा एनसीपी पर कब्जा कर पाना इतना आसान नहीं होगा. नियम के मुताबिक दोनों गुटों को खुद को असली एनसीपी साबित करने के लिए पार्टी के पदाधिकारियों, विधायकों और सांसदों का बहुमत हासिल होना जरूरी है. केवल बड़ी संख्या में विधायकों का सपोर्ट हासिल होने भर से पार्टी पर किसी का अधिकार साबित नहीं हो जाता. चुनाव आयोग सांसदों और पदाधिकारियों के समर्थन को भी ध्यान में रखते हुए यह फैसला लेगा.

नियम के मुताबिक अजित खेमे को तुरंत एक अलग पार्टी की मान्यता नहीं मिल सकती. हालांकि, दल-बदल विरोधी कानून बागी विधायकों को तब तक सुरक्षा प्रदान करता है, जब तक वे किसी अन्य पार्टी में विलय नहीं कर लेते हैं या नई पार्टी नहीं बना लेते हैं. इसके बाद जब वे चुनाव चिह्न के लिए आयोग से संपर्क करते हैं, तो आयोग चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के आधार पर फैसला लेता है. लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य के मुताबिक चुनाव चिह्न के आवंटन पर निर्णय लेने से पहले चुनाव आयोग दोनों पक्षों को विस्तार से सुनेगा, पेश किए गए सबूतों को देखने के बाद यह तय करेगा कि कौन सा गुट असली पार्टी है.

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एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त बताते हैं कि जब चुनाव आयोग के सामने ऐसा कोई मामला आता है, तो उसे दूसरे पक्ष को नोटिस जारी करना होता है. इसके बाद दोनों पक्षों से यह दिखाने के लिए सबूत जमा कराना होता है कि वे पार्टी के असली दावेदार हैं, जिसके बाद ही आयोग कोई फैसला लेता है. हालांकि यह प्रक्रिया इतनी भी आसान और छोटी नहीं है. हर गुट के दावों की जांच के दौरान आयोग को न केवल उसके विधायकों, एमएलसी या सांसदों बल्कि उनका समर्थन देने वाले संगठन के पदाधिकारियों और प्रतिनिधियों को ध्यान में रखना होता है.

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