अमेजन MX प्लेयर पर साकिब सलीम की नई बेव सीरीज कप्तान आई है. 8 एपिसोड की इस क्राइम ड्रामा के ट्रेलर को देखकर दावा हुआ था कि ये मिर्जापुर को टक्कर देगी. यकीनन ही क्राइम थ्रिलर शो कप्तान से लोगों की उम्मीदें बढ़ना लाजमी था. लेकिन क्या सच में ऐसा है? क्या कप्तान में मिर्जापुर से टक्कर लेने जितना वजन है भी? पढ़ते हैं इस रिव्यू में.
कप्तान, कहानी है जवालाबाद की. जहां नकली शराब बनाने का कारोबार ही नेताओं, गुंड़ों से लेकर व्यापारियों के मालामाल होने का जरिया है. तो भला ये मौका कोई हाथ से क्यों ही जाने देगा. जवालाबाद में शाहीन और मुन्ना में आर-पार की लड़ाई है. दोनों शहर पर अपना दबदबा कायम करना चाहते हैं. लेकिन इसके लिए जरूरी है शराब का टेंडर मिलना. 180 करोड़ का टेंडर पाने के लिए दोनो गुटों के बीच जालसाजी, फरेब और मारकाट मचा हुआ है. मुन्ना ने तिकड़म लगाकर टेंडर तो अपने नाम कर लिया, लेकिन शाहीन और उसका गुर्गा कबीर उसे बख्शने के मूड में नहीं है. मुन्ना और शाहीन की लड़ाई में शहर में मचे आतंक को कंट्रोल करने जवालाबाद में SSP समरदीप सिंह, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट, आता है. कहानी में कई ट्विस्ट एंड टर्न्स आते हैं. कबीर और समर का पास्ट कनेक्शन सामने आता है, इससे कहानी को इमोशनल एंगल मिलता है. अतीत के पन्ने खुलते हैं और कहानी शॉकिंग क्लाइमैक्स की ओर बढ़ती है. राजनीति, भ्रष्टाचार और इंसाफ की जंग को दिखाती ये कहानी क्लाइमैक्स में बड़े सवाल छोड़कर जाती है.
साकिब का काम कमाल
पुलिस ऑफिसर समर के रोल में साकिब सलीम जमे हैं. एक सख्त पुलिसवाला बनकर उन्होंने शाइन किया है. साकिब ने फिर से साबित किया है कि अगर मौका मिले तो वो भी स्क्रीन पर गर्दा उड़ा सकते हैं. एक रुथलेस और बेखौफ पुलिस वाले का रोल उनपर जमा है. टीवी की हसीना पूजा गौर ने साकिब की पत्नी का रोल प्ले किया है. उनकी छोटी और अहम भूमिका है. अंजुम शर्मा ने मुन्ना का रोल ठीक ठाक निभाया. लेकिन वो साकिब के आगे थोड़ा फीके लगे. दर्शकों के दिलों दिमाग में अपना तगड़ा इंप्रेशन छोड़ने में नाकामयाब रहे. उनकी एक्टिंग में तो दम था, पर विलेन का किरदार पावरफुल नहीं गढ़ा गया, जिसकी वजह से वो हीरो से कमतर लगे. सिद्धार्थ निगम कबीर के रोल में जचे हैं. वहीं कविता कौशिक को सालों बाद लेडी पुलिस के रोल में देखना हीलिंग फैक्टर है. बाकी कलाकारों ने ठीक ठाक अपने रोल को निभाया है.
कप्तान की सबसे बड़ी कमी इसका स्क्रीनप्ले है. शुरुआती 3-4 एपिसोड फीके हैं. वो आपकी बोरियत इतनी बढ़ा देते हैं आप सीरीज बीच में छोड़ने का फैसला लेने की सोचेंगे. ऐसे कोई मजेदार ट्विस्ट नहीं हैं जो आपको सीरीज से बांधे रखें. एपिसोड काफी लंबे हैं. कहानी में नयापन नहीं है. माफिया गैंग्स और पुलिस के बीच की जंग इससे पहले भी कई फिल्मों में दिखाई गई है. 8 घंटे के लंबे एपिसोड देखकर आपको जरा भी फील गुड महसूस नहीं होगा. हां, ये शो आपको थका जरूर सकता है. इसका सेकंड पार्ट भी आएगा. उम्मीद है मेकर्स कप्तान 2 को रोमांच, थ्रिल और नेरेशन के साथ बनाए, क्योंकि फैंस को साकिब से काफी उम्मीदें हैं.
यहां देखें ट्रेलर...
मिर्जापुर के आसपास नहीं भटकती कप्तान
सीरीज में गांव-देहात का टच लाने की डायरेक्टर ने पूरी कोशिश की है. लेकिन मिर्जापुर और पंचायत जैसी इसमें बात नहीं है. कप्तान के मिर्जापुर शो को टक्कर देने की बात सोचना भी पंकज त्रिपाठी की सीरीज का अपमान करने जैसा है, क्योंकि दोनों ही शोज में कोई मुकाबला नहीं है. मिर्जापुर तो क्राइम ड्रामा शोज का बाप है, लेकिन हर दूसरी सीरीज मिर्जापुर तो नहीं हो सकती. मिर्जापुर जैसी इसमें ना इंटेंसिटी है, ना थ्रिल और ना ही स्टोरीटेलिंग. साकिब की ये सीरीज एवरेज है. एक बार देखी जा सकती है. नहीं भी देखेंगे तो मलाल ना करें, क्योंकि कुछ भी बड़ा मिस नहीं करने जा रहे हैं.
ये शो अमेजन एमएक्स प्लेयर पर फ्री में देखा सकता है, इसलिए चाहें तो इसके क्राइम वर्ल्ड को फोकट में एक मौका दे सकते हैं.
हंसा कोरंगा