करीब 30 साल पहले आई ‘बॉर्डर’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी. कम से कम एक पूरी जेनरेशन के लिए ‘बॉर्डर’ देशभक्ति का इमोशन रही है. ‘बॉर्डर 2’ अनाउंस होते ही उस इमोशन के दोबारा लौटने की एक्साइटमेंट तो पब्लिक में दिखी ही. मगर एक शक भी उठा― बॉलीवुड में सीक्वल बनाने की होड़ के बीच कहीं वो ‘बॉर्डर’ के इमोशन के साथ घालमेल न हो जाए! ‘बॉर्डर 2’ के इंटरवल पॉइंट से सबसे बड़ी गुड न्यूज यही है कि सनी देओल की फिल्म में वो इमोशन और फील बरकरार है.
‘बॉर्डर 2’ का दिल है फर्स्ट हाफ
‘बॉर्डर 2’ वहां से शुरू होती है जब जंग का ऐलान नहीं हुआ है. और इंटरवल होता है पाकिस्तान के ऑपरेशन चंगेज खान की शुरुआत पर, जो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की ऑफिशियल शुरुआत है.
इन दोनों पॉइंट्स के बीच ‘बॉर्डर 2’ अपने हीरोज को इंट्रोड्यूस करती है. होशियार सिंह दहिया (वरुण धवन), निर्मलजीत सिंह सेखों (दिलजीत दोसांझ) और एम एस रावत (अहान शेट्टी) को आप कैडेट्स ट्रेनिंग एकेडमी में साथ देखते हैं. और ट्रेनिंग ऑफिसर हैं- फतेह सिंह कलेर यानी सनी देओल.
ट्रेनिंग में बेस्ट टॉप करने का कॉम्पिटिशन, दोस्तियों और शैतानियों से होते हुए कहानी तीनों की पर्सनल लाइफ दिखाती है. इस पोर्शन में दो शादियां हैं, दो खूबसूरत गाने हैं, मजेदार कॉमेडी है और ढेर सारा इमोशन है. ये इमोशन ही वो दौलत हैं जिसे दांव पर लगाकर एक फौजी देश के लिए सरहद पर खड़ा होता है.
‘बॉर्डर 2’ के इमोशनल मोमेंट बहुत असरदार हैं. इनका असर आपको गले और आंखों तक महसूस हो सकता है. ‘बॉर्डर 2’ की स्टोरीटेलिंग है तो बेसिक. कुछ लोगों को ये थोड़ा खटक भी सकती है. मगर इसकी भरपाई कहानी के इमोशनल मोमेंट्स से पूरी हुई है. अगर ये इमोशंस ‘बॉर्डर 2’ की आत्मा हैं, तो इसका तगड़ा-मजबूत शरीर हैं सनी देओल.
फिल्म में जोश भरने का भारी काम सनी के मजबूत कंधों पर है और वो तीस साल बाद भी ये काम पूरी मजबूती से कर रहे हैं. वरुण, दिलजीत और अहान अपने किरदारों में जम रहे हैं. इंटरवल से पहले इमोशंस को ऊंचाई पर ले जाकर, वॉर की अनाउंसमेंट कर दी गई है. सेकंड हाफ शुरू होने वाला है. अब देखना है कि इस ऊंचाई को अंत तक बरकरार रखने में ‘बॉर्डर 2’ कितनी कामयाब होती है.
लंबे सेकंड हाफ में है युद्ध का एक्शन
‘बॉर्डर 2’ का सेकंड हाफ भी एक इमोशनल डोज के साथ शुरू होता है. कहानी के तीनों यंग किरदारों की पर्सनल लाइफ फर्स्ट हाफ में थी. सेकंड हाफ में आपको पता चलता है कि फतेह की पर्सनल लाइफ का कौन सा हिस्सा युद्ध में दांव पर है.
डायरेक्टर अनुराग सिंह ने ‘बॉर्डर 2’ के लिए एक बहुत स्मार्ट ऑप्शन चुना है. ये फिल्म ग्रैंड स्केल का वादा नहीं करती बल्कि इमोशंस के हाथ में स्टोरी का स्टीयरिंग थमा देती है. अनुराग की अगली स्मार्ट चॉइस ये रही कि उन्होंने 1971 के युद्ध से 4 लड़ाइयां अपने हीरोज के लिए चुन लीं.
VFX और ग्राफिक्स ‘बॉर्डर 2’ का मजबूत पक्ष नहीं है, ये अंदाजा ट्रेलर से ही लग रहा था. लेकिन ये उतना बुरा नहीं है, जितनी ट्रोलिंग हो रही थी. ये कमी कहीं भी नैरेटिव पर हावी नहीं होती. हवा और समंदर की जंग में VFX है ही, इसलिए कमियां भी वहीं दिखती हैं. मगर इन कमियों को स्मार्ट स्टोरीटेलिंग से कवर कर दिया गया है. और इसे ‘बॉर्डर 2’ के एक्टर्स अपने काम से पूरी तरह ढंक देते हैं.
युद्ध के सीन्स में वरुण और सनी को बेस्ट एक्शन मिला है. टाइट फ्रेम में वो बाजुओं की जान आजमाते लड़ाइयां लड़ रहे हैं. ‘बॉर्डर 2’ ने ये काम अच्छा किया है कि हथियारों का दम दिखाने की बजाय, सिचुएशन की गंभीरता पर फोकस किया है. और ऐसे में इकोनॉमिकल एक्शन सेट्स से काम बढ़िया मैनेज हो जाता है. हालांकि, पाकिस्तानी सैनिकों और अफसरों को खिसियाते, ओवररिएक्ट करते हुए अतरंगी दिखाने का लालच ‘बॉर्डर 2’ भी नहीं छोड़ पाई.
‘बॉर्डर 2’ के सेकंड हाफ में कुछ-कुछ जगह पेस थोड़ी स्लो लगती है. ऑरिजिनल ‘बॉर्डर’ में सुनील शेट्टी, अक्षय खन्ना वगैरह ने जो किरदार निभाए थे उन्हें अच्छा कॉलबैक मिला है. एंड में ‘मिट्टी के बेटे’ गाना आपकी आंखों में आंसू ला सकता है.
कुल मिलाकर एक मामले में ये फिल्म ‘बॉर्डर’ का सीक्वल होना डिजर्व करती है― कहानी युद्ध की नहीं, युद्ध लड़ने वालों की है. युद्ध एक फौजी की जिंदगी में क्या बदल देता है ‘बॉर्डर 2’ इसकी कहानी है. और इस मकसद को बरतने में फिल्म ने कहीं चूक नहीं की है.
सुबोध मिश्रा