यह एक सीधा सा सवाल है. इतना सीधा कि थोड़ा असहज कर दे- अगर आपको कोई चीज पसंद है, तो सिर्फ पसंद करके क्यों रुक जाते हैं? उसके लिए आगे क्यों नहीं आते? उसके लिए टिकट क्यों नहीं खरीदते? आपका समर्थन सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट तक ही क्यों सीमित रह जाता है, थिएटर तक क्यों नहीं पहुंचता?
यह सवाल पसंद का नहीं, इरादे का है. और यह सीधे हिंदी सिनेमा पर लागू होता है, खासकर उन फिल्मों पर जो महिलाओं के इर्द-गिर्द बनाई जा रही हैं.
हम कहते हैं कि हमें पर्दे पर मजबूत महिलाएं चाहिए. ऐसी महिलाएं जो खुलकर बोलें, सिस्टम से सवाल करें, सिर्फ किसी की प्रेमिका बनकर न रह जाएं. हम अच्छी और गहरी लिखाई की तारीफ करते हैं. कहते हैं कि सिनेमा बदल रहा है. ट्रेलर शेयर करते हैं, लंबी-लंबी पोस्ट लिखते हैं.
लेकिन जब शुक्रवार को फिल्म रिलीज होती है, तब हम क्या करते हैं?
‘हक’ जैसी फिल्म को याद कीजिए. एक ऐसी कहानी, जिसमें एक महिला धार्मिक ढांचे से अपने हक के लिए लड़ती है, जिसने उसे पत्नी, मां और इंसान के तौर पर सम्मान नहीं दिया. फिल्म पर बहस हुई, ओटीटी पर आने के बाद उसकी ज्यादा तारीफ हुई. अभिनय पर चर्चा हुई, लेख लिखे गए. लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फिल्म को खास रिस्पॉन्स नहीं मिला. थिएटर में समर्थन कम क्यों रहा, और सराहना बाद में क्यों आई?
‘मर्दानी 3’ को देखिए. हम इसे हिंदी सिनेमा की गिनी-चुनी महिला प्रधान फ्रेंचाइजी में से एक मानते हैं. इसकी सख्ती और सच्चाई की तारीफ करते हैं. लेकिन यह तारीफ टिकट खिड़की तक क्यों नहीं पहुंचती? क्या सिर्फ सराहना से सिनेमा चल सकता है?
अब ‘अस्सी’ आ रही है. तापसी पन्नू ने साफ कहा है कि दर्शक यह बहाना न बनाएं कि हिंदी सिनेमा असली कहानियां नहीं दिखाता. जब ऐसी कहानियां आती हैं, तब हम पीछे क्यों हट जाते हैं? यह फिल्म महिलाओं के खिलाफ अपराधों की सच्चाई दिखाती है. यह हमें उस हिंसा का सामना करने पर मजबूर करती है, जिसे हम अक्सर सामान्य मान लेते हैं. यह असहज करती है.
तो आखिर झिझक किस बात की है?
क्या हमें दिक्कत होती है जब महिलाएं बिना माफी मांगे कहानी के केंद्र में खड़ी होती हैं? क्या हमें पुरुष हीरो को बदला लेते देखना ज्यादा आसान लगता है, बजाय इसके कि एक महिला सवाल उठाए? क्या हम तभी सहज होते हैं जब सशक्तिकरण टकराव वाला न हो?
बड़े बजट की एंटरटेनर फिल्मों जैसे ‘बॉर्डर 2’ या ‘धुरंधर’ देखने में कोई बुराई नहीं है. जब दर्शक ऐसी फिल्मों के लिए टिकट खरीदते हैं, तो वे ईमानदारी से अपना समर्थन दिखाते हैं.
लेकिन यही ईमानदारी महिला प्रधान फिल्मों के लिए क्यों नहीं दिखती? समर्थन चुनिंदा क्यों हो जाता है?
ये फिल्में कोई भाषण नहीं हैं, न ही नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली किताबें. ये सिर्फ ऐसी कहानियां हैं जिनमें महिलाएं पूरी तरह इंसान की तरह मौजूद हैं- सोचने वाली, फैसले लेने वाली, टकराने वाली. अगर यह असहज लगता है, तो शायद हमें खुद से पूछना चाहिए क्यों.
अगर हम सच में बेहतर प्रतिनिधित्व, बराबरी और गहरे महिला किरदार चाहते हैं, तो असली परीक्षा हमारी तारीफ में नहीं, हमारी मौजूदगी में है.
सिनेमा सिर्फ सराहना से नहीं चलता. वह टिकट से चलता है. और चाहे हम कितनी भी बार ‘क्वालिटी बनाम नंबर’ की बहस करें, सच यह है कि नंबर ही स्वीकार्यता और समर्थन दिखाते हैं. अगर हम थिएटर में फिल्म को ठुकराकर ओटीटी पर उसके सही ठहरने का इंतजार करते रहेंगे, तो समस्या फिल्मकार या सिनेमा में नहीं है. समस्या हम में है.
अगर आप अब भी पूछ रहे हैं कि क्या हिंदी सिनेमा महिला प्रधान कहानियां बना रहा है, तो रुकिए. असली सवाल यह है- जब सही समय आएगा, क्या हम उनके साथ खड़े होंगे?
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