बॉलीवुड की सबसे विवादित फिल्मों में से एक 'द केरला स्टोरी' का सीक्वल, 'द केरला स्टोरी 2' थिएटर्स के लिए तैयार है. हाल ही में इसका ट्रेलर आया है जिस पर जनता ने चर्चा और बहस दोनों शुरू कर दी है. बिल्कुल पहली फिल्म की ही तरह 'द केरला स्टोरी 2' की कहानी भी एक खास पॉलिटिकल नैरेटिव को आगे बढ़ाती नजर आ रही है.
ट्रेलर पर अपनी राय देने वाली जनता को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है— एक हिस्से को ये प्रोपेगेंडा लग रही है, दूसरे को रियलिटी. और ये दोनों हिस्से सोशल मीडिया पर आमने-सामने हैं. मगर एजेंडाबाजी की बहस से दूर 'द केरला स्टोरी 2' के ट्रेलर में एक बहुत बड़ी कमी है जो फिल्म को नुकसान पहुंचा सकती है. इसे समझने के लिए पहले इस बात का एक्स-रे जरूरी है कि 'द केरला स्टोरी' को जबरदस्त रिस्पॉन्स क्यों मिला था.
इमोशनल कनेक्शन में पॉलिटिकल एजेंडा घोलने का खेल
'द केरला स्टोरी' (2023) का ट्रेलर अपने वक्त में इसलिए शॉकिंग था क्योंकि इसमें तथाकथित 'लव जिहाद' जैसे कंट्रोवर्शियल टॉपिक पर बेस्ड कहानी थी जो लंबे समय से पॉलिटिकल खींचतान का मुद्दा है.
लड़कियों का ब्रेनवॉश करके उन्हें आतंकी संगठनों के लिए रिक्रूट करने के मामले खबरों में भी सामने आते रहे हैं. मगर ये भी माना जाता है कि ऐसे मामलों को राजनीतिक टूल की तरह यूज करने के लिए रियलिटी से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर नैरेटिव भी गढ़े जाते हैं. यानी यहां एक ग्रे एरिया है जिसे एजेंडाबाजी वाली फिल्में भुनाने की कोशिश करती हैं. मगर इस काम के लिए 'द केरला स्टोरी' ने जो स्टोरी आर्क तैयार किया, वो एक मासूम लड़की के साजिश में फंसने की कहानी बताने का था.
फिल्म का नैरेटिव एक्ट्रेस अदा शर्मा के किरदार को फॉलो करता है. इस किरदार के आतंकियों के जाल में फंसने और उसके साथ हुई साजिश दिखाने के सीन्स में फिल्म अपना पॉलिटिकल एजेंडा पुश कर रही थी. लेकिन कहानी का ट्रीटमेंट कम से कम एक पर्दादारी मेंटेन कर रहा था और सीधे सतह पर पॉलिटिकल होने से बच रहा था. स्टोरी के अंदर क्या एजेंडा और प्रोपेगेंडा था, वो अलग बहस है. मगर दर्शक लीड किरदार से सिंपथी रखते हुए उसकी 'स्टोरी' देख रहे थे. इस नैरेटिव चॉइस की वजह से ही 'द केरला स्टोरी' को जमकर दर्शक मिले, जिन्होंने इसे 200 करोड़ से ज्यादा कमाने वाली बॉलीवुड हिट में बदल दिया.
कहां चूक रहा है 'द केरला स्टोरी 2' का ट्रेलर
सीक्वल का ट्रेलर शुरू ही इस डायलॉग के साथ हो रहा है कि 'अगले 25 सालों में भारत एक इस्लामिक देश बन जाएगा.' ये लाइन शुरू से ही 'द केरला स्टोरी 2' के ट्रेलर को एक स्टोरी नहीं रहने देती. इस लाइन के जरिए ट्रेलर एक किस्म का डर पैदा करने की कोशिश करता है और उस डर के जरिए दर्शक को फिल्म तक खींचना चाहता है. आगे चलकर ट्रेलर में लड़कियों के धर्म बदलवाने और उन्हें जबरदस्ती 'बीफ खिलाने' पर फोकस करने लगता है.
ट्रेलर में नजर आ रही कहानी का नैरेटिव उन न्यूज चैनल बहसों और व्हाट्सएप मैसेज जैसा लगने लगता है, जिनमें अब जनता को भी स्वाद आना बंद हो चुका है. और इससे सबसे बड़ा नुकसान ये है कि ये जनता को किरदारों से सिंपथी नहीं फील करने देता. जब तक किरदारों की इमोशनल जर्नी देखकर दर्शक को कुछ फील नहीं होता, तब तक कोई एजेंडाबाजी उन पर काम नहीं करती. 'द केरला स्टोरी 2' का ट्रेलर इस नैरेटिव चॉइस की वजह से कमजोर लगता है.
अपनी पॉलिटिकल चॉइस को आगे बढ़ाने के लिए फिल्मों का इस्तेमाल हमेशा से होता रहा है. मगर एजेंडे का सीधे सतह पर नजर आना, किरदारों से सिंपथी रखने के आड़े आता है. फिल्म 'कहानी' ना होकर, राजनीतिक प्रचार करने निकली जीप के बाहर लगा लाउडस्पीकर लगने लगती है. इसलिए अगर फिल्म की कहानी एंगेजिंग है और फिल्ममेकिंग दमदार, तो जनता बीच में छुपे एजेंडे को किनारे करके किरदारों के साथ टिकी रहती है. रणवीर सिंह की 'धुरंधर' इस बात का बहुत अच्छा उदाहरण है.
प्रैक्टिकली देखें तो, 'धुरंधर' में केवल तीन सीन्स ऐसे थे जो एक पॉलिटिकल टोन लिए हुए थे. लेकिन सॉलिड कहानी, उम्दा फिल्ममेकिंग और एंगेजिंग नैरेटिव होने की वजह से एक न्यूट्रल दर्शक ने भी इन सीन्स को छोड़कर 'धुरंधर' का दामन थामे रखा. सिर्फ ये तीन सीन ना तो किसी को फिल्म पसंद आने की वजह थे, ना फिल्म खराब लगने की. जिन्हें इन सीन्स से आपत्ति थी, उन्होंने भी बाकी फिल्म पूरी जरूर देखी. जबकि 'द केरला स्टोरी 2' ट्रेलर से ही कहानी कहने पर कम और दर्शक को शॉक करके ध्यान खींचने की कोशिश ज्यादा कर रही है. आज की स्मार्ट ऑडियंस के साथ ये पैंतरा बहुत कामयाब होता नहीं है.
फिल्म की टोन में ये शिफ्ट शायद इसलिए भी है क्योंकि डायरेक्टर की कुर्सी पर चेहरे बदल गए हैं. 'द केरला स्टोरी' के डायरेक्टर सुदीप्तो सेन थे, 'द केरला स्टोरी 2' की कमान कामाख्या सिंह के हाथों में है. सीक्वल में अदा शर्मा के ना होने से भी बहुत लोगों का ध्यान हटेगा. अब देखना है कि 27 फरवरी को 'द केरला स्टोरी 2' थिएटर्स में पहुंचेगी तब जनता का ध्यान बांध पाती है या नहीं.
सुबोध मिश्रा