भावनाओं की डिक्शनरी में हर इमोशन को जान देने वाली आवाज. हिंदी प्लेबैक में कदम रखते ही लेजेंड फीमेल सिंगर्स के बीच अपनी पहचान बनाने वाली आवाज. या खुद 70 की उम्र में, कॉलेज गोइंग लड़की के रोमांटिक पैशन की आवाज― आशा भोंसले हिंदी म्यूजिक की वो दुर्लभ आवाज थीं, जो किसी भी रंग-राग के गाने की जान बन जाती थीं.
अचानक तबियत बिगड़ने के बाद, मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में इलाज के लिए पहुंचीं आशा अब हमारे बीच नहीं हैं. वो इस संसार को अलविदा कहते वक्त आशा 92 साल की थीं. पर इस बात पर उनकी आवाज के करोड़ों दीवानों के लिए यकीन करना थोड़ा मुश्किल है. क्योंकि पिछले 70 सालों में बड़े पर्दे पर तस्वीरें बदलीं, गीत बदले, गीतों में बजने वाले साज़ बदले… पर उन गीतों में आशा की आवाज़ हमेशा नई बनी रही.
एक नई आवाज, एक नया अंदाज
मराठी में गाना शुरू कर चुकीं आशा भोंसले 1948 में हिंदी फिल्मों में आईं. हिंदी फिल्मों में तब नूर जहां, शमशाद बेगम, सुरैया और गीता दत्त जैसी फीमेल सिंगर्स का सिक्का चलता था. आशा के सामने सबसे बड़ा चैलेंज खुद उनकी बड़ी बहन, लता मंगेशकर भी थीं. दोनों बहनों की आवाज भी कई बार एक जैसी लगती थी. लेकिन आशा की आवाज़ को पहचान मिली उनके अंदाज़ से.
आशा ने खुद भी कई बार इंटरव्यूज में बताया था कि शुरुआत में उनके हिस्से वो गाने आते थे, जो बड़ी फीमेल प्लेबैक सिंगर्स नहीं गाती थीं. कई बार वो फिल्में उन बड़े नामों के लेवल से थोड़ी छोटी पड़ती थीं और कई बार गानों के बोल या इमोशन ऐसे होते थे जिन्हें आवाज देने पर लोग और इंडस्ट्री मोरल जजमेंट देने लगते थे! मगर आशा ने अपने पास आने वाला हर गाना बिना जजमेंट के, एन्जॉय करके गाया. और गानों की फीलिंग के साथ घुल जाने वाला ये अंदाज़, उनकी आवाज की पहचान बन गया.
दैवीय नहीं, शरारत और अदाओं भरी आवाज
दिलीप कुमार की फ़िल्म संगदिल (1952), अशोक कुमार की परिणीता (1953) और देव आनंद की CID (1956) जिनमें आशा को बाकी सिंगर्स के बीच कुछ-कुछ गाने मिले. अपने वक्त के टॉप म्यूजिक डायरेक्टर ओपी नय्यर ने CID में उन्हें एक गाना दिया, लेकिन उसमें भी आशा के साथ आइकॉनिक शमशाद बेगम साथ थीं. गाना था― लेके पहला पहला प्यार.
शमशाद बेगम की सधी हुई, नेज़ल आवाज के साथ आशा की सॉफ्ट, यंग और चुलबुली आवाज़ का कंट्रास्ट आज भी ये गाना सुनते हुए आपको अपील करेगा. इस अपील ने ही आशा के करियर का रास्ता बदल दिया. CID से आशा और नय्यर की ऐसी सुपरहिट पार्टनरशिप शुरू हुई जिसने अगले दो दशक में जमकर हिट गाने दिए. 50 के दशक का अंत इस जोड़ी के हिट गानों वाली कई फिल्में लेकर आया― बड़े सरकार, कैदी, नया दौर, तुमसा नहीं देखा, हावड़ा ब्रिज और कल्पना.
ओपी नय्यर ने आशा को वो गाने दिए जो महिला किरदारों की रोमांटिक इच्छाओं की आवाज दे रहे थे. इनमें अदाएं थीं, शैतानी थी और कई मौकों पर पुरुष किरदार को लुभाने वाली फीलिंग थी― तब इस एक्सप्रेशन को ‘बाउंड्री पार करना’ माना जाता था. इनका म्यूजिक तब के स्टैंडर्ड पर बहुत वेस्टर्न था. इनकी तस्वीर में कई बार एक्ट्रेसेज वेस्टर्न आउटफिट में होती थीं. कैबरे डांस होता था, जिसकी आइकॉन उस समय हेलेन थीं.
नय्यर के साथ आशा के ऐसे गानों की शुरुआत फ़िल्म कैदी (1957) के गाने ‘छाया है समां’ से मानी जा सकती है. इस जोड़ी के बाकी ‘रिस्क’ गाने थे― उड़े जब जब जुल्फें तेरी, आइए मेहरबां, इशारों इशारों में दिल लेने वाले, ये है रेशमी जुल्फों का अंधेरा न घबराइए, आओ हुज़ूर तुमको. शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने आशा के इसी अंदाज को झुमका गिरा रे, ओ मेरे सोना रे सोना और पर्दे में रहने दो जैसे गानों में उतारा.
नय्यर ने कई इंटरव्यूज में कहा कि उन्हें अपने गानों में एक मुस्कुराती हुई ‘शरारत’ की जरूरत थी, जो उन्हें आशा की आवाज़ में मिली. इन गानों से आशा ने लोगों को शॉक तो किया ही, मगर ये भी मैसेज दिया कि उनके पास गायकी के हुनर के साथ-साथ एक्सपेरिमेंट की क्षमता भी बहुत है. इसी बात ने आशा को आर डी बर्मन का भी फेवरेट बनाया, जिनका म्यूजिक 70 के दशक में बॉलीवुड की पहचान बना.
आशा की आवाज ने दिया 70s को स्वैग
ये दशक हिंदी फिल्मों के सबसे एक्सपेरिमेंटल दौर में गिना जाता है. 70 के दशक ने फिल्मों को स्टाइल, इंटरनेशनल इंस्पिरेशन, गैंगस्टर्स, वैम्प और आइकॉनिक विलेन दिए. ये एक्सपेरिमेंट गानों में भी उतरे और सबसे ज़्यादा आजमाए आर डी बर्मन ने, आशा की आवाज़ के साथ. ‘दम मारो दम’ में जनता को नशेबाजी बढ़ने का डर दिखा, तो ‘पिया तू अब तो आजा’ बहुतों को अश्लील लगा. ऐसे ही रिएक्शन ‘आ जाने जां’ और शोले के ‘महबूबा महबूबा’ पर भी आए.
इस बागी तेवर के अलावा, 70s में आशा ने नए म्यूजिकल स्टाइल के कई टॉप क्लास चार्टबस्टर गाने दिए― चुरा लिया है तुमने जो दिल को और दो लफ़्ज़ों की है दिल की कहानी, इसी दौर के गाने हैं. इसी दशक में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ आशा ने जो हिट्स दिए वो देखिए― मार गई मुझे तेरी जुदाई, यार दिलदार तुझे कैसा चाहिए, दरोगा जी चोरी हो गई, दिल्लगी ने दी हवा. 70 के दशक ने आशा को वो इमेज दी, जिसका सार था― अच्छी लड़कियां लता के गाने सुनती हैं और बिगड़ैलों के लिए हैं आशा के गाने! और आशा ने ये सब साड़ी पहने-पहने ही कर दिया.
80s में बदला अंदाज
70s के मॉडर्न स्टाइल को आशा ने 80s में जवान जानेमन हसीन दिलरुबा और तू तू है वही जैसे गानों में बचाए ही रखा. मगर इस दशक में उनके करियर की हाईलाइट फिर से नए एक्सपेरिमेंट बने. उमराव जान (1981) में वो एक तवायफ किरदार को आवाज़ दे रही थीं, इससे किसी को हैरानी नहीं थी. तबतक आशा, रेगुलर हीरोइन इमेज से अलग, लोगों की आंखों में चुभने बागी-बिगड़ैल और मॉडर्न फीमेल किरदारों की आवाज बन ही चुकी थीं. मगर उमराव जान में आशा ने असली शॉक दिया खय्याम की क्लासिकल धुनों को सधी हुई आवाज़ देकर.
खय्याम ने खुद कई बार कहा कि ऐसे गानों के लिए उन्होंने जब आशा को चुना तो लोग हैरान हो गए. दिल चीज़ क्या है, इन आंखों की मस्ती के, ये क्या जगह है दोस्तों और जुस्तजू जिसकी थी जैसे गाने, हैरानी को तारीफ में बदलने के लिए पर्याप्त साबित हुए. ऊपर से आशा ने इसपर गुलज़ार की फ़िल्म इजाज़त के पूरे एलबम और रोज रोज आंखों तले जैसे गानों का वजन भी रख दिया. 80 के दशक ने आशा को एक इमेज से निकालकर, उन्हें कंप्लीट पैकेज वाली पहचान दिलाई. आशा के दोनों नेशनल अवॉर्ड इसी दशक में आए.
नए कंपोजर्स की फेवरेट आशा
रॉकिंग 90s ने बॉलीवुड को इतना बदल दिया कि पर्दे पर स्टार्स की एक पूरी जेनरेशन आउटडेटेड होने लगी. नए कंपोजर्स की पूरी भीड़ ने तरह का साउंड लिए आई, जिसमें नई आवाजों के लिए बहुत जगह थी. अलका याग्निक, कविता कृष्णमूर्ति, साधना सरगम, अनुराधा पौडवाल और अलीशा चिनॉय इस दशक की सबसे बड़ी प्लेबैक आवाजें थीं. लेकिन नए कंपोजर्स ने जैसे आशा को रीडिफाइन कर दिया. 90s के दशक का मॉडर्न और वेस्टर्न कैरेक्टर तो आशा जी पिछले दो-तीन दशकों से मेंटेन कर रही थीं! और इसे जब लेटेस्ट टेक्निकल स्टाइल का साउंड मिला तो जादू ही हो गया.
अनु मलिक ने बाजीगर के किताबें बहुत सी, और नुसरत फतेह अली खान ने थोड़ा सा पगला थोड़ा सयाना में आशा को फिर से वो शरारत दी जिसकी बात ओपी नय्यर करते थे. विशाल भारद्वाज ने दिल पे मत ले यार में उन्हें कूल बना दिया. और रहमान ने तो आशा को नए यूथ में पॉपुलर कर दिया. रंगीला के गाने, कहीं आग लगे लग जावे (ताल), ओ भंवरे (दौड़) और मुझे रंग दे (तक्षक) जैसे गानों ने आशा को 90s में भी टॉप पर रखा. रहमान ने लगान (2001) से आशा को एक नई सदी में भी टॉप प्लेबैक फीमेल सिंगर बनाए रखा. 90s और शुरुआती 2000s में आशा के इंडी पॉप गानों का भी बड़ा जलवा था. उनका एलबम जानम समझा करो बहुत पॉपुलर हुआ. अदनान सामी के साथ आशा का एल्बम कभी तो नजर मिलाओ आज भी सुना जाता है.
नई सदी में जनता को नए शॉक देने वालीं आशा
नई सदी में भी आशा नई आवाज बनी रहीं और उनके गाने यूथ में जबरदस्त पॉपुलर रहे. कमबख्त इश्क है जो, खल्लास, शरारा शरारा गाते वक्त उनकी उम्र 65 साल से ज्यादा थी. मगर 2005 में लकी लिप्स गाकर आशा ने फिर 70s जैसा बवाल कर दिया. गाना खूब पॉपुलर हो रहा था, मगर लोगों में परेशानी ये थी कि ऑलमोस्ट 70 साल की आशा, अंडर 25 लड़की की फीलिंग को आवाज कैसे दे सकती हैं! मगर आशा ने आज से 50 साल पहले इन बातों का लोड नहीं लिया था, तो अब क्या लेतीं.
वो काम करती गईं. 2017 की फ़िल्म बेगम जान में उनका एक गाना था- प्रेम में तोहरे. आज के पॉपुलर कंपोजर विशाल मिश्रा भी सांड की आंख (2019) में आशा को गाना देकर धन्य हो चुके हैं. वैसे आशा का आखिरी फिल्मी गाना 2022 में आई फ़िल्म लाइफ इज़ गुड में है.
12000 से ज्यादा गाने रिकॉर्ड करने का वर्ल्ड रिकॉर्ड आशा ने ऐसे ही नहीं बनाया था. और वो भी अधिकतर पॉपुलर प्लेबैक गाने. वो हर दशक में और नई होती चली गईं. आशा हमारे बीच हों न हों, वो हमेशा नई ही लगती रहेंगी. सिर्फ उनकी आवाज़ नहीं, गानों में उनका स्वैग हर नई जेनरेशन के लिए मिसाल बनता रहेगा.
सुबोध मिश्रा