मनोज बाजपेयी का कोई नया प्रोजेक्ट अनाउंस हो और सोशल मीडिया पर उसका शोर न मचे, ये कैसे हो सकता है. बुधवार को जब उनकी नेटफ्लिक्स फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ अनाउंस हुई, तब भी शोर हुआ, मगर जरा दूसरे टाइप का— टाइटल को लेकर फिल्म पर कंट्रोवर्सी शुरू हो गई. तर्क ये था कि ‘घूसखोर पंडत’ टाइटल पंडित या ब्राह्मण समुदाय की नेगेटिव छवि गढ़ता है.
मुंबई के एक वकील ने इस टाइटल को लेकर नेटफ्लिक्स को नोटिस भेज दिया. भोपाल में ब्राह्मण समाज फिल्म के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में उतर गया, लखनऊ में एक एफआईआर दर्ज हो गई. दिल्ली हाई कोर्ट में एक पिटीशन भी पहुंच गई. फाइनली मनोज और फिल्म के राइटर-प्रोड्यूसर नीरज पांडे ने अपनी फिल्म के टाइटल से भावनाएं आहत करने पर पछतावा जताया है. और नेटफ्लिक्स ने फिल्म का सारा प्रमोशनल कंटेंट, यानी पोस्टर, फर्स्ट लुक वीडियो वगैरह हटा दिया है.
मगर इस पूरे मामले में एक तगड़ी विडंबना है— हिंदी कंटेंट में खपने वाली जो जनता ‘घूसखोर पंडत’ से खफा हुई, उसने ऐसे ऑनस्क्रीन ब्राह्मण किरदारों को खूब सेलिब्रेट किया है, जिनकी नैतिकता या एक्शन सेलिब्रेट करने लायक तो कतई नहीं थे.
बहुत पॉपुलर हुए ये नेगेटिव ब्राह्मण किरदार
घूसखोर कॉप, खतरनाक गैंगस्टर, हाड़ कंपा देने वाला साइको किलर... हिंदी दर्शकों में तमाम ऐसे नेगेटिव किरदार खूब पॉपुलर हुए हैं, जिनका नाम उनकी ब्राह्मण पहचान बताता था. लेकिन फिल्मों में उनके नेगेटिव कैरेक्टर आर्क का कारण उनकी जाति को नहीं बनाया गया. जबकि ‘घूसखोर पंडत’ में मोरल करप्शन, जातिसूचक शब्द का विशेषण जैसा लगता है.
‘घूसखोर पंडत’ से भले बहुत लोग आहत हुए हों, लेकिन ‘दबंग’ फिल्मों में सलमान खान के पुलिस ऑफिसर चुलबुल पांडे की खुलेआम रिश्वतखोरी ‘लाइट मोमेंट’ होती है. बल्कि हीरो के भ्रष्ट कैरेक्टर को सेलिब्रेट करता एक गाना भी ‘दबंग 2’ में था— ‘कहते हैं करते हैं जो मर्जी, सुनते नहीं हैं किसी की अर्जी, करते नहीं हैं रेगुलर ड्यूटी!’
दमदार सीटी बजाकर, शानदार डांस करते पांडे जी की ये अदा कोई नई बात नहीं है. पहली ‘दबंग’ में तो वो पुलिस थाने के अंदर ‘हमका पीनी है!’ की जिद पकड़े हुए थे. हालांकि, पांडे जी एक फिल्मी किरदार का विरोध करने उतरी जनता से कहीं ज्यादा सेल्फ-अवेयर थे. इसलिए उन्होंने खुद ही अगली लाइन में कह दिया— ‘आदत अपनी ससुरी बहुत कमीनी है!’
पांडे जी का पिछौटा छोड़ भी दिया जाए, तो इस तरह के किरदारों के ढेरों उदाहरण भरे पड़े हैं. ‘मिर्जापुर’ सीरीज की पूरी कहानी ही मुन्ना त्रिपाठी और गुड्डू पंडित का पर्सनल बवाल है. इंडियन ओटीटी स्पेस ने इन त्रिपाठियों और पंडितों जैसे खूंखार गैंगस्टर्स नहीं देखे. इनके पंगे में जौनपुर के शुक्ला और बिहार के त्यागी गेम चेंजर बनने की कोशिश कर रहे थे. ‘मिर्जापुर’ और इसके किरदार आपको बहुत पसंद होंगे. लेकिन याद रखिए, आपको नॉस्टैल्जिया में नहीं जाना है— हम बात नेगेटिव ब्राह्मण किरदारों की ही कर रहे हैं.
‘बुलेट राजा’ फिल्म ने तो ब्राह्मण समाज को ऐसा डायलॉग दिया कि लोग गाड़ियों पर लिखवाने लगे— ‘ब्राह्मण भूखा तो सुदामा, समझा तो चाणक्य और रूठा तो रावण!’ ये डायलॉग मारने वाले सैफ अली खान का किरदार राजा मिश्रा एक गैंगस्टर था. उसका दूसरा साथी था रुद्र त्रिपाठी, जिसे जिमी शेरगिल ने निभाया था.
और पीछे चलें तो आशुतोष राणा 90s में ‘दुश्मन’ और ‘संघर्ष’ फिल्मों में भयानक विलेन बने थे. उनके दोनों विलेन किरदारों के टोटल गुण थे— साइको, खूनी, रेपिस्ट और बच्चों की बलि देने वाला राक्षस. इन फिल्मों में आशुतोष के किरदारों के नाम थे— गोकुल पंडित (‘दुश्मन’) और लज्जा शंकर पांडे (‘संघर्ष’).
लिखने वालों ने कहानियों की घटने की जगहों, माहौल और समाज के हिसाब से किरदार लिखे होंगे. शायद ही इन किरदारों की जाति को कहानी में एक फैक्टर की तरह लिखा गया होगा. लेकिन आज ‘घूसखोर पंडत’ के पचड़े की वजह से हमें ये किरदार इस चश्मे से देखने पड़ रहे हैं. सवाल ये है कि जब अब तक हमारी समझदार ऑडियंस को इन फिल्मों में ब्राह्मण किरदारों के ऐसे पोर्ट्रेयल पर दिक्कत नहीं हुई, तो इस बार अचानक क्या हो गया!
क्यों विरोध की वजह बना मनोज की फिल्म का टाइटल?
उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे राज्यों में गैंगस्टर कल्चर एक समय इतना असरदार रहा कि लोगों ने लगभग इसे क्राइम समझना बंद कर दिया. इसे ताकत से जोड़कर देखा जाने लगा और यहीं से ‘बाहुबली’ कल्चर की नींव पड़ी. ये बाहुबली अपने जाति समाज के लिए रॉबिनहुड अंदाज में जो योगदान देते थे, उनके पीछे इनके अपराध इग्नोर कर दिए जाते थे.
जब किसी प्रशासनिक व्यवस्था या कानून व्यवस्था में सुनवाई न हो, तो लोग इन बाहुबलियों से मदद मांगते थे. और काम हो भी जाता था. इसलिए ये बाहुबली कल्चर अपने आप में एक सम्मान की नजर से भी देखा जाने लगा. तिवारी, शुक्ला, दुबे और मिश्रा सरनेम वाले तमाम गैंगस्टर-कम-बाहुबली ऐसे हैं जिनकी दंतकथाएं पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं. ये उन्हें एक हीरो जैसा प्रोजेक्शन देता है.
ऐसा होने की तमाम आलोचनाएं हो सकती हैं, लेकिन ऐसे हीरो का पोर्ट्रेयल भी कहानी के कॉन्टेक्स्ट में पचा लिया जाता है. क्योंकि दर्शकों में वो हीरो का परसेप्शन तो है ही. खुद ब्राह्मण सरनेम वाले नीरज पांडे और मनोज बाजपेयी की फिल्म ने सीधे टाइटल में ही ‘पंडत’ को ‘घूसखोर’ घोषित करके हीरो के कैरेक्टर नहीं, उसकी जातिगत पहचान को बदरंगा कर दिया.
कहानी में किसी भी सरनेम वाले हीरो को भ्रष्ट, हिंसक या अपराधी दिखाना चल जाता है. लेकिन जातिगत पहचान के साथ ‘घूसखोर’ लगा देना उन लोगों के लिए भी एक शॉक की तरह आता है, जो अपने ही समाज के गैंगस्टर या अपराधी को सिर्फ उसकी रॉबिनहुड छवि की वजह से डिफेंड कर लेते हैं.
ऐसे में ये किसे याद रहने वाला है कि आखिरकार फिल्म एक फिक्शनल कहानी है. किरदारों का बर्ताव नेगेटिव भी होता है, पॉजिटिव भी. हो सकता है कि ‘घूसखोर पंडत’ में मनोज के किरदार का आर्क अपनी ‘घूसखोरी’ को जस्टिफाई कर ले जाता. ये पचा लिया जाता. हालांकि, सिर्फ जातिसूचक शब्द के आ जाने से, बिना फिल्म देखे ही उसके विरोध को जाति की अस्मिता से जोड़ लेना भी एक ओवररिएक्शन ही है.
दिक्कत ये है कि हर जाति समाज अपने सरनेम वाले किरदार को पॉजिटिव ही देखना चाहेगा, तो नेगेटिव किरदार में किसे दिखाया जाए? ऐसा करते हैं— फिल्म देशभक्ति पर बना देते हैं और विलेन पाकिस्तानी रख लेते हैं… मैटर सॉल्व!
सुबोध मिश्रा