वो महाठग-तांत्रि‍क, जो जहर से भी नहीं मरा था, धुरंधर में उसका गाना, छिपे रहस्य कर देंगे हैरान

फिल्म धुरंधर 2 में एक ऐसा गाना है, जो रिलीज के बाद से ही चर्चा में बना हुआ है. इसका नाम है- रासपुतिन. इस गाने में रशिया की न सिर्फ एक पुरानी कहानी छुपी है, बल्कि इसको गाने वाले बैंड बोनी एम का भी एक रहस्य बना हुआ है.

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रासपुतिन को लेकर क्या है रहस्य? (PHOTO: ITGD) रासपुतिन को लेकर क्या है रहस्य? (PHOTO: ITGD)

शिखर नेगी

  • नई दिल्ली,
  • 09 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:20 PM IST

आदित्य धर की नई स्पाई थ्रिलर 'धुरंधर: द रिवेंज' ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाने के साथ-साथ एक पुराने गाने को भी चर्चा में ला दिया है. फिल्म के एक बेहद खास सीन में जब 1970 के दशक का फेमस गाना 'रासपुतिन' बजता है, तो थिएटर में बैठा हर दर्शक झूम उठता है. सालों पहले रिलीज हुआ यह गाना आज की पीढ़ी के बीच फेमस हो रहा है. हर कोई सोशल मीडिया पर इस गाने को पोस्ट कर रहा है.

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लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस धुन पर आप थिरक रहे हैं, उसके पीछे की कहानी एक डांस नंबर से कहीं ज्यादा गहरी और रहस्यमयी है? यह गाना इतिहास की दो ऐसी विवादित हस्तियों से जुड़ा है, जिसके बारे में जानकर लोग आज भी दंग रह जाते हैं.

क्या सिर्फ पार्टी के लिए बना गाना?
साल 1978 में जब जर्मन म्यूजिकल ग्रुप 'बोनी एम.' ने अपने एल्बम 'नाइटफ्लाइट टू वीनस' का गाना 'रासपुतिन' रिलीज किया, तो यह रातों-रात ग्लोबल हिट बन गया. अपनी जबरदस्त बीट्स और अनोखे संगीत की वजह से यह आज भी पार्टियों की जान बना हुआ है. हालांकि, यह गाना सिर्फ नाचने-गाने के लिए नहीं बनाया गया था, बल्कि इसमें रूस के इतिहास के सबसे रहस्यमयी इंसान, 'ग्रिगोरी रासपुतिन' की जिंदगी को बड़े ही नाटकीय अंदाज में पिरोया गया था. गाने के बोल उस शख्स की ताकत और उसके प्रभाव की कहानी बयां करते हैं जिसे समझना उस दौर में भी किसी पहेली से कम नहीं था.

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कौन था रासपुतिन?
दरअसल रासपुतिन का जन्म 1869 में साइबेरिया के एक छोटे से गांव में हुआ था. उनका शुरुआती जीवन काफी उथल-पुथल भरा रहा. वह कभी अध्यात्म की बातें करते तो कभी बिल्कुल लापरवाह हो जाता. गांव के लोग उनके इस अजीबोगरीब व्यवहार को देखकर हैरान रहते थे. धीरे-धीरे उनकी पहचान एक ऐसे साधु के रूप में होने लगी जिसके पास शायद कोई चमत्कारी शक्ति थी. इसी वजह से उन्हें 'मैड मोंक' (पागल साधु) कहा जाने लगा. अपनी इसी रहस्यमयी छवि और लोगों को प्रभावित करने वाली बातों के दम पर वह गांव की गलियों से निकलकर रूस की सत्ता के केंद्र, सेंट पीटर्सबर्ग तक जा पहुंचे.

रूसी शासन के करीब पहुंचा रासपुतिन
रासपुतिन की लाइफ का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब 1907 में उन्हें रूस के शाही परिवार में बुलाया गया. जार निकोलस द्वितीय और जारिना एलेक्जेंड्रा का बेटा एलेक्सी 'हीमोफीलिया' नाम की जानलेवा बीमारी से जूझ रहा था. जब बड़े-बड़े डॉक्टर हार मान गए, तब रासपुतिन की प्रार्थनाओं और स्पर्श से बच्चे की हालत में सुधार होने लगा. 

ऐसे में  जारिना के लिए रासपुतिन किसी भगवान से कम नहीं थे. देखते ही देखते वह शाही महल के सबसे खास सदस्य बन गए. उनकी पहुंच सिर्फ प्रार्थनाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे राजकाज के फैसलों में भी दखल देने लगे. इसके बाद उन्होंने एक बार डरावनी भविष्यवाणी की थी कि उनकी मौत के साथ ही रूसी साम्राज्य का भी अंत हो जाएगा.

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काफी बदनाम थे रासपुतिन
हालांकि रासपुतिन का जितना नाम था, उतने ही वो बदनाम भी थे. रूस के आम लोगों और राजनेताओं को ये लगने लगा था कि वो शाही परिवार को अपने इशारों पर नचा रहे हैं. इस दौरान उनपर महिलाओं से अनैतिक संबंध के गंभीर आरोप भी लगे. उनकी इमेज सबसे ज्यादा भ्रष्ट आदमी के तौर पर होने लगी. जब पहले विश्व युद्ध के दौरान रूस बर्बादी की ओर बढ़ा तो लोगों ने इसका जिम्मेदार रासपुतिन को ही माना. हालांकि साल 1916 में रासपुतिन को धोखे से बुलाकर जहरीला केके, वाइन पिलाई गई लेकिन इसका उस पर असर तक नहीं हुआ. इसके बाद गोल‍ियां चलाई गईं वो फ‍िर भी नहीं मरा, आख‍िर में पानी में डुबोकर उसे मारा गया. इस हत्या के पीछे काफी कहानियां बनी. हालांकि जितनी रासपुतिन की कहानी रहस्यमयी है. 

रहस्य बोनी एम बैंड को लेकर भी बना हुआ है. ऐसा दावा किया जाता है कि यह महज एक बैंड नहीं था, बल्कि संगीत के इतिहास का सबसे बड़ा और कलात्मक भ्रम था. इस बैंड की चमक-धमक के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी थी जिसे सुनकर किसी का भी सिर चकरा जाए. 

बोनी एम बैंड भी एक रहस्य!
यह कहानी है एक ऐसे समूह की जिसे सबने देखा, सबने सुना, लेकिन उसे पूरी तरह शायद कोई नहीं समझ पाया. क्या आप जानते हैं कि जिस 'मर्दाना आवाज' के दीवाने करोड़ों लोग थे, वह असल में उस शख्स की थी ही नहीं जो स्टेज पर माइक थामे नाच रहा था? 

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इस कहानी की शुरुआत 1974 में हुई, जब जर्मन गायक और संगीत निर्माता फ्रैंक फेरियन ने एक अनूठा प्रयोग किया. उन्होंने 'अल कैपोन' गाने का एक डिस्को वर्जन तैयार किया. हैरानी की बात यह थी कि फेरियन ने इसमें गहरी पुरुष आवाज और पतली (फाल्सेटो) आवाज, दोनों खुद ही रिकॉर्ड की थीं. उन्होंने इसे अपने असली नाम से रिलीज करने के बजाय 'बोनी एम' का नाम दिया. मजे की बात यह है कि जब गाना हिट हुआ और लोगों ने बैंड को देखने की इच्छा जाहिर की, तब तक हकीकत में कोई बैंड अस्तित्व में था ही नहीं. 

आवाज फ्रैंक फेरियन की, चेहरा बॉबी फैरेल का
जब मांग बढ़ी, तो फ्रैंक फेरियन ने इस 'काल्पनिक' बैंड को एक चेहरा देने का फैसला किया. उन्होंने कैरेबियन मूल के चार कलाकारों—लिज मिशेल, मार्सिया बैरेट, बॉबी फैरेल और मैजी विलियम्स को काम पर रखा. दुनिया के लिए अब ये चार लोग ही 'बोनी एम' थे, लेकिन परदे के पीछे की कहानी कुछ और ही थी. ये कलाकार फेरियन की पहले से रिकॉर्ड की गई टेप्स पर सिर्फ लिप-सिंक (होंठ हिलाना) और डांस करते थे. यानी दुनिया जिस समूह को देख रही थी, वह उस आवाज का मालिक नहीं था जिसे वह सुन रही थी.

नतीजा यह हुआ कि बोनी एम बैंड की मशहूर गूंज लिज और मार्सिया की आवाज और खुद फ्रैंक फेरियन की भारी आवाज का मिश्रण थी. लोग सालों तक बॉबी फैरेल को गाते हुए देखते रहे और समझते रहे कि वह आवाज उन्हीं की है, जबकि हकीकत में वह आवाज फ्रैंक फेरियन की थी.

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दावा किया गया कि धोखे की इस बुनियाद पर खड़े होने के बावजूद संगीत इतना शानदार था कि 'डैडी कूल,' 'रासपुतिन,' 'रिवर्स ऑफ बेबीलोन' और 'मा बेकर' जैसे गाने दुनिया भर के चार्ट्स में टॉप पर रहे.  

आज भी बोनी एम का संगीत उतना ही ताजा लगता है जितना दशक पहले लगता था. रेग, डिस्को और यूरो-पॉप का यह अनोखा मेल हर विवाद, केस और खुलासे से ऊपर निकल चुका है. इसे संगीत इतिहास का सबसे बड़ा 'धोखा' कहना गलत नहीं होगा, क्योंकि इसने परफॉरमेंस और हकीकत के बीच की लकीर को ही मिटा दिया था. लेकिन शायद दुनिया को इस धोखे से कभी कोई फर्क ही नहीं पड़ा. लोगों ने सच जानने के बाद भी उनके गानों को प्यार दिया, क्योंकि अंत में बात सिर्फ एक ही चीज पर आकर टिकती है—कि म्यूजिक वाकई लाजवाब था.

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