दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में से एक 'कान्स फिल्म फेस्टिवल' का आगाज हो चुका है. वैसे तो हर साल फ्रेंच रिवेरा की इन गलियों में भारतीय सितारों और फिल्मों का जमावड़ा लगता है, लेकिन पिछले कुछ साल हमारे फिल्ममेकर्स के लिए किसी 'गोल्डन एरा' से कम नहीं रहे. शौनक सेन की 'ऑल दैट ब्रीथ्स', नीरज घेवान की 'Homebound' और पायल कपाड़िया की ऐतिहासिक जीत के बाद अब भारतीय सिनेमा की धमक और गहरी हो गई है.
12 मई से 23 मई तक चलने वाले कान्स के 79वें संस्करण में इस बार भारत की ओर से केवल हिंदी ही नहीं, बल्कि पंजाबी, मलयालम, गुजराती और कन्नड़ सिनेमा की भी सशक्त मौजूदगी दिख रही है. यानी ये कहना भी सही होगा कि इस बार कान्स में भारतीय कहानियों की विविधता का जश्न मनाया जा रहा है.
पंजाबी सिनेमा का ग्लोबल डेब्यू
पंजाबी फिल्मों के शौकीनों के लिए इस बार कान्स बेहद खास है. फेमस एक्टर और सिंगर एमी विर्क और रूपी गिल की फिल्म 'चढ़दी कला' यहां प्रीमियर के लिए तैयार है. अमरजीत सिंह सरोन के डायरेक्शन में बनी यह फिल्म एक ऐसी नर्स की इमोशनल जर्नी है, जिसकी सादगी भरी जिंदगी एक झूठे इल्जाम के बाद पूरी तरह बदल जाती है. मुश्किलों से लड़ते हुए वह कैसे दूसरों का सहारा बनती है, यही इस फिल्म की जान है. कान्स में वाहवाही बटोरने के बाद यह फिल्म 29 मई को सिनेमाघरों में दस्तक देगी.
मलयालम सिनेमा का चलेगा जादू
'मंजुम्मेल बॉयज' की जबरदस्त सफलता के बाद अब डायरेक्शन चिदंबरम अपनी नई फिल्म 'बालन: द बॉय' के साथ कान्स पहुंचे हैं. इस फिल्म को मार्केट सेक्शन (Marché du Film) में दिखाया जाएगा. जिथु माधवन की लिखी यह कहानी एक छोटे बच्चे बालन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक कठोर समाज और अकेलेपन के बीच अपनी पहचान ढूंढने की कोशिश कर रहा है. फिल्म में मां-बेटे के जटिल रिश्तों और मानवीय जज्बे को बहुत बारीकी से उकेरा गया है.
'शैडोज ऑफ द मूनलेस नाइट' की धमक
कान्स का 'ला सिनेफ' सेक्शन उभरते हुए टैलेंट के लिए जाना जाता है और इस बार यहां FTII की छात्रा मेहर मल्होत्रा की शॉर्ट फिल्म 'परछावें मस्या रातां दे' (Shadows of the Moonless Night) अपनी चमक बिखेरेगी. यह फिल्म राजन नाम के एक नाइट-शिफ्ट वर्कर की कहानी है, जो आर्थिक तंगी और नींद की कमी से जूझते हुए मानसिक रूप से टूटने की कगार पर है. यह शॉर्ट फिल्म एक थके हुए इंसान और भागती हुई दुनिया के बीच के अंतर को बखूबी दिखाती है.
कान्स क्लासिक्स में 'अम्मा अरियान' की वापसी
भारतीय सिनेमा के दिग्गजों में शुमार जॉन अब्राहम की कल्ट क्लासिक फिल्म 'अम्मा अरियान' (1986) को एक बार फिर बड़े पर्दे पर देखने का मौका मिल रहा है. इस फिल्म को 4K में रिस्टोर किया गया है और इसे 'कान्स क्लासिक्स' के लिए चुना गया है. यह प्रायोगिक फिल्म एक युवा कार्यकर्ता की यात्रा के जरिए शोक, राजनीति और वैचारिक पतन जैसे गहरे विषयों पर चोट करती है. केरल की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है.
'स्पिरिट ऑफ द वाइल्डफ्लावर'
श्रीमयी चक्रवर्ती की डॉक्यूमेंट्री 'स्पिरिट ऑफ द वाइल्डफ्लावर' दो ऐसी बहनों की कहानी है जो महुआ डिस्टिलरी चलाती हैं. एक तरफ जहां बड़ी बहन अपने बिजनेस को दुनिया भर में फैलाना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ छोटी बहन अपनी पहचान और जेंडर ट्रांजिशन के कठिन दौर से गुजर रही है. यह डॉक्यूमेंट्री समाज के रूढ़िवादी ढांचे और व्यक्तिगत सपनों के बीच के संघर्ष को पेश करती है, जिसे फिल्म मार्केट सेक्शन में दिखाया जा रहा है.
'21 सितंबर'
डायरेक्टर कैरेन क्षिति सुवर्णा की पहली फिल्म '21 सितंबर' का वर्ल्ड प्रीमियर 16 मई को कान्स के पैलेस थिएटर में होने जा रहा है. हिंदी और कन्नड़ भाषा की यह फिल्म अल्जाइमर से जूझ रहे एक बुजुर्ग और उनके बेटे के बीच के रिश्तों की कहानी है. महामारी के दौर में सेट यह फिल्म बीमारी के दर्द और देखभाल करने वालों की थकान को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ दिखाती है. यह फिल्म रिश्तों की अहमियत को एक अलग नजरिए से समझाती है.
गुजराती फिल्म 'लालो'
इस फेहरिस्त में आखिरी और बेहद अहम नाम है 'लालो – कृष्णा सदा सहायते'. अंकित सखिया के डायरेक्शन में बनी इस गुजराती फिल्म ने भारतीय बॉक्स ऑफिस पर पहले ही इतिहास रच दिया. महज 50 लाख के बजट में बनी इस फिल्म ने दुनिया भर में 122 करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया. अब इस फिल्म का कान्स में स्पेशल मार्केट प्रीमियर रखा गया है, जो क्षेत्रीय सिनेमा की बढ़ती ताकत का एक बड़ा उदाहरण है.
शिखर नेगी