भूत बंगला में अक्षय कुमार और प्रियदर्शन का 16 साल बाद रीयूनियन बॉलीवुड के लिए बड़ी हिट लेकर आया है. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि मॉडर्न बॉलीवुड का सबसे भरोसेमंद फ़िल्म जॉनर बन चुके हॉरर-कॉमेडी की शुरुआत अक्षय-प्रियदर्शन की ही फिल्म भूल भुलैया (2007) से हुई थी.
इसके बाद से तमाम बॉलीवुड फिल्मों ने हॉरर कॉमेडी ट्राई की है. मैडॉक फिल्म्स ने तो एक पूरा हॉरर यूनिवर्स खड़ा कर दिया है. इसलिए अक्षय-प्रियदर्शन ने भूत बंगला को उसी भूल भुलैया मैजिक के सहारे हाइप करने की कोशिश की. भूत बंगला के ट्रेलर में प्रचार की लाइन ही यही थी― ‘हॉरर-कॉमेडी के असली उस्ताद!’ अक्षय-प्रियदर्शन के साथ परेश रावल, असरानी और राजपाल यादव की तिकड़ी भी भूत बंगला में लौट आई है.
पिछले कई सालों बाद जनता से अक्षय की किसी फिल्म को इतना ऑर्गेनिक पॉजिटिव रिस्पॉन्स मिला है. लेकिन क्या भूत बंगला में, भूल भुलैया वाला मैजिक क्रिएट हो पाया? भूत बंगला पसंद कर रहे लोगों के पास भी इसका जवाब स्पष्ट है― नहीं. क्योंकि भूल भुलैया के डिज़ाइन और कहानी में बहुत कुछ ऐसा था जिसे शायद अब प्रियदर्शन भी दोबारा न दोहरा पाएं!
भूतिया नहीं, इंसानी हॉरर की कहानी थी भूल भुलैया
कन्फ्यूजन से पैदा होने वाला ह्यूमर और फिजिकल कॉमेडी प्रियदर्शन का सिग्नेचर है. फिजिकल कॉमेडी और कॉमिक टाइमिंग, अक्षय का ट्रेडमार्क. परेश रावल, असरानी और राजपाल यादव जैसे दमदार एक्टर्स को प्रियदर्शन ने कन्फ्यूजन का एजेंट बनाकर कहानी बुनने के लिए हमेशा बेहतरीन इस्तेमाल किया है.
भूल भुलैया से पहले भी प्रियदर्शन अपने ये सारे औजार एक साथ भिड़ा चुके थे. हर बार ये कॉम्बिनेशन असरदार रहा, चाहे हेराफेरी हो या गरम मसाला. भूल भुलैया का जादू क्यों दिमाग के तोते उड़ा देता है इसकी सबसे बड़ी वजह फ़िल्म के कॉन्सेप्ट में छिपी है― एक भूतिया कहानी, जिसमें भूत है ही नहीं!
ये साइकोलॉजी-थ्रिलर कहानी, ओरिजनल मलयालम फ़िल्म मनिचित्रथलु (1993) के लिए मधु मुत्तम ने लिखी थी. प्रियदर्शन उस फिल्म पर सेकंड यूनिट के डायरेक्टर थे. भूल भुलैया में प्रियदर्शन ने ओरिजिनल कहानी को ज्यादा नहीं छेड़ा. शुरुआत से ही ये स्टोरी आपको दिखाने लगती है कि अगर माहौल डर का हो, तो कैसे लोगों को भूत अपने आप दिखने लगता है. लेकिन फिर ट्विस्ट के साथ महल की भूतनी भी आती है― मंजुलिका.
अक्षय का अवनी (विद्या बालन) और मंजुलिका में कनेक्शन खोजना भूल भुलैया की सबसे बड़ी अचीवमेंट था. अक्षय-प्रियदर्शन के ताजा कोलेबोरेशन भूत बंगला की कहानी में बाकायदा भूत है. ये फ़िल्म एक अंधविश्वास को एंटरटेनमेंट के लिए कैश करने के लालच के सामने घुटने टेक देती है. जबकि भूल भुलैया की कहानी भूत-प्रेत के अंधविश्वास से ऊपर उठकर, एक मनोवैज्ञानिक बीमारी के प्रति जागरुकता दे रही थी.
भूल भुलैया में तांत्रिक विद्या का विज्ञान के साथ सामंजस्य में आना एक बहुत शानदार नई चीज थी. साइकोलोजिस्ट बने अक्षय, मंजुलिका की समस्या के पीछे का लॉजिक बताते हैं. और गुरुजी का तांत्रिक समाधान वाला माहौल, अवनी और बाकी घरवालों के मन से भूत को मिटाने के काम आता है.
भूल भुलैया की कहानी का ये अप्रोच इसे आइकॉनिक बनाता है. इसी मनोवैज्ञानिक असर को क्रिएट करने में भूत बंगला और अधिकतर नई हॉरर-कॉमेडी फिल्में चूक रही हैं. प्रियदर्शन एक बार फिर से अक्षय, परेश और राजपाल को लेकर भूल भुलैया जैसी कॉमेडी तो फिर क्रिएट कर लेंगे, पर वो मनोवैज्ञानिक हॉरर क्रिएट करना एक दमदार कहानी के बिना संभव ही नहीं है.
ग्राफिक्स नहीं, परफॉर्मेंस से निकला हॉरर
भूल भुलैया की कहानी में कोई सुपरफिशियल एलिमेंट नहीं था― भद्दी शक्लों वाले प्रेत, चमगादड़, भरी धूप में घिरते बादल या उल्टे पैर वाली चुड़ैलें. सारे किरदार आम इंसान थे, सारा माहौल बहुत रियल था. इसलिए कहानी का संसार बहुत रियल था. प्रियदर्शन ने रियल लोकेशंस पर शूट किया. विजुअल इफेक्ट्स की कोई जरूरत नहीं पड़ी. और सिनेमा ने हाल ही में ये समझना शुरू कर दिया है कि रियलिटी में बेस्ड सीन्स का मैजिक, विजुअल इफेक्ट्स के भरोसे नहीं क्रिएट हो सकता.
भूल भुलैया के रियल संसार में रियल हॉरर का चेहरा बनीं विद्या बालन, फ़िल्म का सबसे बड़ा एसेट थीं. मंजुलिका को विद्या ने पूरी तरह अपनी एक्टिंग, एक्सप्रेशन, बॉडी लैंग्वेज और आंखों से स्क्रीन पर उतारा था. कोई प्रोस्थेटिक मेकअप नहीं, कोई भूतिया कॉस्ट्यूम या स्पेशल इफेक्ट नहीं. बस साड़ी पहने, ट्रेडिशनल भारतीय श्रृंगार के साथ परफॉर्म करती एक एक्ट्रेस.
भूल भुलैया में विद्या के काम को आज भी बहुत सारे क्रिटिक्स और फ़िल्म लवर्स कमर्शियल हिंदी सिनेमा में किसी एक्ट्रेस की बेस्ट परफॉर्मेंस मानते हैं. इस फ़िल्म के लिए विद्या को नेशनल अवार्ड न मिलने का जख्म आज भी बहुत सारे फ़िल्म लवर्स के दिल में ताजा है!
रॉ फिल्ममेकिंग, दमदार एक्टर्स, रियल सेटअप और मनोवैज्ञानिक हॉरर ने भूल भुलैया का मैजिक क्रिएट किया था. भूत बंगला इसके ऑलमोस्ट 20 साल बाद आई है. अब फिल्ममेकिंग बहुत बदल चुकी है, कहानियों कहने का तरीका बदल चुका है. लेकिन भूल भुलैया की कहानी कहने में सबसे बड़ी बात कनविक्शन थी.
भूत बंगला जैसी कहानी के अस्तित्व पर आप तभी पूरी तरह विश्वास कर सकते हैं, जब आप खुद पूरी तरह लॉजिक किनारे रखकर अंधविश्वास में यकीन कर पाते हों! जबकि भूल भुलैया की कहानी में ही भरोसा था कि हां ऐसा कुछ हो सकता है. बल्कि भूल भुलैया की तरह, किसी को भूत-प्रेत की समस्या महसूस होने के पीछे मनोवैज्ञानिक कारण का होना ज्यादा संभव है. इसलिए भूल भुलैया वो दुर्लभ ईमानदार स्टोरी है, जो शायद दोबारा न बन पाए. भले उसी फिल्म को बनाने वाली टीम अक्षय-प्रियदर्शन-परेश रावल-राजपाल यादव दोबारा कोशिश करते रहें. भूल भुलैया एक आइकॉनिक फिल्म थी, है और हमेशा रहेगी.
सुबोध मिश्रा