आशा भोसले ने एक बार अपनी आवाज के बारे में कहा था,'लता दीदी और मेरी- हम दोनों की आवाज बचपन से काफी मिलती-जुलती थी. अगर मैं उनकी तरह गाती, तो शायद मुझे कोई काम ही नहीं देता. इसलिए मैंने तय किया कि मैं कभी लता दी की नकल नहीं करूंगी.'
यही फैसला आशा भोसले को सबसे अलग बनाता है. आज जब वो हमारे बीच नहीं हैं, तो उनके गाने ही उनकी सबसे बड़ी विरासत हैं. हर नई हीरोइन के होठों से निकलती और सुनने वालों के कानों में गूंजती उनकी आवाज इस बात की गवाही देती रहेगी कि आशा भोसले सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक दौर थीं… और वो दौर कभी खत्म नहीं होगा.
हर दौर की 'आशा'
आशा भोसले सिर्फ एक सिंगर नहीं, बल्कि हर दौर की पहचान बन गईं- एक ऐसी आवाज, जिसने समय के साथ खुद को बदला, लेकिन अपनी चमक कभी कम नहीं होने दी. 60 के दशक की मासूमियत हो, 70-80 के दौर की चुलबुली अदाएं या 90 के दशक का मॉडर्न अंदाज- आशा जी ने हर हीरोइन को अपनी आवाज दी. ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘दम मारो दम’, ‘ये मेरा दिल’, ‘इन आंखों की मस्ती’, ‘चुरा लिया है तुमने’ जैसे गानों में उनकी आवाज ने स्क्रीन पर किरदारों को जिंदा कर दिया.
वो सिर्फ गाती नहीं थीं, हर गाने को जीती थीं. उनकी आवाज में शरारत भी थी, दर्द भी, इश्क भी और एक अलग सा आत्मविश्वास भी- जो हर पीढ़ी को उनसे जोड़ता रहा. सबसे खास बात ये रही कि उन्होंने खुद को कभी एक ही ढांचे में नहीं बांधा. जहां एक तरफ उन्होंने कैबरे और वेस्टर्न स्टाइल गानों में अपनी पहचान बनाई, वहीं भजन, गजल और क्लासिकल गानों में भी उतनी ही गहराई दिखाई. यही उनकी असली ताकत थी- हर रंग में ढल जाने की कला.
कैसे बनीं आशा भोसले इंडिपॉप की क्वीन?
संगीत की दुनिया में कुछ आवाजें सिर्फ गाती नहीं… वो दौर बन जाती हैं. आशा भोसले ऐसी ही आवाज थीं. वो सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि इंडिपॉप को भी एक नई पहचान दी. उनकी आवाज में वो जादू था, जो हर जनरेशन को जोड़ता चला गया.
आशा भोसले को इंडिपॉप की क्वीन इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने उस वक्त पॉप म्यूजिक को अपनाया, जब ज्यादातर सिंगर्स सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित थे. उन्होंने साबित किया कि एक प्लेबैक सिंगर भी इंडिपेंडेंट म्यूजिक में उतना ही बड़ा नाम बन सकता है.
फिल्मी गानों में सुपरहिट होने के बाद भी आशा जी ने खुद को वहीं नहीं रोका. 90 के दशक में उन्होंने इंडिपॉप की ओर रुख किया और नए एक्सपेरिमेंट्स किए. उनका एल्बम 'जानम समझा करो' (1997), जिसे लेस्ली लुईस के साथ बनाया गया, इंडिपॉप का गेम-चेंजर साबित हुआ. ये एल्बम युवाओं के बीच जबरदस्त हिट रहा और उन्हें एक नए अवतार में पेश किया.
कौन से एल्बम्स ने बनाया पॉप आइकन?
जानम समझा करो– इस एल्बम ने उन्हें इंडिपॉप की पहचान दिलाई.
आशा एंड फ्रेंड्स- इसमें उन्होंने नए कलाकारों के साथ कोलैब किया.
यू हैव स्टोलेन माय हार्ट– क्रोनोस क्वार्टेट के साथ उनका इंटरनेशनल प्रोजेक्ट.
इन एल्बम्स ने दिखाया कि उनकी आवाज सिर्फ हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं, बल्कि ग्लोबल लेवल पर भी गूंज सकती है.
वर्सेटिलिटी: उनकी सबसे बड़ी ताकत
आशा भोसले की सबसे बड़ी खासियत थी उनकी वर्सेटिलिटी. वो क्लासिकल, गजल, कव्वाली, कैबरे, डिस्को और पॉप- हर जॉनर में फिट बैठती थीं. इसी वजह से इंडिपॉप में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई और युवा पीढ़ी को अपनी ओर खींचा. आज जो इंडिपॉप हमें दिखता है, उसकी नींव कहीं न कहीं आशा भोसले जैसे कलाकारों ने ही रखी थी. उन्होंने ये रास्ता खोला कि म्यूजिक सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है- आप अपनी अलग पहचान भी बना सकते हैं. वो हर हीरोइन की आवाज बनीं, उन्होंने हर दौर में खुद को रेलेवेंट रखते हुए अपनी आवाज में भी बदलाव किए.
किस एक्ट्रेस के लिए सबसे ज्यादा गाने गाए?
आशा भोसले ने कई एक्ट्रेस के लिए गाया, लेकिन उनका सबसे खास जुड़ाव हेलेन के साथ माना जाता है. हेलेन के डांस नंबर्स और आशा जी की आवाज- ये जोड़ी आइकॉनिक बन गई.
हेलेन – कैबरे और डांस नंबर
रेखा – गजल और क्लासिकल टच
जीनत अमान – मॉडर्न और बोल्ड गाने
हर एक्ट्रेस के हिसाब से अपनी आवाज ढाल लेना ही उनकी सबसे बड़ी कला थी.
हेलेन से लेकर करीना तक- आशा का चला जादू
आशा भोसले की सबसे बड़ी खासियत यही रही कि उन्होंने हर दौर की हीरोइनों को अपनी आवाज दी. 60s से लेकर 2000s तक- हर जनरेशन उनके गानों पर झूमी. 60s–70s के दौर में उन्होंने हेलेन के लिए फिल्म कारवां (1971) का 'पिया तू अब तो आजा’ गाया. फिर मुमताज को किस्मत (1968) फिल्म में ‘आओ हुजूर तुमको’ के लिए आवाज दी.
जीनत अमान के लिए फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा (1971) गाना ‘दम मारो दम’ गाया, जिसके लिए उन्हें अब तक रॉयल्टी मिलती रही. 80s का दौर में रेखा के आशा ने ‘इन आंखों की मस्ती’ गाना गाया, ये फिल्म उमराव जान (1981) का था. इसके बाद स्मिता पाटिल के लिए ‘आज रपट जाएं’ गाना फिल्म नमक हलाल (1982) का.
इसके बाद 90s के दौर में फिल्म रंगीला (1995) से उर्मिला मातोंडकर का गाना ‘तन्हा तन्हा’, करिश्मा कपूर के लिए 'ले गई ले गई’- फिल्म दिल तो पागल है (1997) से.2000s के बाद आशा ने ऐश्वर्या राय को अपनी आवाज दी, उन्होंने फिल्म: बंटी और बबली (2005) का ‘कजरारे’ गाना गाया. करीना कपूर के लिए फिल्म डॉन (2006) का ‘ये मेरा दिल (रीमिक्स)’ गाया.
डांस नंबर्स को कैसे दी नई पहचान?
‘पिया तू अब तो आजा’, ‘दम मारो दम’, ‘ये मेरा दिल’ जैसे गानों में उनकी आवाज ने डांस नंबर्स को नई जान दी. उनकी आवाज में जो एनर्जी और एक्सप्रेशन था, उसने इन गानों को सिर्फ गाना नहीं, एक अनुभव बना दिया.
कहा जाए कि आशा इकलौती ऐसी सिंगर रहीं, जिनका दौर कभी खत्म नहीं हुआ तो गलत नहीं होगा. 60s से 80s का दौर आशा भोसले के लिए गोल्डन पीरियड था, जब उन्होंने आर डी बर्मन के साथ कई सुपरहिट गाने दिए. उनकी आवाज की सबसे बड़ी खासियत थी- एक्सप्रेशन और अडॉप्टेबिलिटी. वो सिर्फ गाना नहीं गाती थीं, बल्कि हर शब्द को जीती थीं.
आशा भोसले सिर्फ एक सिंगर नहीं थीं, वो एक एहसास थीं. 92 की उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली. उन्होंने हर दौर, हर जॉनर और हर हीरोइन के साथ खुद को ढाला और यही उन्हें इंडिपॉप की क्वीन बनाता है. उनकी आवाज आज भी गूंजती है… और हमेशा गूंजती रहेगी.
आरती गुप्ता