इंडियन सिनेमा का सबसे बड़ा साल 2025 खत्म हो चुका है. 2026 के आते ही नए कैलेंडर खुल चुके हैं. नए साल का पहला दिन, बीते हुए साल से सबक लेने और आने वाले के लिए कमर कसने का होता है. लोग न्यू ईयर रिजोल्यूशन लेते हैं. पुरानी नुकसानदायक आदतें बदलने और नई बेहतर आदतों को निभाने की कसमें खाते हैं.
2025 को सबसे बड़ा साल बनाने में बॉलीवुड का बहुत बड़ा हाथ रहा. दिलचस्प ये रहा कि बड़ा कंट्रीब्यूशन उन फिल्मों से आया जिनसे ऐसी उम्मीद नहीं थी. और जिनसे उम्मीदें थीं, वो घुटनों के बल बैठ गईं. इन नाकामियों ने बॉलीवुड को कुछ बड़े सबक दिए हैं, जिन्हें गांठ मारकर फिल्ममेकर्स को नए साल की शुरुआत करनी चाहिए:
1. नॉस्टैल्जिया की खुदाई से तौबा
सीक्वल फिल्मों की लंबी लाइनों और यूनिवर्स की भूल-भुलैया ने दर्शकों को बहुत उलझा दिया है. असली दिक्कत ये है कि एक चली हुई फिल्म के सहारे और हिट्स कमा लेने की ट्रिक अब जनता को समझ आने लगी है. सीक्वल या यूनिवर्स तभी मजा देते हैं जब किरदारों की कहानी नेचुरली आगे बढ़ती है, बॉक्स ऑफिस के दम पर नहीं.
2025 में 'वॉर 2', 'केसरी चैप्टर 2', 'धड़क 2', 'सन ऑफ सरदार 2' जैसे सीक्वल हल्के पड़ गए. जनता ने इनमें बिल्कुल दिलचस्पी नहीं दिखाई. साल की सबसे दमदार हिट्स 'धुरंधर', 'छावा', 'सैयारा' ऑरिजिनल कहानियां थीं. दर्शकों ने बॉलीवुड को इशारा दे दिया है— नई ऑरिजिनल कहानियां लाओ, हम तैयार हैं.
2. जनता का सम्मान
फिल्म प्रमोशन एक टूल है, खुद एक फिल्म नहीं— बॉलीवुड को ये समझने की बहुत सख्त जरूरत है. हर फिल्म रिलीज एक इवेंट नहीं है. साल की दो बड़ी हिट्स 'सैयारा' और 'धुरंधर' इस बात का सबूत हैं कि बिना स्पीकर फाड़ प्रमोशन के भी फिल्में चलती हैं. और न सिर्फ चलती हैं, बल्कि धमाके करती हैं. कंटेंट दमदार है तो फिल्म में किसी स्टार के चेहरे की भी जरूरत नहीं है.
पूरे 2025 में इस बात के एक से बढ़कर एक उदाहरण मिले कि मेकर्स ने प्रमोशन में जितना शोर मचाया, फिल्में उतनी ही जल्दी थिएटर्स से गायब हो गईं. इसलिए फिल्म के चलने का सबसे बड़ा सत्य एक ही है— जनता का वर्ड ऑफ माउथ. वैसे ये बात कुछ फिल्म क्रिटिक्स को भी समझने की जरूरत है कि आप जनता के फिल्मी स्वाद का मीटर नहीं हैं. आपने जिस फिल्म को कमजोर समझा, वो अगर खूब चल गई तो ये जनता का मूड है. फिल्म के लिए जनता के प्यार को 'शेमिंग' में बदलना छोड़ना होगा.
3. ओटीटी की लाठी छोड़ो
लॉकडाउन के बाद वाले दौर में ओटीटी ने फिल्म बिजनेस का जितना नुकसान किया, उतना शायद ही किसी और चीज ने किया हो. औसत और कमजोर फिल्मों को स्टार्स के नाम पर अच्छी डील्स मिलीं तो मेकर्स ने इसे एक सुरक्षा कवच बना लिया. थिएटर्स में हल्की कमाई भी चल गई, क्योंकि ओटीटी से लागत निकल चुकी थी. इस चक्कर में बॉलीवुड फिल्मों का स्वाद बहुत तेजी से बिगड़ा है.
अब ओटीटी ने बैकफायर कर दिया है… जो फिल्में थिएटर्स में कमजोर पड़ रही हैं, उन्हें ओटीटी भी छूने से बच रहा है. महंगे खर्च में बनी कितनी ही फिल्में थिएटर्स में भी फ्लॉप हो गईं और फिर ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने भी नहीं खरीदीं. 'कांतारा चैप्टर 1' या 'धुरंधर' जैसी फिल्मों का एक्सपीरियंस क्या बिना थिएटर्स के दमदार होता? और क्या ये फिल्में सिर्फ ओटीटी के भरोसे ऐसी पॉपुलैरिटी कमा पातीं? इससे सबक लेकर बॉलीवुड को थिएटर्स के लिए फिल्में बनाने पर फोकस करना चाहिए.
4. स्केल नहीं, सोल पर फोकस
2025 की सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्मों के बजट ऐसे थे कि उतने खर्च में, साल की सबसे बड़ी हिट्स देने वाले मेकर्स दो फिल्में बना सकते थे. 'सैयारा' का बजट तो अधिकतर ए-लिस्ट बॉलीवुड स्टार्स की फीस से भी कम था.
सलमान खान की फ्लॉप 'सिकंदर' और साल की सबसे बड़ी हिट 'धुरंधर' का बजट लगभग बराबर ही था. अक्षय कुमार की फ्लॉप 'स्काईफोर्स' का बजट तो 2025 की पहली 600 करोड़ कमाऊ फिल्म 'छावा' से ज्यादा था. 'वॉर 2' का रिपोर्टेड बजट 400 करोड़ रुपये था. सबसे चर्चित बॉलीवुड फिल्में देखने के बाद आप समझ नहीं पाएंगे कि इतना खर्च हुआ किस चीज पर है?!
दूसरी तरफ लोग यकीन नहीं कर पा रहे थे कि साउथ से आई 'कांतारा चैप्टर 1' का बजट सिर्फ 125 करोड़ रुपये है. क्योंकि रियल लोकेशन्स, प्रैक्टिकल इफेक्ट्स और विशुद्ध रॉ फिल्ममेकिंग ने खर्च कम करने के साथ-साथ रियल फील भी दिया. इस फील से ही इमोशनल गहराई आई. इसी फील ने 'धुरंधर' को शानदार सिनेमा बनाया. इसी इमोशनल कनेक्ट ने 'सैयारा' को हिट करवाया. इमोशन ही फिल्मों की आत्मा यानी सोल है. इसकी जगह महंगे बजट का स्केल नहीं ले सकता.
5. गाने हैं फिल्मों की जान
2025 में बॉलीवुड को फिर से अपने ही बनाए उस फॉर्मूले का स्वाद मिला, जिसे अब मेकर्स भूलते जा रहे थे— गाना हिट तो पिक्चर हिट! 'धुरंधर' का एल्बम लोग लूप पर बजा रहे हैं. 'सैयारा' का टाइटल ट्रैक नहीं चला होता, तो इसे पहचान नहीं मिलती. और बाकी गाने नहीं चलते तो ये फिल्म थिएटर्स में टिकती नहीं. 'मेट्रो इन दिनों' एक समय फ्लॉप होने के रिस्क पर थी, गानों ने फिल्म बचा ली. 'तेरे इश्क में' को गानों ने ही साल की सबसे पॉपुलर लव स्टोरीज में से एक बनाया. 'एक दीवाने की दीवानियत' हिट हो सकती है, ये किसी ने नहीं सोचा था, मगर गानों ने इस फिल्म को सरप्राइज हिट बना दिया.
पिछले कुछ सालों में बॉलीवुड ने ऑरिजिनल गानों पर काम करना बंद कर दिया था. इस साल म्यूजिक एल्बम चले तो मिड बजट की फिल्में भी चलीं. गाड़ियों में फिर से बॉलीवुड फिल्मों के गाने बजते सुनाई दिए. ये 2026 में आने वाली फिल्मों के लिए बड़ा सबक है.
2018 को बॉलीवुड में बड़ा साल इसलिए माना जाता है क्योंकि उस साल जनता का प्यार ऑर्गैनिक तरीके से फिल्मों को खूब मिला था. लेकिन लॉकडाउन के बाद वाले दौर ने खेल पूरी तरह बिगाड़ दिया था. फिल्मों को जनता से ऑर्गैनिक प्रेम मिलना जैसे बंद हो गया था. मगर 2025 ने लॉकडाउन के बाद लगे बहुत सारे दाग धोए हैं. अब ये बॉलीवुड इंडस्ट्री पर है कि ये सबक सीखकर वो 2026 को धमाकेदार बनाएगी. या फिर से वही गलतियां दोहराएगी, जिससे खेल बिगड़ा है!
सुबोध मिश्रा