TVK के VS बाबू कौन हैं? अपनी ही पार्टी के बागी से हारे मुख्यमंत्री MK स्टालिन, 8500 से ज्यादा वोटों से खाई शिकस्त

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री MK स्टालिन तीन बार जीती अपनी कोलाथुर सीट पर शिकस्त खा गए. TVK के वीएस बाबू ने DMK नेता को 8000 वोटों से मात दे दी. जानें कौन हैं बाबू? जिन्होंने स्टालिन का 'अभेद्य किला' ढहा दिया...

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कोलाथुर में विजय थलपति की पार्टी TVK का धमाका.(Photo:ITG) कोलाथुर में विजय थलपति की पार्टी TVK का धमाका.(Photo:ITG)

aajtak.in

  • चेन्नई,
  • 04 मई 2026,
  • अपडेटेड 5:26 PM IST

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने एक ऐसा इतिहास रच दिया है जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी. राज्य की सबसे हाई-प्रोफाइल सीट कोलाथुर में मुख्यमंत्री और डीएमके DMK अध्यक्ष एमके स्टालिन की करारी हार हुई है. स्टालिन को उनकी ही पार्टी के पूर्व दिग्गज और अब तमिझगा वेत्री कड़गम (TVK) के उम्मीदवार वीएस बाबू ने करीब 8000 से ज्यादा वोटों के अंतर से शिकस्त दी है. जानिए कौन हैं वीएस बाबू... 

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75 साल के वीएस बाबू तमिलनाडु की राजनीति का एक बेहद अनुभवी चेहरा हैं, जिनका राजनीतिक कद कोलाथुर इलाके में काफी मजबूत माना जाता है.

बाबू ने साल 2006 में DMK के उम्मीदवार के रूप में पुरासवाल्कम सीट से बड़ी जीत हासिल की थी. उस दौरान उन्होंने AIADMK उम्मीदवार को 90 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था.

दो दशकों का अनुभव
वीएस बाबू के पास 20 साल से ज्यादा का सक्रिय राजनीतिक अनुभव है. वे 2006 से 2011 तक विधायक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. स्टालिन के करीब रहे बाबू ने 7 फरवरी 2026 को DMK छोड़कर एक्टर विजय की पार्टी TVK का दामन थाम लिया था. 2026 के चुनावी हलफनामे के मुताबिक, वीएस बाबू के पास 3.7 करोड़ रुपये की संपत्ति है.

DMK के इतिहास की सबसे शर्मनाक हार
यह पहली बार है जब DMK के गठन के बाद पार्टी के अध्यक्ष एमके स्टालिन) और महासचिव दुरईमुरुगन दोनों ही एक साथ विधानसभा चुनाव हार गए हैं. कोलाथुर सीट, जिसने स्टालिन को 2011, 2016 और 2021 में लगातार तीन बार जीत दिलाई थी, इस बार उनके हाथ से फिसल गई.

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इन दिग्गजों के बीच था मुकाबला
कोलाथुर सीट पर चतुष्कोणीय मुकाबले ने चुनाव को और भी रोचक बना दिया था:

वी.एस. बाबू (TVK) 

एमके स्टालिन (DMK)

पी. संथाना कृष्णन (AIADMK)

सौंदारा पांडियन लूथर सेठ (NTK)

विजय थलपति की पार्टी TVK के बढ़ते क्रेज और वीएस बाबू की स्थानीय पकड़ ने मिलकर स्टालिन के 'अभेद्य किले' को ढहा दिया. स्टालिन की यह हार न सिर्फ DMK के लिए एक बड़ा झटका है, बल्कि दक्षिण भारत की राजनीति में एक नए युग के उदय का संकेत भी दे रही है.

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