बंगाल में इस बार 8 की बजाय 2 चरणों में क्यों हो रही वोटिंग? 35 साल बाद इतना बड़ा बदलाव

भारत निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों का कार्यक्रम घोषित कर दिया है. पश्चिम बंगाल में इस बार सिर्फ दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होगा, जबकि अन्य चार राज्यों में एक ही चरण में वोट डाले जाएंगे. सभी राज्यों के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे.

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में वोट डाले जाएंगे और नतीजे 4 मई को आएंगे. (File Photo: PTI) पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में वोट डाले जाएंगे और नतीजे 4 मई को आएंगे. (File Photo: PTI)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 15 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 6:23 PM IST

भारत के निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों का कार्यक्रम घोषित कर दिए हैं. पश्चिम बंगाल में दो फेज में चुनाव होंगे जबकि असम, तमिलनाडु, केरल और पुडेचेरी में एक फेज में चुनाव होंगे. पांचों राज्यों के चुनावी नतीजे 4 मई को आएंगे. 

पश्चिम बंगाल में 2021 में 8 चरणों में विधानसभा चुनाव संपन्न हुआ था और करीब एक महीने तक वोटिंग हुई थी. जहां पहला चरण 27 मार्च को शुरू हुआ था, वहीं आठवां और आखिरी चरण 29 अप्रैल को खत्म हुआ था. निर्वाचन आयोग ने इस बार सिर्फ दो चरणों में चुनाव कराने का ऐलान किया है, जिसमें पहले चरण में 152 सीटों के लिए 23 अप्रैल और दूसरे चरण में 142 सीटों के लिए 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे. पश्चिम बंगाल में 35 साल बाद दो चरणों में विधानसभा चुनाव संपन्न हो रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि इस बार 8 की बजाय 2 चरणों में मतदान क्यों हो रहा है? 

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निर्वाचन आयोग ने रविवार को जिन 5 राज्यों में चुनावी तारीखों का ऐलान किया है, उनमें पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा 294 सीटें हैं. निर्वाचन आयोग के मुताबिक बंगाल में पहले चरण के लिए 23 अप्रैल को 154 सीटों पर मतदान होगा, जिसके लिए 30 मार्च से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो जाएगी और 6 अप्रैल तक चलेगी. इसके बाद 7 अप्रैल को पहले चरण के नामांकन पत्र की जांच होगी और 9 अप्रैल तक नाम वापस लिए जा सकेंगे. 

वहीं, दूसरे चरण में 142 सीटों के लिए 29 अप्रैल को मतदान होगा, जिसके लिए 2 अप्रैल से नामांकन प्रक्रिया शुरू होगी और 9 अप्रैल तक चलेगी. नामांकन वापसी की आखिरी तारीख 13 अप्रैल होगी. पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजे 4 मई को असम, केरल, पुडुचेरी और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव परिणाम के साथ ही आएंगे. 

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बंगाल में 35 साल के बाद दो चरणों में चुनाव

पश्चिम बंगाल में करीब 35 साल के बाद दो चरण में चुनाव हो रहे हैं. 1991 में दो चरण में विधानसभा चुनाव हुए थे, उसके बाद से पांच से छह और सात-आठ चरण में चुनाव होते रहे हैं. 2021 में 8 चरणों में चुनाव हुए थे. इससे पहले 2016 में 6 चरणों में चुनाव हुए थे, जिसमें पहले चरण के लिए 4 अप्रैल और छठे व आखिरी चरण के लिए 5 मई को मतदान हुए थे. 

साल 2011 के विधानसभा चुनाव में 6 चरणों में चुनाव हुए थे, 18 अप्रैल को पहले चरण के लिए वोटिंग हुई थी और 10 मई को आखिरी चरण का मतदान हुआ था. इस चुनाव में बंगाल की सत्ता से तीन दशक बाद लेफ्ट की विदाई हुई थी और ममता बनर्जी की अगुवाई में टीएमसी ने सरकार बनाई थी. इससे पहले 2006 में 5 चरणों में चुनाव हुए थे और 2001 में 8 चरणों में विधानसभा चुनाव हुए थे. बंगाल में 1996 का विधानसभा चुनाव सिर्फ 3 चरणों में संपन्न हुआ था. जबकि 1991 में सिर्फ दो चरणों में चुनाव आयोग ने बंगाल के चुनाव कराए थे. बंगाल के इतिहास में यह सबसे कम चरणों का चुनाव रहा है और अब फिर से चुनाव आयोग ने दो चरणों में चुनाव कराने का ऐलान किया है. इस तरह करीब साढ़े तीन दशक के बाद दो चरणों में चुनाव हो रहे हैं. 

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बंगाल में 8 के बजाय 2 चरणों में चुनाव क्यों? 

पश्चिम बंगाल में 2021 में चुनाव आयोग ने 8 चरणों में चुनाव कराने का ऐलान किया था तो सबसे ज्यादा विरोध ममता बनर्जी ने किया था. इस बार चुनाव आयोग की टीम बंगाल जायजा लेने पहुंची तो समीक्षा बैठक के दौरान राज्य के लगभग सभी प्रमुख विपक्षी दलों (BJP, CPIM और कांग्रेस) ने मांग की थी कि चुनाव कम से कम चरणों में कराए जाएं. बीजेपी ने चुनाव आयोग से अपील की थी कि चुनाव 1, 2 या अधिकतम 3 चरणों में हों. उनका तर्क था कि लंबे समय तक चलने वाले चुनाव व्यावहारिक नहीं हैं. वाम मोर्चा ने एक ही चरण में चुनाव कराने की मांग की थी ताकि 'असामाजिक तत्वों' को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने का मौका न मिले. 

इस तरह राजनीतिक दलों की मांग को देखते हुए निर्वाचन आयोग ने 8 चरणों के बजाय दो चरणों में चुनाव कराने का ऐलान किया है. मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि आयोग ने इसे सभी के लिए सुविधाजनक (Convenient) बनाने और चुनावी खिंचाव को कम करने के लिए पश्चिम बंगाल चुनाव में चरणों की संख्या कम करना आवश्यक समझा. इसीलिए सिर्फ दो चरणों में चुनाव कराने का फैसला लिया है. आयोग का मानना है कि कम चरणों में और सुरक्षा बलों की सघन मौजूदगी के साथ मतदान कराने से हिंसा की घटनाओं पर बेहतर नियंत्रण पाया जा सकता है.

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दो फेज में चुनाव से किसे नफा, किसे नुकसान

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में दो चरणों के चुनाव कराने का फैसला कर निर्वाचन आयोग 'एक देश एक चुनाव' की दिशा में कदम बढ़ा रहा. झारखंड में 2024 के विधानसभा चुनाव को भी निर्वाचन आयोग ने सिर्फ दो चरणों में कराया था और 2025 में बिहार का चुनाव भी दो चरणों में कराने का काम किया था. इसके बाद चुनाव आयोग ने बंगाल जैसे राज्य में दो चरणों में चुनाव कराने के लिए कदम उठाया है. विपक्षी दलों ने ही कम चरणों की मांग की थी और उनका तर्क है कि लंबे चुनावों में हिंसा करने वाले तत्वों को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने का समय मिल जाता है. 

दो चरणों में भारी सुरक्षा बलों की तैनाती से उन्हें लगता है कि उनके कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को अधिक सुरक्षा मिलेगी. इसके अलावा कम चरणों में चुनाव कराने से प्रशासनिक बोझ कम होता है और सुरक्षा बलों को मूवमेंट (आवाजाही) कम करना पड़ता है.
बंगाल में दो चरणों में चुनाव कराने के सियासी नफा और नुकसान भी होते हैं. कम समय में चुनाव होने से विपक्षी दल अपनी चुनावी लहर को बरकरार रख सकते हैं, जो लंबे चरणों में अक्सर बिखर जाती है. 2021 के विधानसभा चुनावों में देखा गया है, शुरुआती दो चरणों में बीजेपी को फायदा हुआ था, बाकी के पांच चरणों में टीएमसी को लाभ मिला था. 2021 में जैसे-जैसे चरण दर चरण चुनाव बढ़ा, वैसे-वैसे माहौल भी बदलता गया. 

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ममता बनर्जी के लिए क्या बढ़ेगी टेंशन?

पश्चिम बंगाल में दो चरणों में चुनाव कराने से सबसे ज्यादा टेंशन ममता बनर्जी को होने वाली है. बीजेपी के पास स्टार प्रचारकों की पूरी फौज है, जिसमें पीएम मोदी से लेकर अमित शाह और सीएम योगी सहित तमाम बड़े नेता हैं. वहीं, टीएमसी के पास सिर्फ ममता बनर्जी ही मुख्य चेहरा हैं, जिनके नाम और चेहरे पर बंगाल में वोट मिलता है. ममता बनर्जी जैसे स्टार प्रचारकों के लिए कम समय में सभी 294 सीटों पर रैलियां करना एक बड़ी चुनौती होगी. 2021 के आठ चरणों में उन्हें हर क्षेत्र में पर्याप्त समय मिला था, लेकिन इस बार दो चरणों में चुनाव होने से बहुत कम समय होगा. 

इस तरह ममता बनर्जी का सभी सीटों पर प्रचार करने के लिए पहुंचना आसान नहीं होगा. टीएमसी को देखा गया है कि लंबे चुनावों में वह अपनी माइक्रो-मैनेजमेंट रणनीति पर भरोसा करती है. दो चरणों में चुनाव होने से पार्टी को अपनी पूरी मशीनरी बहुत कम समय में सक्रिय करनी होगी. छोटे दलों के पास अक्सर संसाधनों की कमी होती है. ऐसे में दो चरणों में पूरे राज्य में एक साथ प्रचार और बूथ मैनेजमेंट करना उनके लिए आर्थिक और सांगठनिक रूप से कठिन हो सकता है.

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