शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार... 10 साल में कितना बदला असम, मंत्रियों ने बताईं उपलब्धियां

असम चुनाव से पहले गोवाहाटी में पंचायत आजतक असम का आयोजन हुआ जिसमें राजनीतिक दलों के नेता, उद्यमी और अधिकारी शामिल हुए. कैबिनेट मंत्री रनोज पेगू और स्वास्थ्य मंत्री अशोक सिंघल ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पहचान के मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की.

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पंचायत आजतक असम के मंच पर पहुंचे मंत्री रनोज पेगू और मंत्री अशोक सिंहल पंचायत आजतक असम के मंच पर पहुंचे मंत्री रनोज पेगू और मंत्री अशोक सिंहल

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 12 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 11:49 PM IST

असम चुनाव से पहले गुरुवार को गोवाहाटी में पंचायत आजतक असम का आयोजन हुआ. होटल विवांता में आयोजित इस कार्यक्रम में असम के राजनीतिक मुद्दों और जरूरी जन सरोकारों पर चर्चा हुई. इस मौके पर राजनीतिक दलों से नेताओं, राज्य के उद्मियों और अफसरों ने शिरकत की, साथ ही सवालों के जवाब दिए.  इसी कड़ी में मंच पर आयोजित हुआ सेशन, 'असम सरकार कितनी असरदार' जिसमें रनोज पेगू (कैबिनेट मंत्री उच्च शिक्षा, स्कूली, आदिवासी मामले, असम सरकार) और अशोक सिंहल (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री, असम सरकार) ने सवालों के जवाब दिए, साथ ही अपनी राय और विचार भी साझा किए.

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क्यों बड़ा मुद्दा है असम अस्मिता
असमिया अस्मिता वाले मुद्दे के सवाल पर, कैबिनेट मंत्री रनोज़ पेगू ने कहा कि अगर असम का इतिहास देखा जाए तो यह पहचान की लड़ाई का इतिहास रहा है. 1837 से लेकर आज तक मातृभाषा असमिया को राज्य भाषा का दर्जा दिलाने की लड़ाई और जनजातीय समुदायों की पहचान की लड़ाई लगातार चलती रही है. इसलिए असम की राजनीति में पहचान का मुद्दा हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है और आगे भी रहेगा. उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने केवल पहचान की राजनीति ही नहीं की, बल्कि कई महत्वपूर्ण काम भी किए हैं. पहला काम शांति स्थापित करना रहा. दूसरा, विभिन्न समुदायों के बीच होने वाले टकराव को कम करना. तीसरा, विकास की गति को तेज करना, क्योंकि असम पहले विकास के मामले में काफी पीछे था. इसके साथ ही शिक्षा और सरकारी सेवाओं में भी बड़े बदलाव किए गए हैं.

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शिक्षा के क्षेत्र में कितना हुआ काम?
जब उनसे पूछा गया कि शिक्षा के क्षेत्र में क्या ठोस काम हुआ है, तो उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पिछले दस वर्षों में अभूतपूर्व विकास हुआ है. असम में आज 23 विश्वविद्यालय हैं. एक समय था जब राज्य में केवल दो ही विश्वविद्यालय थे. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय में पोस्ट ग्रेजुएशन की 1000 सीटें हैं, लेकिन आवेदन 7000 आते हैं. ऐसे में बाकी छात्रों के लिए नए विश्वविद्यालयों की जरूरत थी. इसी वजह से सरकार का लक्ष्य है कि हर जिले में एक विश्वविद्यालय हो.

उन्होंने बताया कि पहले असम में केवल दो इंजीनियरिंग कॉलेज थे, जबकि आज सात इंजीनियरिंग कॉलेज चल रहे हैं और छह निर्माणाधीन हैं. इसी तरह सामान्य डिग्री कॉलेजों की संख्या भी 337 से बढ़कर 514 हो गई है. स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में भी कई सुधार किए गए हैं. 

10 वर्षों में बने आठ नए मेडिकल
इसके बाद स्वास्थ्य मंत्री अशोक सिंघल से सवाल किया गया कि स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उन्होंने ऐसा क्या काम किया है जिसके आधार पर वे जनता से फिर से वोट मांगने जाएंगे. अशोक सिंघल ने कहा कि जब उनकी सरकार आई थी तब असम में केवल छह मेडिकल कॉलेज थे और वह भी 60 साल में बने थे. लेकिन पिछले दस वर्षों में आठ नए मेडिकल कॉलेज शुरू किए गए हैं और दस मेडिकल कॉलेज निर्माणाधीन हैं. आने वाले पांच वर्षों में और दस मेडिकल कॉलेज तैयार हो जाएंगे.

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प्रदेश में घटी है मातृ मृत्यु दर
उन्होंने कहा कि पहले असम के लोगों को बुनियादी इलाज के लिए भी दूसरे राज्यों में जाना पड़ता था. लेकिन आज कैंसर उपचार के क्षेत्र में असम देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो चुका है. उन्होंने बताया कि प्रोटोन कैंसर केयर मशीन, जो अभी केवल दो जगह 'टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट और अपोलो चेन्नई में है, उसकी तीसरी मशीन असम में आने वाली है और सरकारी क्षेत्र में यह पहली होगी. स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि पहले राज्य में मातृ मृत्यु दर लगभग 430 के आसपास थी, जो अब घटकर लगभग 110 रह गई है. सरकार का लक्ष्य इसे राष्ट्रीय औसत से भी नीचे लाना है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत सरकार के सर्वे के अनुसार असम के 90 प्रतिशत सरकारी अस्पतालों में जरूरी दवाइयां उपलब्ध हैं.

चुनाव में क्यों सामने आता है मियां मुसलमान का मुद्दा?
इसके बाद चर्चा फिर उस मुद्दे पर आई कि अगर सरकार इतनी असरदार है तो फिर चुनाव के समय “मिया मुसलमान” जैसे मुद्दे क्यों उठाए जा रहे हैं. इस पर अशोक सिंघल ने कहा कि यह मुद्दा किसी ने उठाया नहीं, बल्कि यह अपने आप सामने आता है. उन्होंने कहा कि विकास के साथ-साथ विरासत और पहचान को बचाना भी जरूरी है. उन्होंने याद दिलाया कि 1979 में असम आंदोलन शुरू हुआ था और उस समय जो भय लोगों के मन में था, वह आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि कई जिलों में जनसंख्या का संतुलन बदल रहा है और स्थानीय लोगों को पलायन करना पड़ रहा है. इसलिए इस मुद्दे पर बात करना जरूरी है.

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उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने पिछले वर्षों में 50,000 एकड़ से अधिक वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया है. साथ ही काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में गैंडों के शिकार पर भी काफी हद तक रोक लगी है. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की भूमिका पर बोलते हुए रनोज़ पेगू ने कहा कि मुख्यमंत्री का नेतृत्व निर्णायक है. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने एक लाख सरकारी नौकरियां देने का वादा किया था और अब तक 1,65,359 नियुक्तियां पूरी हो चुकी हैं. केवल शिक्षा विभाग में ही 95,000 शिक्षकों की नियुक्ति हुई है.

'प्रदेश में बढ़ रहे हैं निवेश'
रोजगार और पलायन के मामले पर रनोज़ पेगू ने कहा कि रोजगार के लिए लोगों का एक राज्य से दूसरे राज्य जाना एक सामान्य प्रक्रिया है. पहले बिहार, ओडिशा और उत्तर प्रदेश के लोग काम की तलाश में असम आते थे, अब असम के लोग भी अन्य राज्यों में जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि पहले असम में उद्योग नहीं आ पाए क्योंकि राज्य लंबे समय तक उग्रवाद और राजनीतिक अस्थिरता से जूझता रहा. अब जब स्थिति सामान्य हो रही है, तो उद्योग आने लगे हैं. “एडवांटेज असम” जैसे कार्यक्रमों के जरिए निवेश को बढ़ावा दिया जा रहा है और इससे युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे.

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इसके बाद चर्चा महिलाओं को मिलने वाली आर्थिक सहायता पर हुई. सवाल पूछा गया कि अगर सरकार इतनी असरदार है तो चुनावी साल में महिलाओं को ₹9,000 क्यों दिए जा रहे हैं. इस पर अशोक सिंघल ने कहा कि यह कोई चुनावी घोषणा नहीं है. यह योजना पिछले कई वर्षों से चल रही है. शुरुआत में ₹850 प्रति माह दिया जाता था और अब यह बढ़कर ₹1,250 प्रति माह हो गया है. पहले 17 लाख महिलाओं को इसका लाभ मिलता था, जो अब बढ़कर लगभग 40 लाख हो गया है.

उन्होंने कहा कि यह किसी तरह की दया नहीं, बल्कि महिलाओं का अधिकार है. उन्होंने यह भी कहा कि छोटी राशि से भी महिलाएँ छोटा कारोबार शुरू कर सकती हैं—जैसे सब्जी की खेती, अदरक या लहसुन की खेती, हथकरघा उद्योग, बकरी पालन या सूअर पालन. विपक्ष द्वारा इसे “चुनावी रेवड़ी” कहे जाने पर उन्होंने कहा कि यह योजनाएं पांच साल से लगातार चल रही हैं और चुनाव के समय अचानक शुरू नहीं हुई हैं. उनका कहना था कि सरकार का चुनाव प्रचार भी पाँच साल तक लगातार चलता रहता है क्योंकि हर दिन सरकार जनता के बीच काम करती है.

अंत में उन्होंने कहा कि पिछले दस वर्षों में लगभग 1,70,000 सरकारी नौकरियाँ दी गई हैं और किसी भी भर्ती पर भ्रष्टाचार या भाई-भतीजावाद का आरोप नहीं लगा. उनका दावा था कि असम का यह मॉडल अब दूसरे राज्य भी अपनाने लगे हैं.
 

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